भोजपुरी का शेक्सपीयर : भिखारी ठाकुर
घर में रहे दूध पांच सेर, केहू जोरन दिहल एक धार.
का पंचाईत होखत बा, घीव साफे भईल हमार. (गबरघिचोर)

हिमालिनी अंक जुलाई २०१९ | संजीव के उपन्यास ‘सूत्रधार’ के केंद्र में हैं भोजपुरी गीत–संगीत और लोक नाटक के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर । वही भिखारी ठाकुर जिन्हें महापण्डित राहुल सांकृत्यान ने ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ कहा था और उनके अभिनंदनकर्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र.
चर्चित कथाकार रामकुमार कृषक ने लिखा था कि संजीव के उपन्यास सूत्रधार’ के केंद्र में हैं भोजपुरी गीत–संगीत और लोक नाटक के अनूठे सूत्रधार भिखारी ठाकुर । वही भिखारी ठाकुर जिन्हें महापण्डित राहुल सांकृत्यान ने ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ कहा था और उनके अभिनंदनकर्त्ताओं ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र । लेकिन भिखारी ठाकुर क्या सिर्फ यही थे ? निश्चय ही नहीं, क्योंकि कोई भी एक बड़ा किसी दूसरे के समकक्ष नहीं हो सकता । और यों भी भिखारी का बड़प्पन उनके सहज सामान्य होने में निहित था ।
इस उपन्यास में संजीव ने भिखारी ठाकुर को उन्हीं के आत्मद्वन्द्व से गुजरते हुए चित्रित किया है । दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी धूप–छाहीं कथा–यात्रा है, जिसे हम भिखारी जैसे लीजेंडरी लोक कलाकार और उनके संगी–साथियों के अंतर्वाह्य संघर्ष को महसूस करते हैं । काल्पनिक अतिरेक की यहाँ कोई गुंजाइस नहीं, न कोई जरूरत, जरूरत है तो तथ्यों के बावजूद रचनात्मता को लगातार साधे रखने की, और संजीव को इसमें महारथ हासिल है ।
यही कारण है कि सूत्रधार की शक्ल में उतरे भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज में रचे–बसे लोकराग और लोकचेतना को व्यक्त ही नहीं करते, उद्दीप्त भी करते हैं । उनकी लोकरंजकता भी गहरे मूल्यबोध से संबलित है और उसमें न सिर्फ उनकी बल्कि हमारे समाज और इतिहास की बहुविधा विडम्बनाएँ भी समाई हुई हैं । अपने तमाम तरह के शिखरारोहण के बावजूद भिखारी अगर अंत तक भिखारी ही बने रहते हैं, तो यह यथार्थ आज भी हमारे सामने एक बड़े सवाल की तरह मौजूद है ।
कहने की आवश्यकता नहीं कि देश, काल, पात्र की जीवित–जाग्रत पृष्ठभूमि पर रचा गया यह जीवनीपरक उपन्यास आज के दलित–विमर्श को भी एक नई जÞमीन देता है । तथ्यों से बँधे रहकर भी संजीव ने एक बड़े कलाकार से उसी के अनुरूप रसशक्ति और आत्मीय संवाद किया है । संजीव के स्वयं के शब्दों में ‘आग्रहों के बेतरतीब उलझाव और रंग–बिरंगी बुनावट से सत्य का सन्धान कर पाना कितना दुस्साध्य कर्म है, यह मैंने लीजेंड बन चुके भिखारी ठाकुर पर लिखते हुए मर्म–मर्म में महसूसा । देश, काल और किंवदन्तियों, साक्षात्कारों तथा पर्यवेक्षण के अन्दर बाहर की यात्रा कर जो चित्र उकेर पाया हूँ, आपके सामने है । पक्का दावा नहीं कर सकता कि सत्य सिर्फ वही उतना ही है, यह सहज मेरे शोध और रचनात्मक विवेक की अभिव्यक्ति है ।
