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माँ ममता का सागर है पर उसका किनारा है पिताजी माँ से ही बनता घर है पर घर का सहारा है पिताजी 

 
मेरा अभिमान पिता 
मेरा साहस मेरी इज्जत मेरा सम्मान है पिता।
मेरी ताकत मेरी पूँजी मेरी पहचान है पिता।
घर की इक-इक ईट में शामिल उनका खून पसीना।
सारे घर की रौनक उनसे सारे घर की शान पिता।
मेरी शोहरत मेरा रूतबा मेरा है मान पिता।
मुझको हिम्मत देने वाले मेरा हैं अभिमान पिता।
सारे रिश्ते उनके दम से सारे नाते उनसे हैं।
सारे घर के दिल की धड़कन सारे घर की जान पित।
शायद रब ने देकर भेजा फल ये अच्छे कर्मों का।
उसकी रहमत उसकी नेमत उसका है वरदान पिता।
बचपन की यादें 
आज भी वो प्यारी मुस्कान याद आती है।
जो मेरी शरारतों से पापा के चेहरे पर खिल जाती थी।
अपने कन्धों पर बैठाकर वो मुझे दुनिया की सैर कराते थे।
जहां भी जाते मेरे लिए ढेर सारे तोहफे लाते थे।
मेरे हर जन्मदिन पर वो मुझे साथ मंदिर ले जाते थे।
मेरे हर रिजल्ट का बखान पूरी दुनिया को बताते थे।
मेरी जिंदगी के सारे सपने उनकी आँखों में पल रहे थे।
मेरे लिए खुशियों का आशियाना वो हर पल बन रहे थे।
मेरे सपने उनके साथ चले गए मेरे पापा मुझे छोड़ गए।
अब आँखों में शरारत नहीं बस आंसू ही दीखते हैं।
एक बार तो वापस आ जाओ पापा।
हैप्पी फादर्स डे तो सुन जाओ पापा।
(कर्णिका पाठक जी द्वारा रचित)
पापा तुम कितने अच्छे हो
पापा तुम कितने अच्छे हो।
बड़े हो गए इतने लम्बे।
मगर अभी मन से बच्चे हो।
पापा तुम कितने अच्छे हो।
दीदी के प्यारे मास्टर जी।
भैया के हो जिगरी दोस्त।
घोड़ा बनकर हमें बिठाते।
और खिलाते मक्खन टोस्ट।
जीवन की खुशियाँ मिल जातीं।
जब मिल जाते मम्मी-पापा।
पिज्जा बर्गर आइसक्रीम संग।
जब हम करते सैर सपाटा।
मम्मी तुम कितनी अच्छी हो।
पापा तुम कितने अच्छे हो।
(महेश जी द्वारा रचित।)
मेरे प्यारे पिताजी
माँ ममता का सागर है
पर उसका किनारा है पिताजी
माँ से ही बनता घर है
पर घर का सहारा है पिताजी
माँ आँखों की ज्योति है
पर आँखों का तारा है पिताजी
माँ से स्वर्ग है माँ से बैकुंठ
माँ से ही है चारों धाम
पर इन सब का द्वारा है पिताजी
देवांश राघव जी द्वारा रचित
प्यारे पापा सच्चे पापा 
प्यारे पापा सच्चे पापा
बच्चों के संग बच्चे पापा
करते हैं पूरी हर इच्छा
मेरे सबसे अच्छे पापा
पापा ने ही तो सिखलाया
हर मुश्किल में बनकर साया
जीवन जीना क्या होता है
जब दुनिया में कोई आया
उंगली पकड़कर सिखलाता
जब ठीक से चलना न आता
नन्हे प्यारे बच्चे के लिए
पापा ही सहारा बन जाता
प्यारे पापा सच्चे पापा
बच्चों के संग बच्चे पापा
पिता पर कविता
पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है।
पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।
पिता उंगली पकडे तो बच्चे का सहारा है।
पिता कभी कुछ खट्टा, कभी खारा है।
पिता पालन है, पोषण है, परिवार का अनुशासन है।
पिता धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।
पिता रोटी है, कपड़ा है, मकान है।
पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।
पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।
पिता है तो बच्चों को इन्तजार है।
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।
पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।
पिता से ही परिवार में प्रतिपल राग है।
पिता से ही माँ की बिंदी और सुहाग है
मेरे पापा 
मेरे पापा अच्छे हैं, हम सब उनके बच्चे हैं।
हमको सुबह उठाते हैं पढने को बैठाते हैं।
जब हम पढने लगते हैं तो मॉर्निंग वाक् पर जाते हैं।
पापा के बाहर जाते ही हम सब धूम मचाते हैं।
सुबह दूध ले आने को भी पापा डेली जाते हैं।
ऑफिस उनका दूर हैं, साहब उनका क्रूर है।
अगर देर हो जाती उनको तगड़ी डांट पिलाते हैं।
देर शाम घर आते हैं, सब्जी भी ले आते हैं।
थककर चूर हुए रहते भी पापा हमें पढ़ाते हैं।
जब हम गलती करते हैं, नहीं किसी से डरते हैं।
तब पापा गुर्राते हैं, जोर-जोर चिल्लाते हैं।
पहले जो भी मिलता है उसे पीटते जाते हैं।
जब हम पीते जाते हैं, मम्मी-पापा भिड़ जाते हैं।
मम्मी के झगडा करने पर पापा भी डर जाते हैं।
हम सब चिप कर देखा करते और मजाक उड़ाते हैं।
(गिरिजेश जी द्वारा रचित)

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