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क्या भारत की राजनीति लगातार नयाँ इतिहास रच रही है ?: श्वेता दीप्ति

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डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी  अंक  दिसंबर 2019 । वर्तमान में भारत की राजनीति पर सम्पूर्ण विश्व की निगाहें टिकी हुई हैं । आरोपों– प्रत्यारोपों के बीच भारत की राजनीति इन दिनों लगातार नया इतिहास रच रही है । ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के नारे को सच करती हुई भाजपा सरकार लगातार उन मुद्दों पर काम कर रही है जो वर्षों से सिर्फ चुनावी मुद्दा था, किन्तु उसपर कभी ध्यान नहीं दिया जा रहा था । जिसकी सबसे अहम कड़ी रही कश्मीर का ३७० और रामजन्म भूमि विवाद, जिसपर न जाने कितने वर्षों से राजनीति हो रही थी । लगता था कभी इसका कोई समाधान सामने आएगा ही नहीं । अल्पसंख्यकों के हित की बात कर के भारत में वर्षों तक तुष्टिकरण की राजनीति होती रही है । ये वो हैं जो वोटबैंक तो बनते हैं किन्तु इन्हें वोटबैंक तक ही सीमित रखा जाता है । विकास और आधुनिक शिक्षा से दूर अपनी ही गलियारों में बँधा यह समुदाय, इसको ही अपना महत्तव समझते रहे । इन्हें समय पर सिर्फ भजाया गया और जिसका खामियाजा एक समुदाय ही नहीं दोनों ही भुगतती रही । किन्तु वर्तमान सरकार इन सभी मसलों पर गम्भीर है और लगातार इस पर काम भी कर रही है ।

तीन तलाक, तीन सौ सत्तर, रामजन्म भूमि और एनआरसी के बाद नागरिकता संशोधन विधेयक का आना और कानून बनना बताता है कि वर्तमान सरकार किसी भी कड़े निर्णय को लेने से नहीं हिचक रही है । नेशनल सिटिजन रजिस्टर (एनआरसी)के निर्माण का मकसद असम में रह रहे घुसपैठियों की पहचान करना था, जबकि नागरिकता संशोधन बिल का मकसद पड़ोसी मुस्लिम देशों में रह रहे स्थानीय अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों को नागरिकता देना है, जो वहां की बहुसंख्यक आबादी द्वारा सताए जा रहे हैं । नेशनल सिटिजन रजिस्टर और नागरिकता संशोधन विधेयक को विरोधी पक्ष एक ही मान रहे हैं जिन्हें समझना आवश्यक है ।

क्या है नेशनल सिटिजन रजिस्टर (एनआरसी) ?
एनआरसी यानी नेशनल सिटिजन रजिस्टर, इसे आसान भाषा में भारतीय नागरिकों की एक लिस्ट समझा जा सकता है । एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं । जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं, उसे अवैध निवासी माना जाता है ।
असम भारत का पहला राज्य है जहां वर्ष १९५१ के बाद एनआरसी लिस्ट अपडेट की गई । असम में नेशनल सिटिजन रजिस्टर सबसे पहले १९५१ में तैयार कराया गया था और ये वहां अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की कथित घुसपैठ की वजह से हुए जनांदोलनों का नतीजा था । इस जन आंदोलन के बाद असम समझौते पर दस्तखत हुए थे और साल १९डट में सिटिजनशिप एक्ट में संशोधन कर उसमें असम के लिए विशेष प्रावधान बनया गया ।

इसके बाद साल २०ण्छ में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में असम सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी आसू के साथ–साथ केंद्र ने भी हिस्सा लिया था । इस बैठक में तय हुआ कि असम में एनआरसी को अपडेट किया जाना चाहिए । सुप्रीम कोर्ट पहली बार इस प्रक्रिया में २०ण्ढ में शामिल हुआ और २०१४ में असम सरकार को एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया । इस तरह २०ज्ञछ से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह पूरी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हुई ।
घज्ञ अगस्त २०१९ को एनआरसी की आखिरी लिस्ट जारी की गई और १९,ण्ट,टछठ लोग इस लिस्ट से बाहर हो गए ।

