एडिक्शन की हद पार करती वेबसिरीजें : वीरेन्द्र बहादुर सिंह
वीरेन्द्र बहादुर सिंह । मयूर कालेज में पढ़ने वाला युवक था। वह काफी स्मार्ट और पढ़ने में भी स्कॉलर था। वह एक अच्छे परिवार से आता था। पर उसे जो दोस्त मिले थे, वे मौजमस्ती वाले थे। पिछले कुछ महीने से उसका ध्यान पढ़ाई में बिलकुल नहीं लग रहा था। जब देखो, तब वह मोबाइल में बिजी रहता था। अपने दोस्तों के साथ मिलकर वह हर वीकएंड में किसी न किसी के घर या हॉस्टल में प्रोग्राम बनाता और शनिवार को उसका कालेज बंद ही होता था, सभी सुबह ही ऑनलाइन सिरीज देखने के लिए इकट्ठा हो जाते। लगातार एक के बाद एक एपीसोड देखते रहते। खाना भी वहीं और नींद आने पर सोना भी वहीं। पर वेबसिरीज चलती रहती है। इस तरह शनिवार की सुबह से यह कार्यक्रम शुरू होता तो रविवार को देर रात तक यह एक्टिविटी चलती रहती। कुछ तो वेबसिरीज देखने के चक्कर में सोते भी नहीं थे। आंखें फाड़-फाड़ कर वेबसिरीज देखते रहते।
ये एक दो बार की बात नहीं, लगातार चलने वाला कार्यक्रम बन गया था। कोई नई वेबसिरीज आती नहीं कि उनका प्लान बन जाता। मयूर शुरू में तो मना करता रहा, अंत में मित्रें के सामने हार गया और उसे भी उनकी गैंग में शामिल होना पड़ा। कभी अगर कोई नई सिरीज न आई होती तो उन सबको खाली-खाली लगता। अब क्या करें? उनकी समझ में न आता। पढ़ने में तो मन लगता नहीं था। उनका मन दुखी-दुखी हो जाता। रात को नींद भी न आती। काफी दिनों से उनका यही रूटीन चला आ रहा था। इसका परिणाम यह निकला कि अंततः मयूर परीक्षा में फेल हो गया। मयूर कभी फेल कभी फेल भी हो जाएगा, ऐसा उसके घर वालों ने सपने में भी नहीं सोचा था।
प्रिया की बात भी कुछ ऐसी ही है। वह गृहिणी है। उसका 5 साल का बेटा भी है। वह मोबाइल और टेक्नोसेवी है। उसके मोबाइल में हर वेबसिरीज को देखने के लिए हर ऐप्स मिल जाएगा। पिछले एक महीने से वह हमेशा वेबसिरीज देखने में मशगूल रहती है। जिससे समय से खाना भी नहीं बना पाती। रात को तो बाहर से ला कर खाना पड़ता है। अपने बेटे का भी वह ध्यान नहीं रख पाती। उसका मन हमेशा वेबसिरीज में अगले भाग में क्या हुआ? कब समय मिले और वह वेबसिरीज देखने बैठ जाए। जब देखो तब वह उसी में लगी रहती थी। रात को भी देर रात तक वह यही काम करती रहती। जिसका असर उसके रोमांटिक और निजी जीवन पर भी पड़ने लगा। अक्सर वह पति को मना करने लगी। इस बात को ले कर पति-पत्नी में अक्सर झगड़ा होने लगा। फिर भी वह मानने को तैयार नहीं है कि उसका बदला हुआ व्यवहार इसके लिए जिम्मेदार है। सुबह वह समय से उठ नहीं पाती थी। बेटे को स्कूल भेजने में भी उसे तकलीफ होने लगी थी। अपनी सहेलियों से भी वह इसी बात की चर्चा करती थी।
इस समय जमाना नेटफ्रिलक्स, अमेजोन प्राइम, हॉटस्टार या एमएक्स, ऑल्ट बालाजी, जी फाइव का है। हर किसी के मोबाइल में इनमें से कोई न कोई ऐप्स देखने को मिल जाएगा। इसलिए लोगों को जैसे ही मौका मिलता हैं, खोल कर बैठ जाते हैं। तमाम लोग इसके इतने एडिक्ट यानी आदी हो चुके हैं कि जिसकी कोई सीमा नहीं है। इस तरह के तमाम लोग आप को अपने आसपास देखने को मिल जाएंगे। बीच में पबजी गेम के लिए भी कुछ ऐसा ही चला था। जिसे देखो वही समय मिलते ही दूसरा कोई काम करने के बजाय पबजी गेम खेलने बैठ जाता था। जिससे उसका पूरा रूटीन डिस्टर्ब हो जाता था। घर में अन्य लोगों से बातचीत करना या बोलना तक भूल जाता था। इस तरह के लोगों को गेम खेलने या सिरीज देखने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है। इस तरह के लोग कभी-कभी तो रात को देर तक जाग कर यह काम करते हैं। इसकी वजह से तमाम घरों में झगड़े भी होते हैं, संबंध बिगड़ते हैं, पर वे अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाते। हम यह भी कह सकते हैं कि वे अपनी आदत से बाज नहीं आते।
