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तुम बसन्त तो नहीं हो फिर कैसे/ तुम्हारे आने से.. यूँ बदल जाता है इस मन का मौसम : आरती अशेष

 
आरती अशेष जी की कविताओं पर एक सुन्दर और भावपूर्ण समीक्षा शब्दों और अभिव‍यक्ति कला के धनी श्री ललन चौधरी जी के द्वारा
और आनन्द लें आरती अशेष जी की कविताओं का
प्रेम मानवीय प्रकृति की एक ऐसी पावन धारा है,जिसमें सदियों की आहटों के बीच एक ऐसी प्रतिध्वनि तरंगित होती रहती है,जिसमें दिल और दिमाग की नाजुक तंत्रिकाएँ भी बेवजह झंकृत होती रहती हैं।प्रेम कविता या प्रेम गीत के अंदर कवि /कवयित्री की आत्मा की वह आवाज़ छिपी होती है,जिसमें जन्म जन्मान्तर की न जाने कितनी कहानियाँ साथ साथ होने की अनुभूति करा देती है।
प्रेम शाश्वत है,सत्य है,सुन्दर है,लेकिन इन सबसे उपर तो वह एक ईश्वरीय उपहार है जो हर इंसान के जीवन में उसे इस रुप में मिल पाता है कि वह प्रेम को संचित कर आगे की पीढ़ी के लिये कुछ संदेश छोड़ सके ।
नयी हिंदी कवियों की पीढ़ी में जिन कवियों ने प्रेम के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से परिचय कराया होऔर मानक प्रेम की पुनर्स्थापना करने में महती भूमिका निभायी ,उनमें सबसे प्रखर प्रेम के अस्तित्व को सुरक्षा प्रदान करने का काम प्रोफ. डा.अनामिका ,बद्रीनारायण दिनेश कुशवाह,प्रेमरंजन अनिमेष ,डा. संजय कुमार सिंह,रमेश ऋतम्भर,शहंशाह आलम,डाडा. श्वेता दीप्ति,बिनय सौरभ,अर्चना लार्क,अनुराधा,मिशा,आरती अशेष् ,अंकिता,  प्रिया शर्मा, शिनिवाली शर्मा पल्लवी विनोद प्रतिभा प्रधान महादेवी, शतदल मंजरी ज्योति मिश्रा और बहुत सारे उभरते कवियों /कवयित्रियों के नाम गिनाये जा सकते हैं।
प्रेम की मानक कविता को उपस्थापित करने में विशेषकर कुछेक कवि या कवयित्रियों के नाम सादर पूर्वक लिये जाते रहे हैं।लेकिन सवाल यह है कि आज के बिगड़ते ,टूटते ,बिखरते रिश्तों की नाजुक हालात में कौन सी कविता प्रेम की आत्मा को बचा सकती है और जो जनहित में सार्थकता प्रदान कर इंसानियत की गिरती साख को बचासके ।
डा श्वेता दीप्ति , आरती अशेष और डा संजय कुमार सिंह पल्ल्वी विनोद और बिनय सौरभ की कविताओं में प्रेम के अस्तित्व को बचाये रखने की एक समानांतर धाराएं कविता के हृदयकोश से फूट पडती हैं जिसमें प्रेम को मर्यादित व सुरक्षित रखने के साथ जीवन जगत के घोर अवमूल्यन के बीच रिश्तों को जीवंत बनाये रखने की आध्यात्मिक दर्शन व चिन्तन को ठोस आधार रखने के साथ जीवन की वास्तविक व भोगी हुई अनुभूतियों से रुबरु कराने की घोर चिन्ता अभिव्यंजित हुई हैं। आरती अशेष् की कवितामें कुछ अलग तरह के प्रेम से बंजर होती भूमि को उर्वर बनाने की पहल की गई है।आरती की प्रेम कविता जीवन के सार तत्वों की कविता से गढी गई है,जिसमें जीवन के तमाम संगीत की बिखरी हुई लहरियां हमें साथ होने की अपील करती है।
कवयित्री आरती अशेष् ने बसंत के जीवन से भाग जाने के बाद भी बसंत की अनुभूति करा जाती है।तुम बसन्त तो नहीं हो
फिर कैसे/ तुम्हारे आने से..
यूँ बदल जाता है
इस मन का मौसम…

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भाषा व भाव के मिश्रित जमीं पर कवयित्री की नाजुक और मोहक कल्पनाएं न जाने फिर से कैसे जीवन के तार एक दूसरे से जोड लेते।

देखिये जरा इन पंक्तियों में

देह- शिराओं में
स्पंदित होता है अनुराग
साँसों में बस जाती है
आम्र- मन्जरियों की सुगन्ध
और हवाओं में
बिखर जाता है उल्लास.

दूसरी कविता में एक ऐसी गहरी अनुभूति होती है कि कल्पना सच होते दिखते हैं ।झील के दृश्य में तैरते हंसों की जोडी भला फिर से कितना कुछ अहसास करा जाती!

झील में कलरव करते
हंसों बीच तैरती है मेरी नौका..

और विचरती है दूर कहीं दृष्टि
झीने से कोहरे बीच
भटकती, ढूंढती है तुम्हारी
धुंधली सी उपस्थिति..

तीसरी कविता में कवयित्री की भोगी हुई पीड़ा की अव्यक्त अनुभूति की व्यक्त भाव जब आंसू बन जमीं पर गिरने में असमर्थ और बेबस हो जाते तो लगता है कि प्रेम कविता की महत्तम उँचाई को छू रही होती है!

जब प्रेम / तुम्हारे भीतर
इतनी संवेदना न जगा सके
कि स्वयं से इतर किसी की
भोगी हुई वेदना भी
आँसू बनकर न छलक पड़े
तुम्हारी आँख से…।

चौथी व आखिरी कविता जाए नाजुक व बेबस शब्दों पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि कवयित्री ने किस गहरी मनोदशा की महाव्यथा में डूबकर कविता को अपने हृदयस्थलमें जन्म देती हैं।दरअसल यह कविता नहीं सदी की महाव्यथा की महाकथा है,जहां न जाने कितने मौन और घनी चुप्पियों के बीच प्रेम की आत्मा क्षत विक्षत हो रही होती है।

सबसे कोमल और नाजुक प्रेम के आँसूओ में नहाई कविता में दर्द और पीड़ा की मौन स्वीकृति को देखकर जैसे पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाय !इतनी कारुणिक पीड़ा और अव्यक्त प्रेम के बीच जीवन किस तरह गुम्फित हो घुट रहा है।कितनी त्रासदी और टूटी हुई मन:स्थितियों के बीच कविता दिल कोने से चुपके चुपके निकलकर मन के खुले दरवाजे तक आ पाती है ।इस बीच कितना कुछ मोहक क्षण,मीठी कल्पनाएं,और रंगीन सपने दम तोड़ रहे होते हैं।इन वेहद उदासव मनहूस वक्त में कविता ही एक मात्र सहारा बन खड़ी रहती है कवयित्री/कवि के साथ।सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि जीवं के टूटते,बिखरते इन दुर्लभ क्षणों में भी कवि की जिजीविषा अमरत्व को प्राप्त किये रहती है,जहां जीवन जगत के तमाम रिश्ते दर दर की ठोकरे खा रहे होते हैं। मनुष्य अपनी व्यथा की मार्मिक चित्रण पहलेस्वंय करता है,तब वह साधरण मनुष्य से कवि बन जाता है।यहाँ एक आम मनुष्य से कवि बनने की प्रक्रिया साफ साफ दिखाई देती है,जो सृष्टि की सबसे अनमोल घड़ी है।मनुष्य या मनुष्यता तक की सीढियों पर चलते रहने तमाम कोशिशों के बीच केवल एक ही प्रति ध्वनि अंदर अंदर मन में बजती रहती हैकि हम कैसे जीवं को सुंदर व सुखद बना सके ।जीवं को सुंदर व सुखद बनाने की यह अंतहीन लालसा दूसरों को भी सुकून देती है और जीवनपर्यन्त एक भाव पर खड़ी रहती है कि जीवन को बचा सके,चाहे अपने लिये या दूसरो के लिये।यही स्थायी भव तो प्रेम की भूमि को बंजर होने से बचा पाती है,जहां जीवं के रंगीन सपने हवामहल की भांति उठ खड़े होते हैं।फिर नफरत घृणा की आंधी किस दिशा से बहकर कहां तक उड़ा ले जाये ,यह कहना कितना अनिश्चितताओं से भरा है।इसी बीच प्रेम कविता अओने रंगों में कवि मन को डुबो देता है।

