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जिस सत्ता ने मौत बाँटा वही राहत बाँट रही है,कितना औचित्यपूर्ण ? श्वेता दीप्ति

 

श्वेता दीप्ति,काठमांडू ,२९ जून |

इसबीच बड़े ही ताम झाम के साथ यह बात सामने आ रही है कि सरकार ने आन्दोलन पीड़ितों का दस दस लाख रकम और स्वास्थ्य सम्बन्धि सुविधा दे रही है । मीडिया आज इसे जिस तरह प्रचार कर रही है वह देख कर आश्चर्य लग रहा है । इतनी चर्चा उस वक्त नहीं हुई थी जब यही निर्दोष जनता मर रही थी ।आन्दोलन के बाद इस सहायता की माँग की जा रही थी और सच है कि इसकी आवश्यकता भी थी । मधेश की जनता इसकी माँग करती आ रही थी । किन्तु मौत का यह व्यापार किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए कहाँ तक औचित्यपूर्ण है ? इस विषय पर बहस की आवश्यकता अवश्य है । मौत का जो तांडव मधेश आन्दोलन के दौरान खेला गया, क्या उसकी आवश्यकता थी ? क्या उसके बगैर जनता को नियंत्रित नहीं किया जा सकता था ? आखिर कहाँ गलती हुई सत्ता, मधेशी नेता या जनता से ?

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एक ओर आन्दोलन आज भी बिना किसी निष्कर्ष के खुला मंच पर अनशन के रूप दिखाई दे रहा है । दूसरी ओर मोर्चा के नेता अपनी पार्टियों को मजबूती प्रदान करने में लगे हुए हैं । जिस काँग्रेस ने संविधान जारी किया आज वही काँग्रेस मोर्चा के अनशन में अपनी एक्यबद्धता दिखा रही है और जिस सत्ता ने मौत बाँटा वही सत्ता आन्दोलन में शहादत हुए परिवार को राहत बाँट रही है, संविधान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रचण्ड मधेशियों की माँग को अब सही बता रहे हैं, तो बाबूराम भट्राई अचानक देश और जनता के हितों के फरिश्ते के रूप में स्वयं को स्थापित करने और शक्ति प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं । अर्थात् चेहरे वही हैं, परिस्थितियाँ भी ज्यों की त्यों है पर कुछ महीने पहले आखिर इन सबकी सोच किस दिशा में जा रही थी कि ६० से अधिक बेकसूर इसी सरकार की गलत नीति और सोच का शिकार होकर असमय कालकवलित हो गए, देश की आर्थिक स्थिति चरमरा गई, आम जनता तस्करी, कालाबाजारी और मंहगाई की मार झेलने को विवश हो गई । और आज यही नेतागण मधेश समर्थन की भाषा किस आधार पर बोल रहे हैं ? अर्थात सीधा सा जवाब है कि यह सब सत्ता प्राप्ति के लिए ही किया जा रहा है जहाँ न तो जनता मायने रखती है न उसकी मौत और न ही उनकी अधिकार प्राप्ति की इच्छा ।

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क्या यह माना जाय कि आन्दोलन ठन्डा हो गया या वर्तमान सरकार अनायास मधेश के लिए सकारात्मक हो गई है ? जी नहीं परिदृश्य आज भी ज्यों का त्यों है । मधेश की माँग आज भी पूर्ववत है और सरकार की उदासीनता भी अपनी जगह कायम है । संविधान संशोधन की माँग को संविधान पुनर्लेखन का एक नया नाम देकर और इसकी गलत व्याख्या कर के बातों को आज भी उलझाने की कोशिश जारी है । संविधान पुनर्लेखन का तात्पर्य यह तो बिल्कुल नहीं है कि पूरे संविधान की धाराओं का पुनःलेखन । हाँ जो विवादित हैं, अस्पष्ट हैं, जिनसे मधेश की जनता असंतुष्ट है उन्हें परिमार्जित करने की माँग अवश्य है और यह कोई ऐसी माँग नहीं है जिसे माना न जा सके । बल्कि संशोधन भी हो ही चुका है भले ही यह किसी पक्ष विशेष को दिखाने के लिए या तुष्ट करने के लिए हुआ हो । आज के समय में सत्तापक्ष ताबड़तोड़ भूकम्प पीड़ित, आन्दोलन पीड़ित सभी को सहायता पहुँचाने के काम में संलग्न नजर आ रही है और जोर शोर से इसका प्रचार भी हो रहा है । खैर किसी बहाने से ही सही सत्ता अगर यह कर रही है तो इससे थोड़ी राहत पीड़ितों को भी अवश्य मिलेगी । सपनों में आखिर जीने की भी तो कोई ना कोई सीमा होती ही है । शायद सरकार यह समझ गई है । वैसे भी बहुत सारे सपने उनकीओर से बाँटे जा चुके हैं । जिनकी यर्थाथता से कहीं कोई सम्बन्ध नहीं है ।

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राहत की रकम पर भी सरकार और मोर्चा में विवाद उभर कर सामने आ ही रहा है । सरकार सीधे पीड़ितों को रकम हस्तातंरण कर रही है, जबकि मोर्चा का कहना है कि यह सही नहीं है क्योंकि अस्पतालों के बिल जो पार्टी के तहत दिए गए हैं या बाकी हैं वो समस्या ऐसे में बरकरार रह जाएगी । यह ऐसी अवस्था है कि इस हालत में मोर्चा और मधेश की जनता में ही तकरार शुरु हो जाएगी । जो निःसन्देह मोर्चा के हित में नहीं होगी ।

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