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अंतर्मन की यात्रा ही अशांति से शांति की खोज व रास्ता है : अध्यात्म

 

बिमल सर्राफ, रक्सौल, पूर्वी चंपारण।”खामोश रहने का अपना ही आनंद है, क्योंकि नींव के पत्थर कभी बोला नहीं करते।” यह प्रेरणादायी विचार बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।

उन्होंने कहा कि जब संसार की अशांति मन को विचलित करने लगे, तब व्यक्ति को अपने अंतर्मन की ओर यात्रा करनी चाहिए। जीवन में दुःख का सबसे बड़ा कारण यह है कि सच्चे इंसान को लोग समझ नहीं पाते और गलत इंसान को परख नहीं पाते।

उन्होंने कहा कि अपने चरित्र और व्यक्तित्व की रक्षा अपने प्राणों से भी अधिक करनी चाहिए, क्योंकि व्यक्ति एक दिन इस संसार से विदा हो जाता है, लेकिन उसकी शख्सियत, विचार और श्रेष्ठ कर्म सदैव जीवित रहते हैं। इसलिए शख्स बनकर नहीं, बल्कि शख्सियत बनकर जीएँ।

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श्री सर्राफ ने कहा कि प्रेम केवल सुनने, पढ़ने या गाने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे जीवन में उतारना पड़ता है। सच्चा प्रेम तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग कर दे। अहंकार समाप्त होने पर ही प्रेम का वास्तविक अंकुर फूटता है।

उन्होंने कहा कि पुस्तकें स्वयं मौन रहती हैं, लेकिन जो उन्हें पढ़ता है, वे उसे सही सोच, सही आचरण और प्रभावी अभिव्यक्ति का मार्ग दिखाती हैं। संसार चाहे कितना भी आकर्षक क्यों न हो, अपने घर का स्नेह, अपनापन और सुकून कहीं और नहीं मिल सकता।

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उन्होंने कहा कि चिंता करना समय और ऊर्जा की सबसे बड़ी बर्बादी है। जीवन में सुख-दुःख और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती-जाती रहती हैं। इसलिए उन बातों पर तनाव नहीं लेना चाहिए, जो हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। व्यर्थ चिंतन कभी समाधान नहीं देता।

उन्होंने कहा कि वास्तव में समस्या जैसी कोई चीज नहीं होती, केवल परिस्थितियाँ होती हैं। हम उन्हें किस दृष्टिकोण से देखते हैं, यही हमारे जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करता है। यदि आपका कोई विरोधी नहीं है, तो संभव है कि आप उन अवसरों पर भी मौन रहे हों, जहाँ सत्य बोलना आवश्यक था।

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अंत में उन्होंने कहा कि श्रेष्ठ कर्मों का अभाव दुःख का कारण, श्रेष्ठ कर्मों का प्रभाव सुख का आधार और बुरा स्वभाव अशांति का मूल कारण है। इसलिए जीवन केवल बिताने के लिए नहीं, बल्कि सार्थक, सकारात्मक और आनंदमय ढंग से जीने के लिए मिला है।

“मस्त रहें, आनंदित रहें और अपने श्रेष्ठ व्यक्तित्व से समाज में सकारात्मक पहचान स्थापित करें।”

बिमल सर्राफ
रक्सौल, पूर्वी चंपारण।

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