Sat. Aug 15th, 2020

बक्सर , निर्भयता की तपोभूमि : महेश्वर राय

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हिमालिनी अंक मई २०१९ |भगवदकृपा से दुख की अवस्था मे बक्सर की मनभावित यात्रा का सुअवसर प्राप्त हुआ । पटना अपनी धर्मपत्नी की चिकित्सा के लिए गया था और वहीं से बक्सर की यात्रा का पुराना संकल्प पूरा करने का एकाएक मन बन गया । यह सोचकर चकित ही रह जाता हूँ ।
बक्सर जाने की बात कई महीने पहले उठी थी । पड़ोस के गाँव चकबा से विवाह पंचमी के अवसर पर राम–लीला टोली, प्रवचनकर्ता, कीर्तन करनेवाले ग्रामीण वहाँ जाते हैं । अन्य यात्री लोग भी जाते हैं । यह सुनकर महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि पुण्याश्रमः, सिद्धाश्रम को देखने की लालसा मन मे बलवती हो उठी थी ; किन्तु अनेकानेक व्यवधानों के कारण जा नहीं सका था । वह सहज ही उपस्थित हुआ । यही आश्चर्य की बात है ।
श्रीमती जी के स्वास्थ्य की एक और जाँच कराने के लिए एक रात और रहने की जरूरत पड़ी । हमने सोचा होटल में रात बिताने से अच्छा तो रेल के डब्बे में दुख–कष्ट झेलते बक्सर पहुंच जाऊं कि बक्सर के उस पवित्र धूलि का संस्पर्श पा सकूँ, जहाँ जनोद्धार के लिए भगवान नारायण ने घोर तपस्या की थी, वामन अवतार लेकर जिसकी शक्ति से बलि का समन किया था । जहाँ ऋषि मुनियों के भजन–मूजन के यज्ञ को भ्रष्ट करनेवाली ताड़का; मारीच, सुवाहु आदि राक्षसों का अंत करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम–लक्षमण पधारे थे । आधुनिक ऐतिहासिक काल में भी जिस बक्सर की धरती ने शेरशाह, मुगल, अंग्रेज और हिन्दुस्तानी बादशाहत के स्वरूप को निर्णायक रूप दिया था । १८५७ ई.की अंग्रेज विरोधी भारतीय विप्लव में अमर वीर कुंवर सिंह के अद्भुत साहस और वीरता की कहानी जिस धरती पर लिखी थी । जिस बक्सर के जेल को तोड़कर जननायक श्री जयप्रकाश नारायण के १९४२ में “अंग्रेजों भारत छोडो” की आजादी की लड़ाई का ऐतिहासिक नेतृत्व किया था । ऐसी अनेकों पावन जाज्चल्य पे्ररणाप्रद स्मृतियां बक्सर की मन को आन्दोलित आनन्दित करती रहती थीं । उस भूमि के दरश–परस का अमूल्य अवसर इस तरह मिला ।
दो बजे “जनसाधारण–एक्सप्रेस” से पटना जँक्सन से चला था । मैदान ही मैदान; दूर–दूर पर छोटे–छोटे गाँव, जहाँ विकास के चरण धीमे–धीमे पहुँच रहे से लगते थे । गाय, भैँस, बकरियाँ चराते, खेलते बच्चे । आम, सीसम पीपल, नीम के पेड गाँवो के सौंदर्यावरण । रेलवे डिब्बे में इतनी भीड़ और हिजड़ों का इतना अशोभन प्रदर्शन कि उन प्राकृतिक सौंदर्य के आनन्द को लूट सा ले ।
रास्ते में भी बूंदाबाँदी हुई थी । साढ़े सात बजे शाम बक्सर जंकसन पर भी धीमी बारिश हो ही रही थी । किसी होटल में ही रात्रिवास करना था । एक नवयुवक से इस बारे में पूछा और उसने बक्सर होटल का नाम बताया । एक रिक्सा की और बक्सर होटल आ गया । होटल का व्यवस्थापक उस के विस्तृत दरवाजे के बीचोबीच विस्तृत आसन जमाये बैठा था । होटल जैसे एक जेल और वह व्यवस्थापक जेलर की तरह लगा । उसका व्यवहार और बोलने का ढंग शख्त और अफसराना था । उसका सहायक तो और भी अनसूना और अपने मन का मालिक दिखा । फिर भी हमें तो रात काटनी थी । श्रीमती जी को अपने पाँव का दर्द ले कर तीसरी मंजिल की एक कोठरी तक पहुंचने का हिमालय चढ़ना पड़ा । अपने रुचि का शुद्ध भोजन इस समय पा सकने की आशा तो हमने छोड़ ही दी थी । इसलिए होटल–परिचर के सलाह अनुसार आम का ही फलाहार कर लिया । छोटी यात्रा रिक्से की । फिर रात का अंधेरा; अनुमान तक नहीं कर सका, बक और उसकी बहन बकी “पूतना” किस सर मे रहते हुए साधु–संतों, सामान्य जनो को अपना आहार बनते थे और नन्दनंदन यशोदा के लाड़ले श्री कृष्ण को मारने की षड़यंत्रपूर्ण कोशिश में स्वयं कालकवलित हो गए थे । धन्य यह बक्सर !