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आधुनिक हिंदी कविताओं में मौन का बड़ा ही व्यापक और सार्वभौमिक महत्व है ।दृष्टि संपन्न कवि अज्ञेय ने अपनी कई कविताओं में मौन को एक अलग और स्वतंत्र स्थान दे रखा है।महादेवी ने भी मौन में वेदना की मिठास और उसमें घुले हुए जीवन के उस रंग को देखती है,जिसके अंदर एक बड़ी दुनिया मुस्कुराती दिखती है।
प्रेम के टूटते बिखरते रंगों में जो रंग सबसे अधिक प्रभावशाली दिखाई पडती है वह मौन है,जिसकी कोई ध्वनि नहीं होती और उसमें न जाने जीवन के हजारों हजार सपनें तैरते रहते हैं।हर एक आंसू के बूंद में अलग अलग पीड़ा व वेदना का भाव छिपा होता है,यही भाव तो हर एक ध्वनि को लील जाती है और तमाम कोलाहल दूर हो जाती है।बस केवल मौन उन आंखों में हजार सपनों को अपने आगोस में लिये चुप चाप देखती रह जाती है,अनवरत,अहर्निश!

अज्ञेय ने मौन को बड़ा ही शक्तिशली माना है।मौन में बड़ी शक्ति छिपी होती है,इसी अन्तर्निहित शक्ति में सृष्टि की तमाम संवेदनाएँ,परिकल्पनाएं,जीवन कीउलझी हुई गुत्थियां और मानव मन की गहरी वेदना को एक सहारा मिलता है।
अव्यक्त वेदना या पीड़ा को पूर्ण अभिव्यक्ति तभी मिलती है जब मौन को हम आत्मसात कर लेते हैं!
आरती अशेष् की खूबसूरत कविता से प्रेम को एक बल मिलता है और यह बल उसे उसकी कथा -व्यथा से जोड़कर एक बड़ी दुनिया का निर्माण करता है।यह निर्माण भविष्य की तमाम सम्भावनाओं के प्रति हमें जागरुक भी करता है।
बधाई!!

नोट-इस कविता पर एक लंबी बहस की जा सकती है।

#मौन_सम्वाद

कितनी ही बातें हैं
जिनके लिए
कोई शब्द नहीं..

कितनी ही पीड़ाएँ हैं
जिनके लिए,
कोई ध्वनि नहीं..

कितनी ही भावनायें
जिनके लिए,
कोई सँकेत नहीं..

किन्तु फ़िर भी
संप्रेषित होते हैं
वे शब्द, ध्वनियाँ, भावनाएं
निर्बाध… निरन्तर..

वे सम्वाद
फ़िर भी
पहुँच जाते हैं
एक से दूसरे हृदय तक

गहन अनुभूतियों की
अज्ञात..अदृश्य तरंगों पर
सुदूर यात्रा करते
निःशब्द.. मौन… रवहीन..

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(1) बसन्त तो नहीं हो तुम..!