जीवनी लिखना इससे कहीं सरल कार्य होता । कारण, तब आप परस्पर विरोधी दावों के तथ्यों का उल्लेख कर छुट्टी पा सकते हैं । जीवनीपरक उपन्यास में आपको औपन्यासिक प्रवाह बनाते हुए किसी मुहाने तक पहुँचना ही पड़ता है, यहाँ द्वंद्व और दुविधा की कोई गुंजाइश नहीं है । दूसरी तरफ उपन्यास लिखना भी जीवनीपरक उपन्यास लिखने की अपेक्षा सरल होता है, कारण आप तो तथ्यों में बँधे नहीं रहते । यहाँ दोनों ही स्थितियाँ नहीं थीं ।
भिखारी ठाकुर कुछ दशक पहले तक जीवित थे, उन्हें देखने और जानने वाले लोग अभी भी हैं । सो, सत्य और तथ्य के ज्यादा से ज्यादा करीब पहुँचना मेरी रचनात्मक निष्ठा के लिए अनिवार्य था । इस प्रक्रिया में कैसी–कैसी बीहड़ यात्रा मुझे करनी पड़ी, ये सारे अनुभव बताने बैठूँ तो एक अलग पोथा तैयार हो जाए । संक्षेप में कहूँ तो कम असहयोग भी मुझे कम नहीं मिले, और सहयोग भी । इन तमाम मित्रों, सहृदों, दूर–दरास्थ ग्रामवासियों, कला–मर्मज्ञों का मैं ऋणी हूँ ।
‘सूत्रधार’ का अंश
निचाट दुपहिया वैशाख की । तपता हुआ दूर–दूर तक दियारा । न कोई आदमी है, न चिरई, न जिनावर । बरम्ह बाबा के पीपर के बाद उत्तर चिराँद तक एक भी पेड़ नहीं जहाँ, रुककर छँहाया जा सके । बस हैं तो इक्की–दुक्की कँटीली झाडि़याँ– वह भी बबूल की । छोटे–छोटे बवंडर उठते हैं तो इन झाडि़यों में उलझ कर फनफना उठते हैं, जैसे मरकहे भैंसे की नाथी पकड़ ले कोई । फिर जिन्न की तरह नाचते हुए आगे निकल जाते हैं । सारा जीवन (सीमांत) आँवा की तरह धधक रहा है । लंबे–चौड़े उस गोरे–गँठीले जवान ने गमछे से कस कर सिर को लपेटा और उस धँधकते आँवे में प्रवेश कर गया ।
कंठ सूख रहा है । पाँव झुलस रहे हैं । मनमनाती दुपहिया में कोई इक्का भी तो नहीं दिखता । इक्का मिल भी गया तो पैसे कहाँ ? –चलो, ऐसे ही चलो और जरा तेज–तेज चलो । एक–डेढ़ घंटे चलते रहने के बाद कहीं सरजू जी की छाड़न मिलेगी । तब तक चलना है, चलते ही रहना है । वहाँ भी पानी होगा क्या ? गर्मी में तो सूख जाती है ‘छाड़न’ । लगता है, पाँव में फँफोले पड़ रहे हैं । किसी मरे हुए बाभन की फेंक दी गई पनही लेते आए थे बाबूजी । वही पहनता रहा अब तक । इसका तल्ला बिल्कुल ही घिस चुका है । पाई–पाई वसूल लिया था बभना ने । मक्खीचूस कहीं का ! बाबूजी अपनी बहादुरी को बखानते नहीं थकते कि किस तरह घाट के डोम से लड़कर ला पाए थे वे इस ‘दुर्लभ चीज’ को । नरक में भी ठेलाठेली । क्या करे इसका ? खिसियाकर निकाल कर फेंक देता है, मगर फिर मजबूर नजरों से देखता है । ऊपर तो ठीक–ए लगता है, तल्ला लगवा ले तो चार–छह महीने आराम से खींच ले जाएगा । उठा लेता है, मगर पैसा । . । ? ऊँह ! चिराँद में केले के थम्ब की छाल या छाक के पात काट कर तल्ला बना लेगा । .., लेकिन तब तक.. । ? कम से कम पानी ही मिल जाता ! मर जाएँगे क्या ?