भगवद्स्मरण और बक्सर की गौरव–गाथाओं की याद करते हुए सुखद निद्रा के साथ बक्सर होटल की वह एक रात कट गई । धीरे–धीरे आगे के कार्यक्रम के लिए आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली । सुवह छ बजे होटल छोड़ कर निकला तो नजदीक ही बनते टावर और बाबू वीर कुंवर सिंह के स्मारक के पास ही एक रिक्सावाला मिला । उसे ही यहाँ के मुख्य दर्शनीय स्थल दिखा देने और फिर जँक्सन तक पहुँचा, देने के लिए निश्चित कर लिया । वह बड़ा सहृदयी था, बड़ा मृदु और नम्र । मैने शाम को ही होटल व्यवस्थापक से यहाँ के महत्वपूर्ण और दर्शनीय स्थानों के बारे मे जानकारी ली थी । उसने गंगा–स्नान के लिए रामरेखा घाट बताया था और दर्शनीय स्थानों के नाम पर नाथबाबा का मन्दिर और नौलखा मन्दिर, किला, बकसर कलेज और कुछ अन्य स्थान ।
सच कहे, तो बक्सर की प्राचीन और अर्वाचीन सभी धरोहरों की जननी तथा साक्षी संरक्षिका माँ गंगा की स्मृति हमें इस यात्रा पर खींच लाई थी । चारों युगों की साक्षी गंगामाता के पावन लहरों का स्मरण, उस में अवगाहन करने की अभिलाषा ही हमें यहाँ खींच लाई थी । हम रामरेखा घाट पर पहुँचे । श्रीमती जी ने अपने ढंग से माता गंगा की पूजा की; मैंने प्रणाम किया । फिर स्नान, ध्यान और जलपान कर आनन्दित और परितृप्त हुए । याद आया, यहीं महर्षि विश्वामित्र और श्री राम–लक्षमण ने गंगा पार किया होगा जनकपुरी के लिए । दक्षिणी तट बक्सर की भगवान नारायण की तपस्या स्थली पुण्याश्रम और उत्तरी तट के महर्षि विश्वामित्र के सिद्धाश्रम की सुकीर्ति कथाओं का स्मरण मन की गंगा बन गया । घाट पर बने मन्दिर में भगवान शिव, हनुमान आदि देवी–देवताओं के विग्रह का दर्शन किया । रिक्सावाला यहाँ से हमें नाथ बाबा के मन्दिर में ले गया ।
नाथ बाबा का मन्दिर तीन शिखरोवाला है पीले स्वर्ण–वर्ण का । वातावरण साफ–सुथरा शांत और मनमोहक है । एक मन्दिर में भगवान आशुतोष शिव के बारह ज्योतिर्लिङ्ग स्थापित हैं, जो जाज्वल्य और भव्य हैं । पूजा चल रही है । दर्शनार्थी भक्त आ–जा रहे हैं । सम्पूर्ण वातावरण पावन और वन्दनीय है । मन स्वयं मान रहा है, सिर स्वयं झुक जाता है । बीच वाले मन्दिर में किसी सिद्ध–साधु का चित्र पूजित है । संभव है, यह नाथ बाबा का हो, जो बक्सरवासियों के साथ आगंतुक आम श्रद्धालुओं में पूजित और पवित्र मन्दिर के पे्ररणा श्रोत, निर्माता की हो । मन्दिर के उत्तर की ओर गंगा बह रही है । आगे पूर्व की ओर एक नाला गंगा में प्रवेश कर रहा है । गंगा में उतरने के लिए सड़क बनी है । गंगा इतनी नीचे है कि सड़क से भी नीचे जाना और आना अत्यन्त श्रम का कार्य दिख रहा है । संभवतः यह घाट योगियों, साधुओं के लिए ही है । नाले के पूरब किनारे की टेकरी पर मोटी दीवारवाला एक किला दिख रहा है । पता नहीं, यह लोक–श्रुति का श्री लक्ष्मणलाल का स्थापित किला है या शेर शाह सूरी या अंग्रेजो का सुरक्षा कवच ? न जाने आज के बक्सर के जीवन में इसकी कैसी भूमिका है ?
