Tue. May 26th, 2020

परमारथ के कारणे साधुन धरा शरीर : डॉ.नीलम खरे

  • 25
    Shares

डॉ.नीलम खरे,मंडला(मप्र) | परोपकार अथवा परहित के बारे में मान्यता है कि
परोपकार की भावना मनुष्य को महानता की ओर ले जाती है, तथा परोपकार से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है । ईश्वर भी प्रकृति के माध्यम से यह दर्शाता है कि परोपकार ही सबसे बड़ा गुण है, क्योंकि पृथ्वी, नदी अथवा वृक्ष सभी दूसरों के लिए ही हैं ।
कहा गया है कि,
“वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै,नदी न खर्चे नीर ।
परमारथ के कारणे, साधुन धरा शरीर ।”

परोपकार अर्थात् ‘पर+उपकार’ यानी दूसरों के लिए स्वयं को समर्पित करना व्यक्ति का सबसे बड़ा धर्म है । नदी का जल दूसरों के लिए है । वृक्ष कभी स्वयं अपना फल नहीं खाता है । इसी प्रकार धरती की सभी उपज दूसरों के लिए होती है । चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियाँ क्यों न हों परन्तु ये सभी परोपकार की भावना का कभी परित्याग नहीं करते हैं ।
वे मनुष्य भी महान होते हैं जो विकट से विकट परिस्थितियों में भी स्वयं को दूसरों के लिए, देश की सेवा के लिए अपने आपको बलिदान कर देते हैं । वे इतिहास में अमर हो गए । जब तक मानव सभ्यता रहेगी उनकी कुर्बानी सदा याद रहेगी ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस संदर्भ में बड़ी ही मार्मिक पंक्तियाँ लिखी हैं ।

यह भी पढें   नेपाल में कोरोना संक्रमितों की संख्या ५०० से अधिक, नयां २० संक्रमित पहचान में

”परहित सरिस धर्म नहिं भाई ।
पर पीड़ा सम नहिं अघमाई ।।”

उन्होंने ‘परहित’ अर्थात् परोपकार को मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म बताया है । वहीं दूसरी ओर दूसरों को कष्ट पहुँचाने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है । परोपकार ही वह गुण है जिसके कारण प्रभु ईसा मसीह सूली पर चढ़े, गाँधी जी ने गोली खाई तथा गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने सम्मुख अपने बच्चों को दीवार में चुनते हुए देखा ।
सुकरात ने विष के प्याले का वरण कर लिया लेकिन मानवता को सच्चा ज्ञान देने के मार्ग का त्याग नहीं किया । ऋषि दधीचि ने देवताओं के कल्याण के लिए अपना शरीर त्याग दिया। इसके इसी महान गुण के कारण ही आज भी लोग इन्हें श्रद्‌धापूर्वक नमन करते हैं ।
परोपकार ही वह महान गुण है जो मानव को इस सृष्टि के अन्य जीवों से उसे अलग करता है और सभी में श्रेष्ठता प्रदान करता है । इस गुण के अभाव में तो मनुष्य भी पशु की ही भाँति होता ।

यह भी पढें   जिला पुलिस कार्यालय बारा में कार्यरत ५ पुलिस कर्मचारी में कोरोना संक्रमण पुष्टी

‘मैथिलीशरण गुप्त’ जी ने ठीक ही लिखा है कि:
“यह पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे ।
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ।

अत: वही मनुष्य महान है जिसमें परोपकार की भावना है । वह निर्धनों की सहायता में विश्वास रखता है । वह निर्बलों का सहारा बनता है तथा खुद शिक्षित होता है और शिक्षा का प्रकाश दूसरों तक फैलाता है । परोपकार की भावना से परिपूरित व्यक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भावना को अपनाकर मानवता के कल्याण के लिए निरंतर अग्रसर रहता है ।वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव से भी ओतप्रोत होता है ।
हमारे समाज में सामान्य जन परोपकार के प्रति सजग नहीं हैं और अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । इसका साक्षात् प्रमाण बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में देखा जा सकता है जहाँ गरीब बीमार व्यक्तियों की कोई पूछ नहीं है । डाक्टर, नर्स सभी इन लोगों की उपेक्षा करते है ।
मानवीय संवेदनहीनता का पता अन्य दैवी आपदाओं- बाढ़, भूकंप, सूखा आदि स्थितियों में भी चलता है । कभी-कभी जब दंगे-फसाद होते हैं तो लालचियों की बन आती है और वे लूट-खसोट पर उतर आते हैं। ऐसी क्षुद्रताएँ हमार समाज के लिए अभिशाप हैं । अत: आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अंतर्मन में झाँक कर देखे और अपनी कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करे,तथा परसेवा का भाव निज अंतर्मन में धारण करे ।

यह भी पढें   लकडाउन में काठमांडू में दो मोटरसाइकिल आपस में टकराया, दोनों चालकों की मौत
डॉ.नीलम खरे
आज़ाद वार्ड-चौक
मंडला(मप्र)

-डॉ.नीलम खरे
आज़ाद वार्ड-चौक
मंडला(मप्र)-481661
(मो.9425484382)

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: