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असली ध्यये मधेश को गुलाम करना और पहाड़ी सत्ता को बरक़रार रखना ही है : मुरलीमनोहर तिवारी

 

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु) , बीरगंज, ३० अक्टूबर | “एगो फुटले फुटल, एगो के पेनिए ना” 

“एगो फुटले फुटल, एगो के पेनिए ना” मधेश में ये कहावत आए दिन सुनने को मिल रहा है। राष्ट्रपति बिद्या भंडारी और प्रधानमंत्री केपी ओली पर ये कहावत चरित्रार्थ होती है। दोनों मधेश और भारत बिरोधी। दोनों का इलाज भारत के रहमोकर्म पर हुआ, दोनों को जीवनदान मिला। पूरा सोशल मीडिया इनके चरित्र पर ऊँगली उठाने वाले पोस्ट से भरा पड़ा है।  मधेश के खिलाफ प्रचंड, ओली, कमल थापा सारे गीले शिक़वे, निति, नियम, मुद्दा छोड़कर एक हो गए। केपी ओली हमेशा माओवादियों के खिलाफ जहर उगलते थे, और माओवादी उन्हें पागल कहते नहीं थकती थी। आज दोनों प्रेमी युगल की तरह गलबहियां कर रहे है। कांग्रेस ने लोकतंत्र को ताक पर रख कर इनका सहयोग किया। सुशिल कोइराला का लुंजपुंज नेतृत्व कांग्रेस को पतन के राह पर पहुचा दिया। अपनी कमजोरी ढ़कने के लिए ये कहते है की मोदी को “कांग्रेस” शब्द से  ईष्या है, इसीलिए भारत के साथ साथ नेपाल के कांग्रेस को भी खत्म कर दिया। पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह ने भी मधेश के खिलाफ इनका पुरजोर साथ दिया। राजा का पद भंग होने के बाद बिद्या भंडारी और ज्ञानेन्द्र शाह मिले थे। बिद्या भंडारी ने नमस्कार किया जिसका आशीर्वाद अब मिला। इन सब से साबित होता है की इनका असली ध्यये मधेश को गुलाम करना और पहाड़ी सत्ता को बरक़रार रखना ही है। इनका एक ही सिद्धान्त है “नक्कली राष्ट्रवाद दिखाना और भीख मांग कर खाना”।

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ख़ैर, मधेश को इससे क्या फर्क पड़ने वाला है, चाहे साँपनाथ आएं या नागनाथ, दोनों डंसने का काम ही करेंगे। इधर मधेशी मोर्चा आंदोलन की आग में अपनी रोटी सेंक रहा है। ऐसा लगता है की आंदोलन की ठेकेदारी मोर्चा की है। क्या जितने लोग नाका पर जा रहे है, सब मोर्चा के नेतृत्व का परिणाम है ? मोर्चा तिन बाबा चला रहे है “मौनी बाबा, खैनी बाबा, दंभी बाबा”। मौनी बाबा कभी बोलते नहीं। खैनी बाबा खैनी की तरह मधेश को मसल कर रख दिए। दंभी बाबा अपने जाती के दम्भ में किसी को कुछ समझते नहीं।

आंदोलन में महंथ ठाकुर ज्यादातर समय काठमांडू में बिता दिए। मधेश में कुछ सांकेतिक कार्यक्रम करने के अलावे इनके संगठन का प्रभाव कही नहीं दिखा। उपेंद्र यादव कही भी आंदोलन में सक्रिय नहीं दिखे। इनरवा में अपने कार्यक्रम में मोर्चा के बाहर के नेता को मंच पर नहीं चढ़ने दिए, बाद में स्थानीय लोगो के बिरोध पर इनकी बोलती बंद हुई। क्यों अन्य मधेशी को रोका गया ? क्या उनका आंदोलन में योगदान नहीं है ? क्या आंदोलन सिर्फ मोर्चा की जमींदारी है ? क्या अकेले मोर्चा के दम पर आंदोलन सफल होगा ? इन्हें क्यों समझ नहीं आता की इस आंदोलन में जो भी चूक गया, उसके दल का सूपड़ा ही मधेश से साफ़ हो गया।

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sipu-3राजेन्द्र महतो को लग रहा है की पुरे आंदोलन के वे नायक है। जबकि हकीकत है की आंदोलन के समय भी झूठा राजीनामा का ड्रामा करके मधेश को धोखा दिया, छल किया। अब जबकि इन्हें प्रायश्चित के तहत सभी मधेशी दल से एकता करके, मधेशी आवाम के चाह को पूरा करना चाहिए था, तब ये अपने दल के सदस्य बनाने में लगे है। शहीदों को अपमान करने वालो के घर खाने जाते है। क्या जो सदस्य बन रहे है वो आंदोलन पूरा होने तक रुकने वाले नहीं है ? जो रुकने वाले नहीं है वो आंदोलन के बाद इनके साथ टिकेंगे ? ये बालू में पानी दे रहे है। एक व्यक्ति के बजाय एक संगठन को जोड़ना मधेश हित में है, इतनी बात इनको समझ नहीं आती या फिर निहित स्वार्थ में समझना नहीं चाहते। इनकी सांसद माधवी रानी ने राष्ट्रपति में वोट दे कर इनको फिर नंगा कर दिया। अब क्या छलावा देंगे मधेश को ? मधेश कितने धोखे माफ़ करेगा ?

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जनता क्या सोच रही है ? प्रधानमंत्री बन्ने के बाद केपी ओली का प्रमुख कार्य अपनी अगुवाई में वार्ता करके आंदोलन समाप्त करने का होना चाहिए था। मगर उन्हें जनता के दुःख से कोई सरोकार नहीं है। नेपाल और मधेश का दुर्भाग्य है की हमें नेल्सन मंडेला और गांधी नहीं मिले। अगर इसी तरह चलता रहा तो गांधी ना सही नाथू राम गोडसे जरूर मिलेंगे जो इनका संहार करेगा।sipu-2

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