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जय जगद्जननी ! तुमको नमन शतवार है ।
आज पावन पञ्चमी, शुभ दिवस मंगलवार है ।।
थी यही शुभ पञ्चमी जब राम, शिव धनु तोड़कर ।
सीता विवाही जनकपुर में, अवध नाता पावनी ।।

है कथा त्रेता समय की , परम् पावन पावनी ।
नारी जगत के लिये है, यह शुभ मंगलदायिनी ।।
मिथिला निवासी हो गये व्याकुल जभी अकाल से ।
तब किया विनती सभी ने, जा जनह महिपाल से ।।

हे महीपति ! मही के यदि बक्षः पर तुम हल चलादो ।
भाल से श्रम बिन्दु की एक बूंद धरती पर गिरा दो ।।
तो गगन से गिरेंगी इस धरा पर जलाधार भारी ।
मेदनी के गर्भ से प्रकटेगी तब मिथिला कुमारी ।।

ज्यों हीं जनक ने हल चलाया फंसी एक सन्दूक भारी ।
खोलकर देखा जभी सबको हुआ आश्चार्य भारी ।।
वालिका एक सो रही थी, चौंक कर रोने लगी ।
गगन से उस समय ही वर्षा विकट होने लगी ।।

नगरवासी हर्ष से सव नाचने गाने लगे ।
अपने अपने भवन को सब प्रेम से जाने लगे ।।
महल में पृथ्वी सुता को ले जनक जी आ गये ।
ताप रबि का कम हुआ आनन्द घन नभ छागये ।।

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रानी सुनयना वक्ष से, लेकर सुता चिपटालिया ।
श्वेत कोमल वस्त्र में नवजात शिशु लिप्टा लिया ।।
आपही पय द्वे पयोधर से निकल चूने लगा ।
धीरे धीरे कर सुकोमल वक्ष को छूने लगा ।।

ढाँक आँचल से सता को मुख में स्तन दे दिया ।
भूंख की मारी चिंहुक कर दूध जी भर के पिया ।।
संग सखियों को लिवा उपवन में वह जाने लगी ।
वाटिका से चुनके सुन्दर फूल फल लाने लगी ।।

मिथिला किशोरी अब युवा वय की तरफ बढने लगी ।
विधु वदन पर काँन्ति छायी चपलता घटने लगी ।।
निखर आये अंग शौरभ, नयन मादक हो गये ।
जाने कहाँ पर बालपन के वे चपल क्षण खो गये ।।

एक दिन अर्चन भवन, जब लीपने सीता गई ।
फोहर कुछ शिवधनुष तल पर बैठकर देखत भई ।।
वाम कर से उठा धनु दक्षिण सहस्त से लीपकर ।
रख दिया फिर उसी ढिगपर शिव धनुष सुन्दर सुघर ।।
देखकर यह कृत्य राजा जनक हतप्रभ रह गये ।
सोंचते ही सोंचते आवगे में वे बह गये ।।
सीता से सम्बन्ध पतिका वह नृपति ही जोडेगा ।
शिव धनुष को जो नृपति निज बाहुवल से तोडेगा ।।

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ठाना स्वयंवर सीय का आये नृपति वहु देश से ।
बीर, बल शाली, महायोद्धा अनन्य प्रदेश के ।।
तोडना तो दूर उसको ना हिला तिलभर सके ।
बल का जिनको गर्व था बैठे है वे हारे थके ।।

अब नहीं है बीर धरती पर जनक ने ज्यों कहा ।
तिलमिला कर तब सुमित्रा सुवन उठकर यूँ कहा ।।
हे नृपति, यह बात अनुचित सभा विच कैसे कही ।
रघुवंशियों की शाख से जंह, डोलती सारी मही ।।

जिस सभा के मध्य में, रघुवंश मणि श्री राम हों ।
नाम लेते ही जगत के पूर्ण सारे काम हो ।।
उनके पराक्रम, शौर्य को शोभा नहीं ललकारना ।
सभा बिच इन अतिथियों को इस तरह दुतकारन ।।

सौगंध मुझ को यदि मुझे आदेश रघुपति का मिले ।
यह जीर्ण शीर्ढा पिनाक क्या, ब्रम्हाण्ड पल भर में हिले ।।
मेरु गिरिको भी अभी मूली सरिस मैं तोड दूँ ।
कच्चे घडे की भाँति इस ब्रम्हाण्ड को मैं फोड दूँ ।।

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क्रोधित लखन को शांत कर प्रभु ने निकट बैठा लिया ।
कौशिक मुनी ने राम को आदेश तब ऐसा दिया ।।
हे राम ! उठकर चाप भंजहू जनक प्रण पूरण करो ।
नृपतियों का मान मर्दन कर गर भूरण करो ।।

सहज ही उठि प्रभु धनुष ढिग जा नमन करि वन्दन किया ।
एक पल में धनुष शिवका तोड दुई खण्डन किया ।।
नाचन लगी नभ अप्सरा सुर सुमन वर्षानें लगे ।
गन्दर्भ किन्नर भाट भिक्षुक नृत्य कर गाने लगे ।।

हाथ ले वर माल सिय, प्रभु राम को पहना दिया ।
“आनन्द” सागर में सकल संसार को नहला दिया ।।
अवध– मिथिला का मिलन यह युगौ । तक चलता रहेगा ।
सूर्य चन्दा का ये दीपक युगौं तक जलता रहेगा ।।
नेपालगन्ज–११ भवानीबाग, (बाँके)

 

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