नागरिकता संशोधन विधेयक
भारत सरकार द्वारा लाया गया यह विधेयक जो अब विरोधों के बीच कानून बन चुका है ।नागरिकता संशोधन बिल २०१९ के तहत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के छह अल्पसंख्यक समुदाय हिंदू, जैन, सिख, पारसी, बौद्ध और ईसाई जो घज्ञ दिसंबर २०१४ से पहले भारत आए हैं, उन्हें नागरिकता देने का प्रावधान है । यह बिल भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होगा । इस बिल के लागू होने के बाद लाभार्थी भारत के किसी भी राज्य में रह सकते हैं ।

भारतीय जनता पार्टी यह मानती है कि इन ट अल्पसंख्यक समाज के लोगों ने पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में बुरे भेदभाव और धार्मिक अत्याचार को झेला है । इन लोगों के पास भारत के अलावा किसी दूसरे जगह जाने का विकल्प नहीं है । यह बिल पश्चिमी बॉर्डर या पाकिस्तान के जरिये देश में आये प्रवासियों को राहत देगा । मौजूदा नागरिकता बिल प्रवासियों को नागरिकता के लिये अप्लाई करने के लिये योग्य बनाएग । प्रस्तावित नियमों के मुताबिक, राजय सरकार और जिला प्रशासन की जांच और सिफारिश के बाद ही नागरिकता प्रदान की जाएगी ।वहीं इस नागरिकता संशोधन बिल के जरिए अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को वैध रूप से भारतीय नागरिकता दी जाएगी ।

इन दोनों ही निर्णयों को जहाँ काफी समर्थन मिल रहा है वहीं इसका कुछ राजनीतिक दल और प्रांतों में विरोध जारी है । वैसे भी परिवर्तन इतनी आसानी से अपना स्थान नहीं बना पाता है । पर यह भी सच है कि देर से ही सही किसी भी परिवर्तन को स्वीकार कर ही लिया जाता है । आजादी के बाद भारत के विभाजन का दर्द भी वहाँ की जनता ने स्वीकार कर ही लिया था और उसी से उपजे कई समस्याओं के समाधान को भी पक्ष और विपक्ष स्वीकार कर ही लेगा ।

विरोधी मानते हैं कि नागरिकता (संशोधन) बिल भारत के उस मूल विचार (आइडिया ऑफÞ इंडिया) के खिलाफÞ है, जिसकी बुनियाद भारत के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने रखी थी । जबकि सरकार का मानना है कि यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था क्योंकि इससे संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं हो रहा है । सरकार यह मानती है कि नागिरकता (संशोधन) के जिस विधेयक को कानून बनाया गया है वह १९५५ के नागरिकता कÞानून में बदलाव करने के लिए है ।

१९५५ का कÞानून भारत के बंटवारे और बड़ी तादाद में अलग–अलग धर्मों के मानने वालों के भारत से पाकिस्तान जाने और पाकिस्तान से भारत आने की भयावह परिस्थिति में बनाया गया था । जबकि उस समय नए बने दोनों देशों के बीच जनसंख्या की पूरी तरह से अदला–बदली नहीं हो सकी थी । उस समय भारत ने तो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश बनने का फÞैसला किया, लेकिन, पाकिस्तान ने १९छट में खÞुद को इस्लामिक गणराज्य घोषित कर दिया था । खÞुद को इस्लामिक गणराज्य घोषित करने वाला पाकिस्तान संभवतः दुनिया का पहला देश था । पाकिस्तान ने इस ऐलान के साथ ही अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तमाम चेतावनियों से दरकिनार कर लिया था । क्योंकि जिन्ना की १९द्धड में ही मौत हो गई थी । धीरे–धीरे पाकिस्तान एक धार्मिक देश में तब्दील होता गया । इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान में रहने वाले गÞैर मुस्लिम समुदायों, खÞास तौर से हिंदुओं और ईसाइयों की मुसीबतें बढ़ने लगीं । पाकिस्तान में गÞैर मुस्लिम समुदायों पर जÞुल्म बढ़े, तो वहां से इन समुदायों के लोगों का फिर से पलायन होने लगा ।

