मथुरा शहर का ऐतिहासिक वर्णन : संध्या चतुर्वेदी
कुछ प्रमाण संकलित कर प्रस्तुत किये गये हैं, यथा
ऋर्षिर्माथुर नामात्र ह्यकरोदुश्चर्र तप:।
ततोस्य माथुरं नाम भवदाद्यं श्रियायुतम्।।पद्म पाताल खंड।।
परम पवित्र श्रेत्र में माथुर नाम के ऋषियों ने घोर तप किया था ।इसी से इस देश का नाम श्रीयुक्त माथुर मण्डल यानी मथुरा प्रसिद्ध हुआ।
स्कंद पुराण के काशी खण्ड में से भी एक प्रसंग है ‘मथुरायां द्विज: कश्चिदित्यारभ्य…..इति श्रण्वन्कथां रम्याशिवशर्माथ माथुर:।
मुक्ति पुर्य्यांतु संस्नातो माया पुर्वांगत स्तदा……..पर्यन्तं। इस प्रसंग में शिव शर्ना माथुर ब्राह्मण श्रेंष्ठ तपस्वी था।
अनृचो माथुरो यत्र चतुर्वेदस्तथा पर:।
चतुर्वेदं परित्यज्य माथुरं परिपूजयेत्।।
मथुराणां हि यद्रूपं तन्मेरूपं बसुन्धरे।
एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजता:।।
न केशव समोदेवो न माथुर समो द्विज:।
न विश्वेश समं लिंग सत्यं सत्यं बसुन्धरे।।
माथुरा मम पूज्याहि माथुरा मम बल्लभा।
माथुरो परितुष्टे वै तुष्टो हं नात्र संशय:।।
भवतिं सर्वतौर्थानिं पुण्या न्याण्तनानि च।
मंगलानि च सर्वाणि यत्र तिष्ठन्ति माथुरा:।।
माथुरा परमात्मानो माथुरा परमा शिष:।
माथुरा मम देहावै सत्यं सत्यं बसुन्धरे।।
एकेन पूजितेन स्यान्माथुरेणाखिलंहितत्।
वेदैश्चतुर्भिंर्नैंवस्यन्माथु
माथुराणां तु तन्द्रुप तन्मेरूपं विहंगम।
ये पापास्तेन पश्यन्ति मद्रूपान्माथुरान्द्विजान्।।
इन वराह पुराण के प्रमाणों में माथुरों को दूसरे चारों वेद जानने वाले बाह्मणों से श्रेष्ठ कहा है। माथुरों को भगवान विष्णु ने अपना ही परम पूजनीय स्वरूप बतलाया है, एक ब्राह्मण को भोजन कराना कोटि तृप्ति के तुल्य कहा है। माथुरों को सर्व मंगल स्वरूप मानकर उनके बैठने के स्थान को भी परम पुण्यमय तीर्थ बन जाना कहा गया है। एक माथुर ब्राह्मण की पूजा से अखिल देवऋषियों एवं ब्रह्माण्ड की पूजा का पुण्य है। जो माथुरों के भगवद्रूप विग्रह को नहीं देख पाते वे निश्चय ही महापापी जीव है, ऐसा श्रेष्ठ महात्म्य माथुरों का इन पुरातन शास्त्री में हैं।
अयोध्यापति श्रीराम द्वारा माथुर पूजन तथा लवण से परित्राग का वर्णन तथा श्रीकृष्ण रक्षार्थ सदक्षिणा यज्ञ का वर्णन है। अन्त में माथुरों के गोत्र, महात्मा श्री उजागर देवाचार्य की वंशाबलि का वर्णन दिया है। इनके परम् यशस्वी अतुलित त्यागमूर्ति वंशधर श्री गोविन्ददेव जी के 81 मन स्वर्णराशि त्याग का वर्णन बड़े मार्मिक छन्दों में है—
आसीद्देव बुन्देलखण्ड दतियाराजो वृसिंह: पुरा:।
यो भादानतुलान नेक शकटै रानीतवानकांचनम्।।
दातु श्री यमुनातटे मधुपुरे गोविन्ददेवेन यो।
दर्पोक्त्या नाहि सत्कृतो न च तत: स्वर्ण ग्रहीतं महत्।।
तेनाद्यापति गृहे गृहे सुकृतिनो गायन्ति तत्यागिताम्।
तत्त्यक्तेन धनेन चान्य पुरूषा: पूर्तिगता: केचन।।
मध्ये नव्य मठा ब्रजस्य रचिता: केचिच्च संरक्षिता:।
एवं त्यागवतेन भूमिपतयो ग्रामानने कान्ददु:।।
एक प्राचीन प्रसंग है कि
बुन्देल खण्ड में दतिया के महाराज बृसिंहदेवजू थे। वे मथुरा में दान के लिये असीमित स्वर्ण बैलगाड़ियों में भरकर लाये थे। मथुरा में यमुना तट पर अपने तीर्थाचार्य श्री गोविन्ददेव को दान देते समय अभिमान के शब्द कहकर रुष्ट कर दिया था।
