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महाराष्ट्र के पालघर में हुई मॉब लिंचिंग के शिकार संत सुशील गिरी 10 साल में बन गए थे वैरागी

 

महाराष्ट्र के पालघर में हुई मॉब लिंचिंग के शिकार हुए तीन लोगों में संत सुशील गिरी सुल्तानपुर जिले के चांदा के रहने वाले थे। उनकी मौत की सूचना से उनके पैतृक गांव चांदा में कोहराम मचा है।
दरअसल, चांदा कोतवाली क्षेत्र के चांदा बाजार (कादीपुर रोड) निवासी स्व. राम दुलार दूबे व उनकी पत्नी मनराजी के पांच पुत्र थे। इनमें सबसे बड़े कपिल देव, दयाशंकर, दीप नारायण, शेष नारायण और सबसे छोटा बेटा शिव नारायण उर्फ रिंकू दूबे था। मात्र 10 वर्ष की आयु में शिव नारायण दूबे उर्फ रिंकू दूबे का मन वैराग्य की ओर हो गया। वे वाराणसी के जूना अखाड़े के संपर्क में आ गए और वैराग्य ले लिया।

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वैराग्य लेने के बाद शिव नारायण दूबे का नाम सुशील गिरी पड़ गया। इसके बाद सुशील गिरी उर्फ शिव नारायण दूबे मुंबई पहुंचे, जहां जोगेश्वरी पूर्व स्थित हनुमान मंदिर के महंत बन गए। पिछले बृहस्पतिवार को महंत सुशील गिरी (35), महंत चिकने महराज कल्पवृक्ष गिरी (70) कार चालक निलेश तेलगड़े (30) के साथ सूरत में रहने वाले महंत श्रीराम गिरी के निधन की सूचना के बाद अंतिम संस्कार के लिए निकले थे। रास्ते में मुंबई के (पालघर) गडचिंचले गांव में भीड़ की शक्ल में मौजूद लोगों ने तीनों पर लाठी, डंडा, चाकू, पत्थर बरसाकर हत्या कर दी थी।

17 अप्रैल को जब हत्या का वीडियो वायरल हुआ तो इसकी जानकारी सुशील गिरी की ममेरी बहन सपना मिश्रा को हुई। इसके बाद सुशील गिरी की हत्या की सूचना सपना ने ही गांव में रह रहे सुशील गिरी के बड़े भाई शेष नारायण दूबे को दी। हत्या की सूचना के बाद पूरे गांव में कोहराम मच गया।
दो भाई मुंबई और एक भाई कोलकाता में फंसा
जिले के चांदा बाजार निवासी शेष नारायण दूबे ने बताया कि उनके भाई कपिल देव व दीप नारायण मुंबई में काम करते हैं जबकि एक भाई दयाशंकर कोलकाता में रहते हैं। भाई की हत्या के बाद लॉकडाउन होने की वजह से तीनों भाई अलग-अलग स्थानों पर फंसे हैं। भाजपा विधायक देवमणि ने भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रेमशंकर शुक्ल से फोन पर वार्ता कर बाहर फंसे तीनों भाइयों को पैतृक गांव लाने की व्यवस्था का आग्रह किया किया था।

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12 जनवरी को अंतिम बार आए थे गांव
संत सुशील गिरी के बड़े भाई शेष नारायण दूबे ने बताया कि उनके छोटे भाई और महंत सुशील गिरी पिछली 12 जनवरी को गांव आए थे। एक दिन गांव में विश्राम करने के बाद वापस मुंबई चले गए। छोटे भाई की मौत से दुखी शेष नारायण बताते हैं कि उन्हें वो दिन याद है जब उनका भाई दिसंबर 1996 में घर से चला गया था।

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