कोरोना महामारी के कारण सिनेमा घर बंद हो गए थे। लॉकडाउन के कारण लोग दिन-रात घरों में ही बंद रहे। टीवी से तो वैसे भी लोग ऊबे हुए हैं। क्योंकि उसमें वही सब घिसेपिटे प्रोग्राम आते हैं। टीवी वाले कुछ नया करने के बारे में सोचते ही नहीं है। ऐसे में ही लोगों का झुकाव इस तीसरे पर्दे की ओर हो गया है। डिजिटल प्लेटफार्म नाम का यह तीसरा पर्दा जहां इंटरनेट है, वहां उपलब्ध है। अगर आपके घर में स्मार्ट टीवी है और टीवी इंटरनेट से जुड़ा है तो उस पर भी यह तीसरा पर्दा यानी वेबसिरीज उपलब्ध है। स्मार्ट फोन पर तो उपलब्ध है ही। नेटफ्रिलक्स, अमेजोन प्राइम, ऑल्ट बालाजी, जी फाइव, हॉटस्टार जैसे ओटीटी प्लेटफार्म लोगों का खूब मनोरंजन करा रहे हैं। लोगों को ये इसलिए पसंद आ रहे हैं, क्योंकि ये एक नई सोच के शो लेकर आ रहे हैं और ये दर्शकों में चर्चा का विषय भी बन रहे हैं।
मजे की बात यह है कि वेबसिरीज लोग अपने डेस्कटॉप, लैपटॉप, आईपैड या मोबाइल पर कहीं भी देख सकते हैं। इसमें न कहीं जाना है न किसी से कुछ पूछना है और न किसी तरह का कोई खर्च है। बस इंटरनेट होना चाहिए। एक तरह से यह जादुई बाक्स है। वेबसिरीज पर सेंसर का कोई नियंत्रण भी नहीं है, इसलिए इस पर कोई भी कंटेट देखने को मिल जाता है। इसीलिए यह लोगों को अधिक पसंद आ रहा है। क्योंकि इसमें वह सब देखने को मिल रहा है, जो दर्शक चाहता है। सिनेमा हाल या टीवी पर वह सब देखने को नहीं मिलता। इसीलिए लोग इसके आदी बन चुके हैं। एक तरह सेहत यह भी कह सकते हैं कि ये लोगों के लिए बीमारी बन गए हैं।
साइक्रियाट्री में अनेक बीमारियों का निदान करने की कैटेगरी दी गई है, जो हर दस साल पर रिव्यू होती रहती है। पर अभी तक इस समस्या को उसमें बीमारी के रूप में नहीं दर्ज किया गया है। पर इसका मतलब यह नहीं हुआ कि इसका निदान या इलाज संभव नहीं है। इसे एडिक्शन की कैटेगरी में रखकर इसका भी इलाज किया जा सकता है। कई बार तो लगता है कि इसे ओसीडी की कैटेगरी में समाविष्ट किया जा सकता है। इस बारे में आदमी की बीमारी के लक्षण और हीस्ट्री के आधार पर उसका निदान करना ज्यादा उचित होगा। जिसमें व्यक्ति अपने इंटरनेट के उपयोग पर लगाम लगाए, इसका पहला उपाय यही है। रात को डिनर के बाद एक नियत समय पर अपना फोन घर के किसी अन्य व्यक्ति के हवाले कर दे। जिससे समय पर सो जाए। काम के समय फोन दूर रखे, साथ ही डिजिटल डिटोक्स की मदद ली जा सकती है।
इस समय डिजिटल डिटोक्स की बहुत ज्यादा जरूरत है। व्यक्ति डिजिटल एडिक्शन के शिकार हो रहे हैं। अब तो ऐसा होता है कि घर में बैठा अदमी भी एक-दूसरे से बात करने के बजाय फोन में व्यस्त दिखाई देता है। स्वाभाविक है ऐसे में मानसिक तनाव उत्पन्न होगा है। इस स्थिति में डिजिटल डिटोक्स समय-समय पर लाभकारी सिद्ध होगा।
वीरेन्द्र बहादुर सिंह

