चराचर में विराजमान, घट घट वासी हे राम – जय श्रीराम : वसन्त लोहनी
जय श्रीराम
अपने मन का बादशाह
खुद बनकर जो जिए हैं
वह दूसरे को नीचे नहीं समझते
उनके हर लफ्ज़ से
कुछ निकलता ही नहीं
अलावा प्रेम
अलावा बराबरी
जैसे परबरदिगार ने बनाया है
यह उद्घोष है विश्वास का
अपने आप के ऊपर
जिसे नीली छतरी वाले ने संभाला
इस बात को वही समझेंगे
जिन्होंने जिंदगी सीखी है
जिन्होंने जिंदगी जिया है
इसी अल्फ़ाज़ में
इसी आवाज में
लेकिन अभी के बस्ती में
पाखंडियो के राज हैं
सबको भोंदू बना रहे हैं
खुद विदूषक बनकर
प्रभु के नाम लेकर
उनके ही गुणगान गाकर
सफाचट कर रहे हैं
राम के नाम लेकर
उन्हीं के नाम में विशेषण डालकर
सबको बना रहे हैं
मस्तराम ! मस्तराम !!
जी हां, मस्तराम
सरहद की वारपार
राजनीति के अन्दर भी राजनीति
सिर्फ आरती नही
ज्वारभाटा उतार रहे है
बुद्धि विन्यासों की
अमूर्त चिन्तन, उत्खनन और समायोजन की
राम के नाम मे
राम जन्मभूमि के लिए
बुद्ध साकेत के लिए
उछलता मत-मतान्तर में
कोई लड रहे हैं
कोई मृत्यु वरण में नाटक में
दिन रात तुले हुए हैं
अयोध्या के आधा मठ-मन्दिर
अपराधियों अड्डा
कोई धर्मान्ध, कोई दवित
कोई घंटा हिला रहे हैं
अब तो सिर्फ देखना है
रामखली से लिखा नाम से
क्या क्या बना लेंगे
राम गंगरा और रामचिरैया
कहा कहा उडाएंगे
पता नहीं कब क्या होगा ?
देखने के लिए जो बचा है
सिर्फ इतना ही है –
राम के नाम में
हर दिन जो विशेषण बनाते हैं
प्रभु, कब होगा पूर्ण विराम
आपकी नाम जनता को बेचकर
अखाड़ा से रियासत तक
जो रबडी खा रहे हैं
कब होगा उसके अन्त प्रभु
चराचर में विराजमान
घट घट वासी हे राम
जय श्रीराम