मर ही जाता तो अच्छा होता । मुक्ति तो मिल जाती ! बाप ने कैसे फटकारा था उसे ! वही बाप जो बिगड़ैल बाभन राजपूतों के आगे कितने नरम स्वर में बोलता है, उसे काट खाने को दौड़ता है ।
‘मगर बाबूजी करते भी क्या ? और तुम भी खिसिया कर चल ही दिए । पानी तक नहीं पिए ।’ अन्दर से कोई टुहुँकता है ।
‘पानी पूछा किसी ने ? वे तो बाहर से आते ही सीता माई कह कर पिल पड़े ।’
‘जिद नहीं करनी चाहिए थी । तुम्हारी ही तरह कई और लोगों ने जिद की और दियारा पार नहीं कर सके, बीच में ही ‘टें’ बोल गए । साँझ तक झुलसती पड़ी रही देह । उन्हीं की पियासी आत्माएँ खींच कर ले आती हैं तुम जैसों को यहाँ मरने के लिए ।’
‘ऐसी गर्मी ! बाप रे !… । नहीं ‘बाप’ को नहीं पुकारना था ।’ मन को दूसरी ओर मोड़ता है, ‘कल लालाजी कौन तो एक ठो गाना, कि का तो कहते हैं, ‘कविता’ सुना रहे थे ।……’
‘भरी दुपहरी जेठ की, छाँहौ चाहति छाँह !’ माने कि छाँह भी छाँह माँगती है । वाह ! क्या कहा है ! मगन मन चला जा रहा है । चल नहीं, दौड़ रहा है । उसकी चाल सियारों की तरह । बस आ गए । सामने ही तो है उँचास पर चिराँद गढ़–मोरध्वज की नगरी ! धरम के लिए अपने बच्चे तक को चीर दिया आरा से । तब से यह कहानी कितनी बार दोहराती जाती रही । चीर–रहें है माई–बाप बच्चों को दूसरों के लिए । कहीं इसी बात के तलते आरा का नाम आरा तो नहीं पड़ा ?
क्या वह इस विश्व ब्रह्माण्ड में अकेले ही भटक रहा है ? नहीं, उसी की तरह कितने नाई न्यौता पहुँचाने के लिए भटक रहे होंगे ! कितने–कितने कँहार काँवर भर–भर कर बोझ से दबे आ–जा रहे होंगे । और भी कितने–कितने परजा–पउनी मर–खप रहे होंगे इस बज्जर दुपहरियाँ में ! पुरूब जनम की कमाई !
अरे ये तो कँहार जा रहे हैं गाते हुए डोली लेकर–…….
नाच !
अन्न नहीं, जल नहीं, दीन नहीं, दुनिया नहीं, जो कुछ है और जितना कुछ है, बस नाच है । उनकी एकमात्र मंशा थी कि उनका दल सबसे ऊपर हो, अद्वितीय । इसके लिए जो भी सुन्दर चीज जहाँ भी दिख जाती, वे उठा लाने का स्वप्न पालते । वे ऐसे डोलते मानो नचनियाँ न होकर कोई बादशाह हों, जो अपने विरुद्ध चल रहे षड्यंत्र का पता लगाने निकला हो !
‘जोगिया के गिरोह में फिरंगी राम नचनिया पुरसे–भर उछल जाता है ।’ एक सूचना ।
‘उसके समाजी भी तो देखो ।’ कुछ देर तक गोते लगाने के बाद जैसे इस रहस्य का सूत्र पकड़ पाते हैं शिव बालक, ‘वह ताल ही है जो फिरंगी राम को उछाल देता है, वरना तो वो वही फिरंगिया न है ।’
‘तुम लोग असल पैन्ट (प्वाइंट) को छोड़ दे रहे हो ।’ जगरूप ने टोंका ।
‘का है असल पैन्ट ?’