तुम बसन्त तो नहीं हो
फिर कैसे/ तुम्हारी आहट पर..
विदा हो जाता है
इन प्राणों में ठहरा हुआ
पतझड़ सा सूनापन…

तुम बसन्त तो नहीं हो,
फिर क्यों/ तुम्हारे आते ही..
मन की माटी में
नन्हें अँकुरों की तरह
जाग जाती हैं…
सोयी अभिलाषाएं।

देह- शिराओं में
स्पंदित होता है अनुराग
साँसों में बस जाती है
आम्र- मन्जरियों की सुगन्ध
और हवाओं में
बिखर जाता है उल्लास..।

तुम बसन्त तो नहीं हो
फिर कैसे/ तुम्हारी पदचाप से..
आकांक्षाओं के वृक्ष पर
फूट पड़ती हैं नई कोंपलें

कल्पनाओं में / भर जाते हैं…
बुराँश, पलाश, सरसों,
गुलमोहर- अमलतास से
मनमोहक रँग।

इंद्रधनुष सरीखे
सतरंगी हो जाते हैं स्वप्न
और विरक्ति की वाटिका में
गूँज उठता है /अनुरक्ति का कोकिल राग..

तुम बसन्त तो नहीं हो
फिर कैसे/ तुम्हारे आने से..
यूँ बदल जाता है
इस मन का मौसम…।

(2) कहाँ नहीं हो तुम !!

झील तट पर गहन नीरवता
आँख से टपका
एक अश्रुकण सहसा..
शब्दातीत अनुभव
तुम्हारे प्रति, मौन अनुग्रह का…

कि तुम्हीं ने
दी है दृष्टि… देख पाने की
जड़ प्रकृति के पार
उस चैतन्य सत्ता को…

झील में कलरव करते
हंसों बीच तैरती है मेरी नौका..

और विचरती है दूर कहीं दृष्टि
झीने से कोहरे बीच
भटकती, ढूंढती है तुम्हारी
धुंधली सी उपस्थिति…

तुम वहाँ हो..
डूबते सूर्य के मद्धम प्रकाश में
तुम वहाँ हो..
झील की छाती पर
झुक आये मेघ घिरे आकाश में…

तुम वहाँ हो
दूर बाँसों के झुरमुट
की घनी आड़ से झाँकते
तुम वहाँ भी, धुन्ध पर्दे को
सहसा हटाकर ताकते..

कहाँ नहीं हो तुम..
ओ मेरे जीवनाधार!
सर्वव्यापी!! परम अस्तित्व !!!

(3) जब प्रेम में….

जब तुम्हारे
हृदय में उपजा प्रेम..
अंतर्मन को / इतना साहस न दे सके
कि उसके स्वीकार के क्षण में
सबके समक्ष
भय या संकोच में डूब जाना पड़े तुम्हें..।

जब प्रेम तुम्हें
इतना सबल और अडोल
न बना सके
कि अपने ही लिए निर्णय पर
ध्रुव तारे सा स्थिर रह पाओ तुम..।

जब प्रेम / तुम्हारे भीतर
इतनी संवेदना न जगा सके
कि स्वयं से इतर किसी की
भोगी हुई वेदना भी
आँसू बनकर न छलक पड़े
तुम्हारी आँख से…।

जब प्रेम..
तुम्हारी चेतना को न दे सके
आकाश सा अनन्त विस्तार
व्यक्तित्व को..
सागर सी असीम विराटता
और मन को..
धरती सा अपरिमित धैर्य।

जब प्रेम में
सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी
रिक्त न हो पाए,
तुम्हारे अहम का पात्र।

जब प्रेम में होकर भी
तुम में कहीं बचा रह जाये..
तुम्हारे होने का आभास।

तब स्वीकार लेना
कि प्रेम से अधिक
प्रेम के.. भ्रम में… जिये तुम।

 

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