गजल : पारस कुंज
मिट्टी के हर पुतले को है मिट्टी में मिल जाना
जो करना है कर ले होगा लौट के फिर न आना
शम्मा कब है बदली बदला करता है परवाना
इन्सां का तो इस दुनिया में काम है आना-जाना
दुख-सुख का ही नाम है जीवन इससे क्या घबराना
जो भी किस्मत से मिल जाये प्रभु का गुन है गाना
माया का ये जाल है ऐ दिल माया की ये दुनिया
जो करता है जैसा वैसा कल है उसको पाना
अब तो वही होगा ऐ नादां ये कैसी मायूसी
करने से पहले न सोचा बाद में क्या पछताना
मजदूरी मजदूर है करता आखिर क्यूँ है करता
उसकी मांग से पहले दे दो उसका मेहनताना
‘पारस’ तुमको याद है रखना इस जीवन औरों के
हर मौके और हर मुश्किल में काम हमेशा आना
वरिष्ठ पत्रकार • कवि • लघुकथाकार
सम्पादक : ‘शब्दयात्रा’
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