‘मुकुन्दी भाँड़ के पास जो नचनिया है, उसकी तान सीवान तक सुनाई पड़ती है । एक बार हम और महटर साहेब आधी रात को सीवान से उस तान को सुनकर चले तो चलते गए, चलते गए, चलते गए तीन कोस तक चलते गए एक उठनिया । ..’
‘तीन घंटे तक तान ही नहीं टूटी ?’ एक चुटकी ।
‘बीच में नदी–नार कुछ नहीं था ?’ दूसरी ।
‘अरे ऊ तान पे न सवार थे ।’ तीसरी ।
जगरूप अपनी बात की किरकिरी होते देख कुढ़ गया, ऊपर से जब जगदेव ने यह कह दिया, ‘मुकुन्दी में बात तो कोई होती नहीं ।’ तो अपने नायक की निन्दा पर खीझ गया, ‘तुम ही सबसे बड़े जानकार हो न ?’
‘ए भाई !’ भिखारी ने हस्तक्षेप किया, ‘एकरा में ‘झगरा’ कवन चीज के बा । . । ? हमको फिरंगी की पुरसे–भर की उछाल, जोगिया गिरोह के समाजी, मुकुन्दी के नचनिया की तान सब कुछ चाहिए, और वह सारा कुछ भी जो सबसे नीमन है, जेकरा पब्लिक पसन्द करती हो ।’
बाबूलाल बैल की तरह जूमते, कुछ बोलते नहीं, बस गुनते और धुनते रहते ।
जितनी ही जानकारियाँ मिलतीं वे और भी ज्यादा जानकारियों के लिए उकसातीं । मंथन की इस प्रक्रिया में आखिरकार वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते कि दल को अच्छे–अच्छे नाच देखते रहना चाहिए न सिर्फ नाच–गिरोहों के नाच, बल्कि गोंड नाच, धोबिया नाच, अहीर नाच, चमार, थारू, कुम्हार, नेटुआ, जट–जटिन के नाच भी !
सबसे पहले नटों का नाच नेटुआ ! लहँगा, कुर्ती, ओढ़नी में लवंडे पखावज और करताल की धुन पर बेहद अश्लील गीत पेश कर रहे थे हमारा जोबना में दूगो चवन्नी धइल बा । .., हमर जँघिया पे दू गो अठन्नी धइल बा । . । ! वे मशाल हाथ में लिए हुए नाच रहे थे, जिसकी लपटें उनके पसीने से नहाए चेहरे पर मचल रही थीं । नाचते–नाचते वे पखावज बजानेवाले के पास चले आते, फिर नाचते हुए दूर चले जाते । एक खास बात थी इस नाच में, बंशी । बाँस की बंशी को होठों से लगाकर फूँकते हुए, छेदों को उँगलियों से बन्द करते–खोलते अजब समाँ बन रहा था, खासकर तब, जब पखावज और बाँसुरी की जुगलबन्दी चलती और करताल धीमा पड़ जाता धातिंगा, धातिंगा । ..स्वर चाँड़ से धीमे पड़ते, तो बाँसुरी का स्वर वल्लरी की तरह लहरा उठता, जैसे कोई मस्त मतवाली नागिन फन निकालकर अपनी लाल–लाल जीभ लपलपा रही हो ।
लौटते हुए, इसी बात पर बतकही होती रही कि और जगहों पर पिपिहरी होती है पतले सुर के लिए, जबकि यहाँ बाँसुरी थी । काश ! अपने दल में भी कोई वंशी–बजवैया होता !
‘एक बार अहीर–नाच देख लेते तो अच्छा रहता, वहाँ भी बाँसुरी होती है ।’ जगरूप ने कहा ।
‘मै उनका नगाड़ा नहीं सुन सकता ।’ जगदेव भला कैसे चुप रहता ।
‘नगाड़ा तो कानपुरवाली नौटंकी में भी होता है । सोनपुर के मेले में नहीं देखा था ?’