इन समुदायों के लोगों ने भाग कर भारत में पनाह ली । इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान में गÞैर मुस्लिम समुदायों की कुल आबादी में हिस्सेदारी घट कर दो फÞीसदी से भी कम रह गई । कहा जाता है कि भारत के बंटवारे के बाद कÞरीब ४७ लाख हिंदू और सिख पाकिस्तान से भाग कर भारत आए । इन हालातों में भारत के १९५५ के नागरिकता कÞानून में बदलाव की जÞरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी, ताकि उन लोगों की मांग पूरी की जा सके, जिन्होंने अपना घर–बार छोड़ कर भारत को अपने देश के तौर पर चुना था । लेकिन वो बेमुल्क के लोग थे । उनकी कोई गÞलती न होने के बावजूद वो आजतक शरणार्थी की तरह भारत में रहने को मजबूर थे । सरकार के अनुसार नागरिकता (संशोधन) विधेयक लंबे समय से चली आ रही इसी जÞरूरत को पूरा करने के लिए लाया गया है । मोदी सरकार के इस विधेयक में अफÞगÞानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से संबंध रखनेवाले छह मजÞहबों हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी के उन लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है, जिन्होंने या तो भारत में गÞैरकÞानूनी तौर पर प्रवेश किया हो या यहां आने के बाद उनके कÞागÞजात एक्सपायर्ड हो गए हों ।

भारत के मूल नागरिकता कÞानून के तहत किसी को भी भारत का नागरिक बनने के लिए लगातार ज्ञज्ञ साल तक भारत में रहने की शर्त पूरी करनी होती है और इसमें से भी दरखÞ्वास्त देने के पहले के बारह महीने तक अबाध रूप से भारत में रहने की शर्त पूरी करनी होती है । लेकिन सिटिजÞनशिप अमेंडमेंट बिल, इन तीन देशों से आए छह धर्मों के शरणार्थियों के लिए नागरिकता हासिल करने के लिए ज्ञज्ञ साल भारत में रहने की शर्त को घटा कर ६ साल करता है । सरकार का कहना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफÞगÞानिस्तान में धार्मिक आधार पर होने वाले जÞुल्म की मार्मिक हकÞीकÞत को ध्यान में रखते हुए लोगों को राहत देने की कोशिश है । धार्मिक आधार पर लोगों पर होने वाले जÞुल्म एक तल्खÞ हकÞीकÞत हैं । इन देशों में अल्पसंख्यकों की हालत बहुत ही निराशाजनक रही है, यहां तक कि १९५१ में पश्चिम पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या भी पाकिस्तान में १.६५ पर स्थिर रही है । लेकिन, कुल मिलाकर, पाकिस्तान की आबादी में अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी १९४० के अंत में लगभग द्दघ५ से घटकर वर्तमान में ३.५५ हो गई । जातीय रूप से विविध अफगानिस्तान में गैर÷मुस्लिम अल्पसंख्यक व्यावहारिक रूप से अस्तित्वहीन हैं, और संपन्न हिंदू और सिख समुदायों को पिछले चार दशकों में प्रारंभिक गिरावट का सामना करना पड़ा है ।

