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शायद यही दुनिया है, मोह माया है जिसने इंसानों को जकड़ रखा है : बसन्त चौधरी

 

सोच !

निकल गया दम्भ, अहंकार या घमंड । सब चकनाचूर हो गए । बदल गई सोच । समझ तो कुछ बची ही नहीं । पिट गई, सिमट गई मैं और मैं की सोच ! क्या यही है जीवन का सत्य ?

बसन्त चौधरी, हिमालिनी,२०२० डिसेम्वर अंक |मानव–जन्म के साथ ही कुछ भाव या मनोविकार हमारे साथ–साथ चलते हैं । जिनमें अहंकार इर्ष्या और अहम् भी शामिल हैं । ‘जो हूँ सो मैं हूँ’ यह भावना मनुष्य के साथ चलती है । कभी पीछा नहीं छोड़ती । ये मनोविकार प्राणी को किसी न किसी रूप में हमेशा जकड़े रहते हैं । इनसे छुटकारा पाने के लाख प्रयत्न भी कम पड़ जाते हैं । इनमें से ही एक भाव है अहंकार का । जो सदैव इंसान के भीतर पनपता रहता है । अहंकार का त्याग नहीं किया जा सकता क्योंकि अहंकार का कोई आस्तित्व नहीं है । अहंकार केवल एक विचार है । उसमें कोई सार नहीं है । अहंकार इसलिए है क्योंकि इंसान स्वयं को नहीं जानता । जिस क्षण वह स्वयं को जान लेगा, उसके भीतर अहंकार पैदा ही नहीं पाएगा । अहंकार अंधकार के समान है, अंधकार का अपना कोई सकारात्मक आस्तित्व नहीं होता, यह बस प्रकाश का अभाव है । जिस अहंकार को मानव अपने अंदर पैदा करता है वह सही मायने में मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्ति है । जो अधिकतर शक्ति, धन और सत्ता के कारण उत्पन्न होता है,

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तभी तो मनुष्य कहते नहीं अघाता –यह मैं हूँ, यह है मेरा खानदान, मेरा इतना बड़ा कारोबार है या मैं इतना ज्ञानी हूँ कि सारे संसार में मेरे ज्ञान का डंका बजता है ! हर इंसान सिर्फ आत्म रति में डूबा हुआ है ।

किंतु देखिए, इस वर्ष २०२० और इसके साथ आए ‘कोविड १९’ नामक एक अदृश्य सुक्ष्म जीवणु को जिसने आज मनुष्य के इस अहंकार को गहरा धक्का दिया है इंसान यह समझता था कि उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने और उस पर नियंत्रण करने की क्षमता प्राप्त कर ली है । इसी सोच के तहत वह प्रकृति संपदा के साथ खिलवाड़ करता रहा है । जबकि हम भी यह जानते हैं कि प्रकृति ने जब–जब अपना रूप दिखाया है तब–तब उसके समक्ष इंसान लाचार नजर आया है । आज कोरोना ने मनुष्य के ज्ञान और समझ की अपूर्णता और सीमाओं को सामने ला दिया है ।

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यह समस्त विश्व को वश में कर चुका है । ‘मैं’ नाम के रोग को दूर कर दिया है । महीनों तक ज्ञानी, विज्ञानी ये पूरा संसार दुबका रहा अपने दड़बों में । भूल गया मैं और मेरा सब कुछ । सोचता रहा जान बचे तो कैसे बचे । न खानदान याद रहा, न साम्राज्य ! इन्हें जाकर सँभालना तो बहुत बड़ी बात है ।

निकल गया दम्भ, अहंकार या घमंड । सब चकनाचूर हो गए । बदल गई सोच । समझ तो कुछ बची ही नहीं । पिट गई, सिमट गई मैं और मैं की सोच ! क्या यही है जीवन का सत्य ?

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शायद हाँ, किन्तु सत्य के दर्शन के बाद भी इंसान के अन्दर की भावना मर नही पाई, जीवन है या नहीं इस डर में भी बहुत ऐसे हैं जो आज भी अहंकार और साजिश छल कपट को अपने अन्दर से निकाल नहीं पाए हैं । जीवन का सच यह भी है कि इंसान अपने इंसानी गुण को कुछ समय के लिए विस्मृत करता है, परन्तु अपने भीतर से निकाल नहीं पाता । सोचता हूँ अगर इंसान अपने भीतर से इन मनोविकारों को निकाल पाता तो वह देवत्व को प्राप्त कर लेता । किन्तु इंसान तो महज इंसान है वह भला देवता क्यों बनने लगा ? वैसे देवता भी इन भावों से अछूते कहाँ रहे हैं फिर इंसान इस चोले से बाहर कैसे निकल सकता है । शायद यही दुनिया है, मोह है माया है जिसने हम इंसानों को जकड़ रखा है ।

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