जब बात इतनी आगे बढ़ गई तो बाबूलाल के लिए लाजमी हो गया कि वे इसका खुलासा कर ही डालें । बोले, ‘नरम, गरम दूनों होता है न नगाड़ा के साथ, देखोगे क्या तो एक ठो नगाड़ा होता है और एक ठो नगाड़ा का बच्चा ताशा, जैसे भैंस के साथ पाड़ा ! एक ताशा ठंढाया नहीं कि दूसर गरम ताशा हाजिर ! लेकिन, जे बा से, कि अहीर नाच में सिरिफ नगाड़ा, गरमे गरम आगे हम्म ! आगे हम्म ! नाचों में ठेंठ पहलवानी !’
‘जे जौन रही, उहे ना ओकर नाच में आई ।’ जगदेव को बोलने की जैसे जगह मिल गई ।
साँप बोले और नेवला चुप रहे ? जगरूप ने कहा, ‘पहले ई समझ लो कि पहलवानी आई कहाँ से ।’
‘कहाँ से ?’
‘बलराम जी से ।’
‘और बाँसुरी कन्हैया जी से यही न !’
‘हाँ ।’
‘तो क्या हुआ ?’
‘दूनो जन अहीर थे, इसलिए ।’
‘ए चुप ना रहबअ । कहाँ कन्हैया जी और बलदेव जी और कहाँ ई ऽऽऽऽ ! ऊ राजा, ऊ भगवान । उनकर बाँसुरी के तान पे मय (सब) गोपी लोग दौड़ल चलि आवें गाय–गोरू, चिरई–परेवा मुड़–मुड़ के ताके लागें एकरा से तो हमरे जइसन अमदी (आदमी) भी भाग जाला ।’
इस नोक–झोंक से अलग भिखारी कुछ और ही सोच रहे हैं, ‘कन्हैया जी और बलराम अहीर थे कितने गुमान से बोलता है यह गरीब जगरूप अहीर जिसकी तीन पुस्त लाला के यहाँ बनिहारी करते बीत गईं, पाँव में एक रुपए का जूता तक नसीब नहीं हुआ आज तक जिसे । मैं भला किस नायक पर गुमान करूँ ? कहाँ रख दूँ अपनी जातिगत हीनता को ? सबका एक–एक भगवान है, मेरा भगवान कहाँ है ?’
बाबूलाल कुछ बोलते नहीं । भिखारी को लगा, वे ढीले पड़ रहे हैं ‘अब.. । ?’
‘पहले एक गो गोंड़ का नाच देखेंगे ।’
‘कहाँ ?’
‘गाँव के थोरिके दूर पर है, सितवा के नइहरवा में । अगला पाख में पंचमी के ।’
गोंड का नाच उनके दुआर पर ही हो रहा था । खूंटियाई हुई धोती में पुरुष नर्तक पूरे दुआर पर फैले हुए थे और रावण के दसों सिरों की तरह नाचते हुए घेर रहे थे ‘झमकट, झमकट, झमकट–झमकट !’ लगता, जैसे दूर से कोई लहर बढ़ती चली आ रही है गरजती–मचलती हुई । बीच–बीच में टप्पे–सा उछाल देते लय को, फिर सम पर आ जाते । लहरें आ–आकर टूट रही थीं, मगर बोल समझ में नहीं आ रहे थे । वाद्य तेज, बोल अबूझ । बाबूलाल को देखा तो वे बड़े ध्यान से नर्तकों का पग–संचालन देख रहे थे ।
‘का बूझे ?’