नागरिकता (संशोधन) विधेयक के खिलाफÞ एक तर्क ये भी दिया गया है ये संविधान के अनुच्छेद १४ का उल्लंघन करता है । संविधान का ये अनुच्छेद सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है । पर गौर किया जाय तो नागरिकता (संशोधन) विधेयक की मदद से वैसे नागरिक जो भारत में अनागरिक बन कर रह रहे हैं उन्हें भारत के दूसरे नागरिकों की तरह बराबरी का अधिकार मिलेगा, जो उन्हें अब तक नहीं मिल पा रहा है ।

भारत का यह नया कानून ओवरसीजÞ सिटिजÞन्स ऑफÞ इंडिया यानी ओसीआई कार्डधारकों से जुड़े नियमों में भी बदलाव करेग । १९५५ के नागरिकता कÞानून के मुताबिकÞ कोई भी शख्स जो विदेश में रहता है वो अगर भारतीय मूल का है (मसलन पहले भारत का नागरिक रहा हो या फिर उसके पूर्वज भारत के नागरिक रहे हों, या उस के जीवनसाथी भारत के रहने वाले हों), तो वो अपना नाम ओसीआई के तहत दर्ज करा सकता है । इस वजह से उसे भारत में आने–जाने, काम करने और अध्ययन करने का अधिकार मिल जाएगा । नागरिकता (संशोधन) विधेयक स्पष्ट करता है कि इसके प्रावधान अरुणाचल प्रदेश, मिजÞोरम और नागालैंड पर लागू नहीं होंगे । क्योंकि ये राज्य इनर लाइन परमिट (क्ष्ीए) के दायरे में आते हैं । साथ ही साथ नागरिकता (संशोधन) विधेयक, असम, मेघालय, मिजÞोरम और त्रिपुरा के आदिवासी बहुल इलाकÞों (जिन्हें संविधान की ६ अनुसूची के तहत परिभाषित किया गया है) पर भी लागू नहीं होग ।
इनर लाइन परमिट, भारत के नागरिकों को कुछ खÞास इलाकÞों में जÞमीन या संपत्ति खÞरीद कर बसने से रोकता है । इसकी वजह से वो वहां नौकरी भी नहीं कर सकते हैं । ऐसे में जाहिर है कि इनर लाइन परमिट के ये प्रावधान भारत की नागरिकता हासिल करने वाले नए लोगों पर भी लागू होगा । ताकि वो स्थानीय रहन–सहन को प्रभावित न कर सके ।

क्यों हो रहा है पूर्वोतर राज्यों मे विरोध
असम में कई तरह की जाति–जनजातियाँ रहती हैं जिनकी संख्या आज कम है और वो उपेक्षित भी हैं । उनकी भाषा को जिस तरह से पहचान मिलनी चाहिए थी, वैसी पहचान नहीं मिल पाई है । उनके समाज में इस बात का डर है कि उनकी भाषा और संस्कृति धीरे–धीरे समाप्त हो रही है और ये बिल कहीं ना कहीं उनके मन में और शंका पैदा करता है । असम के गÞैर–आदिवासी इलाकÞों की ये चिंता है कि इस कÞानून से उनके इलाकÞे में रह रहे अवैध घुसपैठियों को फÞायदा होगा । इन घुसपैठियों में से जÞ्यादातर बांग्लादेश से हैं । जिनके बारे में स्थानीय लोगों को डर है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक की मदद से इन घुसपैठियों को आधिकारिक रूप से उनके इलाकÞों मे बसने का मौकÞा मिल जाएगा । असम के एक बड़े इलाकÞे, खÞास तौर से कृषि प्रधान इलाकÞों और चाय बागÞानों में विरोध किया जा रहा है ।

