Wed. Jul 15th, 2020

बलात्कार ? महिला मात्र की ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की समस्या है : श्वेता दीप्ति

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हर रोज एक नहीं, कई–कई बलात्कार की घटनाओं का समाचार हमारी निगाहों के सामने से गुजरता है, और हम संवेदनहीन बने रहते हैं । अब तो लगता है हमारी आँखें भी अभ्यस्त हो चुकी हैं इन समाचारों को देखने या पढ़ने की

सम्पादकीय,हिमालिनी  अंक  दिसंबर 2019,हर वर्ष की तरह यह वर्ष भी गुजर ही गया । एक बार फिर कैलेन्डर बदलेंगे और तारीखें बदल जाएँगी । अगर इस सब के बीच कुछ नहीं बदलता है तो वह है आज के युग का इंसान, जिसे इंसान कहा जाय या नहीं, यह सोचने का विषय बन गया है । मनुष्य में जैसे–जैसे संवेदनाओं का स्तर गिरता जा रहा है, वह पशुवत जीवन जीने लगा है । आज के मनुष्‍य में सभी तरह की पाशविक प्रवृत्तियां बढ़ गई हैं । परिवार टूट रहे हैं, हिंसा, बलात्कार और ईष्र्या का स्तर बढ़ गया है ।

इस सब का कारण यह है कि मनुष्‍य खुद से दूर चला गया है । दुनिया को आज विकास की अँधी दौड़ के बजाय प्रेम, हास्य और संवेदनाओं की ज्यादा जरूरत है । सामान्य जन जीवन में सौ परेशानियाँ हैं, समस्याएँ हैं जिसके लिए हम कभी अपनी व्यवस्था, तो कभी सरकार या कानून को दोष देते हैं । किन्तु इन सबके बीच जो एक सबसे घृणित कर्म है बलात्कार और जिस तरह इसकी घटनाओं में बढोत्तरी हो रही है, उसके लिए हम किसे दोष दें ? विकास और इन्टरनेट की इस छलावा भरी दुनिया में कुछ ऐसी बातें हम से जुड़ गई हैं, जिनसे हम चाह कर भी दूर नहीं जा सकते । परन्तु यही हमारे विकास के साथ–साथ मानसिक पतन का कारण भी बनता जा रहा है । आज इंसान जानवर से भी बदतर हो गया है ।

शिक्षक, साथी, प्रेमी, सुरक्षाकर्मी, ड्राइवर, खलासी, हमारे सम्मानित प्रतिनिधि, और तथाकथित गुरूओं की फौज, किसी भी पेशा को अगर देखा जाय तो वहाँ बलात्कार के आरोपी नजर आ जाते हैं

औरत संवेदनाहीन समाज, सरकार और कानून के बीच जीने को विवश वह आत्मा है, जो सिर्फ शरीर ही समझी जा रही है । हर रोज एक नहीं, कई–कई बलात्कार की घटनाओं का समाचार हमारी निगाहों के सामने से गुजरता है, और हम संवेदनहीन बने रहते हैं । अब तो लगता है हमारी आँखें भी अभ्यस्त हो चुकी हैं इन समाचारों को देखने या पढ़ने की । बलात्कार करने वालों की अगर श्रेणी देखें तो यह लगता है कि किसे शिक्षित कहें किसे अशिक्षित ? इस कुकृत्य में सभी वर्ग के पुरुष शामिल नजर आते हैं । परिवार के अन्य परिजन ही नहीं पिता भाई भी इस कुकृत्य में शामिल हैं । शिक्षक, साथी, प्रेमी, सुरक्षाकर्मी, ड्राइवर, खलासी, हमारे सम्मानित प्रतिनिधि, और तथाकथित गुरूओं की फौज, किसी भी पेशा को अगर देखा जाय तो वहाँ बलात्कार के आरोपी नजर आ जाते हैं ।

यह कैसी यौनिक मानसिकता है जहाँ न अपनों का, न समाज का और न ही कानून का डर है ? शायद इसलिए कि दोषियों को भी पता है कि कानून में फँसने का अगर एक छिद्र हैं तो उससे निकलने के सौ छिद्र कानूनी दाँव पेच में मिल जाते हैं । इस दुष्कर्म के लिए नेपाल का कानून कठोर नहीं है । जबकि किसी भी अपराध को कम करने के लिए कठोर सजा का प्रावधान आवश्यक होता है । पड़ोसी राष्ट्र भारत में आए दिन होने वाले इस जघन्य अपराध के लिए फाँसी की सजा का प्रावधान तय हो चुका है ।

आज नेपाल में भी ऐसे कठोर कानून की आवश्यकता है । सरकार का ध्यान इस पर गम्भीरता से जाना चाहिए, पर कई बार तो राज्य ही ऐसे अपराधियों का संरक्षक बन जाता है । इसका उदाहरण निर्मला हत्याकांड है, जिसका आरोपी आज तक सजा से मुक्त है । हमें यह समझना होगा कि बलात्कार की घटना किसी एक महिला मात्र की समस्या नहीं है, बल्कि एक परिवार, समाज और सम्पूर्ण राष्ट्र की है । एक बीमार मानसिकता से ग्रस्त राष्ट्र उन्नति और समृद्धि की राह पर कभी अग्रसर नहीं हो सकता । हम उस संस्कृति के परिचायक हैं जहाँ देवियों की पूजा होती है, जहाँ आज भी जीवित कुमारी देवी की पूजा का प्रचलन है । क्या ऐसे समाज में हम सब मिलकर इस समस्या का समाधान नहीं ढूँढ सकते हैं ? इसी सद्भाव को प्रण बनाएँ और एक नई सुबह का आगाज करें ।

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