‘लगता है, कोई जंगली जानवर हो, जिसे मारने के लिए घेर रहे हैं ।’
वे लौट रहे थे । पंचमी का चाँद जर्द होकर नीचे जा रहा था । धुँधली चाँदनी में पेड़ किसी विशालकाय जानवर की तरह खड़े थे, जैसे गोंडों द्वारा वहाँ के खदेड़े गए जंगली जानवर इधर भाग निकले हों ।’
‘ई नाच चलेगी ?’ अचानक बाबूलाल ने सवाल किया ।
‘ना ।’ भिखारी ने कहा, ‘लेकिन एकर परभाव गजब के बा । ..जैसे बहुत दूर से कोई घेरता हो, फाँस–सा कसता चला जाए चैता में भी झाल की आवाज ऐसे ही उठान पर चलती है ।’
रात छपरा टेसन के मुसाफिरखाने में काटनी थी । लैंप की मरियल रोशनी में गिरोह के सदस्य जमीन झाड़कर बैठ गए । किसिम–किसिम की आवाजें थीं । कहीं इंजन संट कर रहा था, कहीं यूँ ही अतिरिक्त भाप छोड़ रहा था, पान–बीड़ी–सिगरेट और चाह, कहीं किस्सा चल रहा था, कहीं गाना । कितने तरह से बोल सकता है आदमी भिखारी गुपीचुपी मारकर सोच रहे थे । बाकी लोग गमछे ओढ़कर निढाल हो गए थे ।
ई बाबूलाल कहाँ गए । जरूर चहवास (चाय की तलब) लगी होगी, कलकतिया आदमी हैं ।
बाबूलाल ने कंधे दबाकर इशारा किया, ‘भाँड़ का किस्सा चल रहा है हुआँ, चलो चलते हैं ।’
बेंच पर बैठे चूड़ीदार पाजामा–शेरवानी पहने दो आदमी बात कर रहे थे ।
‘किबला बेग साहब, भाँड़ों के बारे में अपनी भी बेहतर राय नहीं थी, बेबकूफ, भोंडे ।..कसम खुदा की, जब से वो वाकया हुआ, मेरे ख्याल ही बदल गए ।’
‘कौन–सा वाकया ?’
‘अरे वही दाग साहबवाला हजरत–ए–दाग जहाँ बैठ गए, बैठ गए ।’
‘दाग साहब ! क्या नाम लिया आपन े ! म्याँ, अब सुना ही डालिए ।’
‘दाग साहब खब्ती मिजाज के, एक शादी के जलसे में उन्होंने भाँड़ गिरोह के मालिक, जो खुद भी एक बड़ा फनकार था, की बेइज्जती कर दी ।’
‘तो ।. । ?’
‘तो क्या बला मोल ले ली ! हुआ यूँ कि जल्द ही एक दूसरे जलसे में उन दोनों का फिर आमना–सामना हो गया । अब सामने बैठे हैं दाग साहब, हिन्दोस्तान के अजीम शायर, स्टेज पर खड़ा है भाँड़ अजीम फनकार । बात–की–बात में भडैÞती रच दी उन पर । उसने स्टेज पर एक आदमी बुलाया, उसके हाथ में बन्दूक थमा दी । निशाना दाग साहब पर.’
‘फिर क्या हुआ ?’
‘फिर उसने पूछा ‘क्यों बे, शेर दिखाई पड़ा ?’
‘आदमी ने कहा, ‘जी सरकार !’
‘तो देख क्या रहा है, दाग…उल्लू के पट्ठे दाग…गधे दाग, अंधे दाग…हरामजादे दाग…अरे दाग, अक्ल के दुश्मन दाग…म्याँ क्या बताऊँ, पूरी महफिल हँसते–हँसते लोट–पोट ! और ‘दाग’ साहब तो पानी–पानी ! भाग खड़े हुए भरी महफिल से । भाँड़ साँड़ की तरह अभी भी खदेड़ रहा था, ‘देख भागने न पाए दाग, अबे अक्ल के दुश्मन दाग !’ ‘’
गाड़ी आ गई थी । दोनों अजनबी ट्रेन पर सवार होकर चले गए, छोड़ गए एक दाग भिखारी, बाबूलाल के दिल में अब भाँड़ की अदाकारी देखे बिना चैन नहीं ।
पुस्तकः सूत्रधार
लेखकः संजीव
विधाः उपन्यास
प्रकाशक ः राधाकृष्ण प्रकाशन