अब हम नौलखा मन्दिर पहुँचते है । इस का प्रदेश द्वार राम, लक्ष्मण, हनुमान आदि की मूर्तियों से सुसज्जित होने के कारण अनूठा लगता है । यह दक्षिणी मन्दिर शैली का आभास देता है । खास मन्दिर के द्वार पर ‘वैकुण्ठधाम’ लिखा है । इस के भीतर शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी श्री नारायण विराज रहे है । यह जगद्गुरु स्वामी रामानुजाचारीअनुयायियों द्वारा सेवित संचालित है । परिसर पवित्र और सुन्दर है । एक प्रौढ़ सज्जन एक किशोर को रामकथा सुना–समझा रहे हैं । मन्दिर के पीछे भी आगे की तरह ही एक भव्य तोरण द्वार है । उस मार्ग से ही महर्षि विश्वामित्र के स्थान में जाया जाता है । मन्दिर से दूर आ जाने के बाद रिक्सेवाले के द्वारा मालूम हुआ है कि हमें महर्षि विश्वामित्र के स्थान का दर्शन नहीं हुआ । दुख हुआ । भाग्य और संयोग को समझा । फिर सारे बक्सर को हीं महर्षि ब्रह्मर्षि श्री विश्वामित्र का स्थान समझ कर संतृप्त हुआ । बैकुण्ठ धाम, नौलखा मन्दिर से लौटते हुए मार्ग में एक विद्यालय–महाविद्यालय परिसर जैसा दिखा । मालूम हुआ, हर वर्ष विवाह पंचमी के दिन यहाँ श्री सीताराम की बाँकी झांकी का भव्य जुलूस निकलता है । बड़ी भीड़ होती है । पौराणिक पुरुषार्थपूर्ण पावन घटनाओं की स्मृतियो का मधुर प्रवाह बह निकलता है । इस में बक्सर की आधुनिक ऐतिहसिक पौरुषपूर्ण घटनाओं की यादों की धार भी आ मिलती है ।
बक्सर की भूमि भूरी है, आबादी शहरोन्मुख कसबाई है । और लोगों का शारीरिक–मानसिक बनौट कुछ पूरुष पुरूपार्थपूर्ण है । यह अपने भौतिक जीवन के यथार्थ धरातल पर जीता हुआ, अनन्त आदर्शाें के समीचीन स्वस्थ गर्भभूमि जैसा है । बक्सर भगवान नारायण, वामन, महर्षि विश्वामित्र, भगवान श्री राम–लक्ष्मण, वीर कुंवर सिँह और जननायक जयप्रकाश नारायण की तपोभूमि, क्रीड़ा लीला भूमि है । इस की सुवास इस की मिट्टी और हवा में रची–बसी है । इस धन से यह सदा आनन्दित और धन्य है । इन सारे पावन स्मृतियों का इतिहास राजराजेन्द्र दानवेन्द्र महादानी ‘बलि’ ताड़का, सुवाहु, मारीच और बक्सर के जीवन–पृष्ठों पर अंकित है । यहाँ ताड़का–पुल है, ताड़का नाला है जो गंगा की गोद में पावन होती है । यहाँ की मिट्टी पर कदम–कदम पर प्राचीन और अर्र्वाचीन पावन प्र्रकाशपूर्ण स्मृतियों की दिव्य धूल बिखरी है । बक्सर को क्या कहूँ ? भगवान नारायण, वामन और दानवेन्द्र बली, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, भगवान रामलक्ष्मण और दानवी ताड़का सुवाहु और मारीच, वीर कुंवर सिँह और फिरंङ्गी, जननायक जयप्रकाश और अंग्रेजों का शासन और इन सबों के बीच फूलता–फलता बैकुण्ठधाम, नौलखा और नाथबाबा । इन सबों को अपने मात्रिमृदुल आँचल में लिए दुलराती–हलराती जगपावनी माँ गंगा ।
हमने घरकाज के लिए रामरेखा घाट पर एक बोतल गंगा–जल लिया है । बक्सर की इस अति छोटी यात्रा में हमने यहाँ की भूमि में पौरुषता और पुरुषार्थ की दिव्यता का संदेश पाया है । स्टेसन की ओर जाते हुए साथ का गंगाजल जैसे हमें संदेश दे रहा है; आश्वासन दे रहा है । “तुम जीवन का महायज्ञ निर्मय हो कर पूरा करो । निर्भय यज्ञ करहु तुम जाई ।”

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