राजा ने अभिमान में कहा कि चौबे जी आप को मुझसे बड़ा दूसरा कोई दानी नही मिलेगा,इस पर पुरोहित ने हाथ मे जमुना जल ले कर दान के स्वर्ण का संकल्प कर के त्याग कर दिया और कहा कि राजा आप को मुझे बड़ा कोई त्यागी नही मिलेगा।
महात्यागी पुरोहित महानुभाव ने उस सारे स्वर्ण को क्षण मात्र में परित्याग कर दिया।
इस महान त्याग की विप्र महिमामयी प्रशस्ति को आज भी मथुरा में लोग गान करते हैं। इस महापुरूष के त्यागे स्वर्ण से बहुत से दूसरे लोग सम्पन्न हो गये तथा उससे ही ब्रज में अनेक नवीन देव मन्दिर बने और प्राचीन स्थलों का जीर्णोद्धार हुआ। अपने गुरु के इस त्याग से दूसरे अनेक नरेश बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उनका अपूर्व सम्मान कर उन्हें बहुत से गाँव जागीरें भेंट की।
चतुर्वेदी समाज को मथुरा का ह्रदय माना जाता है और इन का निवास स्थान मथुरा के ह्रदय स्थल छत्ते बाजार से ले कर स्वामी घाट तक माना जाता है।जहाँ सर्वाधिक चतुर्वेदी रहते है, उसे चौबिया पारा कहा जाता है।
प्राचीन काल में माथुर चतुर्वेदीयों को चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान होता है जो आज सीमित हो गया है।
चतुर्वेदी वर्ग ज्ञान के साथ संगीत और काव्य के लिए भी जाने जाते है।
गायन में इन की अपनी रुचि रहती है।
शास्त्रीय संगीत की परंपरा आज भी चलन में है।
माथुर चतुर्वेदी ब्रह्मा जी के दस मानस पुत्रों की संतान है।सतयुग में जब सृष्टि के निर्माण का कार्य भगवान विष्णु जी ने ब्रह्मा जी को सौंपी तब सृष्टि के निर्माण के लिए ब्रह्मा जी ने दस मानस पुत्रों को जन्म दिया और सप्तर्षि को प्रगट किया और सृष्टि का निर्माण करने का दायित्व सौंपा।सप्त ऋषियों की संतानें ही चारों वेदों के ज्ञाता चतुर्वेदी कहलाये।
मुगल काल से ले कर आज तक नेताओं से ले कर अभिनेता भी मथुरा जरूर आते है।मोती लाल नेहरू ने यहाँ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए मन्नत मांगी थी जो पूरा होने पर इन्होंने मथुरा में एक धर्मशाला बनवाई थी,जिसमे कश्मीरी पंडितों के लिए रहना निशुल्क था।
जब इंदिरा गांधी जी मथुरा आई और उन्होंने इस बात पर इंकार किया तब पुरोहित जी ने वो पेज दिखाया जिस पर मोती लाल नेहरू के हस्ताक्षर थे और इंदिरा जी से कहा कि वो ये पन्ना फाड़ दे।
इंदिरा गांधी ये नही कर पाई और उन्होंने उसी धर्मशाला में समय व्यतीत किया।
पुराने समय में रीति रिवाजों की कठोरता थी।अगर कोई व्यक्ति या परिवार समाज के विरुद्ध कार्य करता तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था और उसे मथुरा छोड़ अन्यत्र रहना पड़ता था।
इस तरह चतुर्वेदी समाज के दो वर्ग हो गए एक जो मथुरा में रहते और दूसरे जो कुल से निकाल दिए गए, उन्हें कुलीन (कुल हीन) कहा जाने लगा।
कुछ लोग उन्हें मीठे चौबे कहने लगे और चौबे कड़वे चौबो के नाम से विख्यात हुए।कारण यह कि मथुरा के चौबे मीठा तो बोलते हैं पर व्यंग करने में इन का किसी से कोई जोड़ नही।मथुरा चतुर्वेदी अपनी बेटियों की शादी मथुरा में रहने वाले चतुर्वेदी से ही करना पसंद करते है।
पुरानी कहावत है कि, मथुरा की छोरी और गौकुल कि गाय,कर्म फुट जाये तो बाहर जाये।
सिर पर चोटी ,मस्तक पर तिलक गले मे कंठी ,कंधे पर जनेऊ और हाथ में माला इन की पहचान है।

मथुरा,उप


