.. भूख बनाती मनुष्य को दयनीय-क्रूर-बेईमान : उषा चैनवाला
*भूख*
यह भूख ही है,
जो बनाती इंसान को इंसान ।
या फिर बना देती है,
वहशी शैतान ।
तन की-मन की-पेट की,
भूख तो भूख होती ।
शिखर पर चढ़ाये, या
चुल्लू भर पानी में डुबोती ।
भूख न लगे तो,
कौन काम करेगा?
न थकेगा ही,
न आराम करेगा ।
बिना ज्ञान की भूख के,
कौन पढ़ेगा ?
पड़ा रहेगा जहाँ है वहीं,
न कोई आगे बढ़ेगा ।
अर्थ बदल जायेंगे,
मौज मस्ती के ।
कष्ट मिट जायेंगे,
घर गृहस्थी के ।
न संग्रह की लालसा,
न मायने संतोष का ।
न उपलब्धियों की सूची,
न भार किसी दोष का ।
पर जब यही भूख
असीम हो जाती है ।
तब यह उसकी
इंसानियत को खाती है ।
न चाहिये वह खाने से,
हो जाता है अजीर्ण ।
तन-मन-बुद्धि सब
हो जाते संकीर्ण ।
व्यक्ति हो जाता सिर्फ़
स्वार्थ का बन्दी ।
लूट-खसोट-धोखे की,
लगती आदत गन्दी ।
भूख क्यों बनायी
सोचता भगवान ।
भूख बनाती मनुष्य को
दयनीय-क्रूर-बेईमान ।

काठमांडू
नेपाल ।