इसकी वजह ये है कि इन इलाकÞों पर बांग्लादेश से घुसपैठ करने वालों का काफÞी दबाव है । १९७१ में भारत–पाकिस्तान के बीच युद्ध और बांग्लादेश के जन्म से पहले बड़ी तादाद में हिंदू समुदाय के लोग भारत में पनाह ले रहे थे । ये सब उस समय पाकिस्तान की सेना के जÞुल्मों से बचने के लिए भारत आ रहे थे, जो चुन चुन कर पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं को निशाना बना रही थी । इन शरणार्थियों में से हिंदुओं को शरणागत और मुस्लिमों को बहिरागत यानी घुसपैठियों के तौर पर वर्गीकृत करने की कोशिश हुई थी । असम के मूल निवासियों को इस बात की आशंका है कि कानून बदलने से बांग्लादेश से आए हिंदुओं को नागरिकता मिल जाएगी । ये बांग्लादेशी हिंदू असम के मूल निवासियों के अधिकारों को चुनौती देंगे और असम के मूल निवासियों की संस्कृति, भाषा, परंपरा, रीति(रिवाजों पर असर पड़ेगा । उनका कहना है कि असम अब और शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता

नागरिकता संशोधन बिल२०१९ के तहत नागरिकता के लिए भारत में निवास की समय–सीमा २०१४ तय है । वहीं, असम में प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों का कहना है कि असम में १९५१ से १९७१ तक लाखों शरणार्थी आए । अब असम और शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता । केंद्र सरकार ने नए कानून से १९डछ के असम समझौते का उल्लघंन किया है । इन हालातों में भारत के राजनेताओं को देश में तेजÞी से बदलते सामाजिक स्वरूप और क्षेत्र के भू राजनीतिक समीकरणों में आ रहे बदलावों को समझने की और सही व्याख्या के साथ समझाने और आश्वस्त करने की जÞरूरत है । किसी भी नए कदम और बदलाव पर विरोध का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है किन्तु सभी को विश्वास में लेना आवश्यक है । इसके बाद ही नागरिकता (संशोधन) विधेयक को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ–साथ मानवाधिकार के नजÞरिए से देखा जा सकेगा । वो लोग जिन्हें देश के बंटवारे की वजह से पैदा हुए अपने देश में रहन सहन के बेहद मुश्किल हालात की वजह से भाग कर भारत में पनाह लेनी पड़ी थी । जो धार्मिक उग्रवाद और सामाजिक भेदभाव की वजह से भारत आने को मजबूर हुए थे । वो लोग नागरिकता (संशोधन) विधेयक की वजह से शरणार्थी कहे जाने के अपमान के बिना, बराबरी से भारत में रह सकेंगे ।

मुसलमानों की असंतुष्टि पर भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत के मुसलमान भारतीय नागरिक थे, हैं और बने रहेंगे । शाह ने कहा कि विधेयक में उत्पीड़न का शिकार हुए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है । शाह ने इस विधेयक के मकसदों को लेकर वोट बैंक की राजनीति के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए देश को आश्वस्त किया कि यह प्रस्तावित कानून बंगाल सहित पूरे देश में लागू होगा । उन्होंने इस विधेयक के संविधान विरूद्ध होने के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि संसद को इस प्रकार का कानून बनाने का अधिकार स्वयं संविधान में दिया गया है । उन्होंने यह भी उम्मीद जतायी कि यह प्रस्तावित कानून न्यायालय में न्यायिक समीक्षा में सही ठहराया जाएगा । उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे भारत के नागरिक हैं और बने रहेंगे ।
विरोधों और आरोपों के बीच भारत की अधिकांश जनता ने सरकार के इस कदम पर अपना समर्थन जताया है और खुलकर इस कानून का स्वागत भी किया है । अब आम जनता की निगाहें मोदी सरकार के अगले कदम पर टिकी है । जिस तरह मोदी सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने में लगी है उसके बाद अब कॉमन सिविल कोड,जनसंख्या नियंत्रण कानून उसके एजेंडे में सबसे उपर नजर आ रहे हैं । भारतीय जनता इंतजार केवल इस बात का कर रही है कि मोदी के सपने को मुमकिन बनने वाले अमित शाह का अगला एजेंडा क्या होगा ?

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