Mon. Jul 13th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

राजनीतिक बिसात के मोहरे-कितने लोकप्रिय कितने अलोकप्रिय : श्वेता दीप्ति

 

वामदेव गौतम, युवराज खतिवडा और कुलमान घिसिंग ये वो नाम हैं, जिन्होंने पिछले समय में राजनीतिक गलियारों में चर्चित व्यक्ति के रूप में जगह पाई है

डॉ.श्वेता दीप्ति, सेप्टेंबर अंक। अरस्तू ने कहा है कि ‘मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है’, इस प्रकार उन्होंने मनुष्य की एक ऐसी स्वाभाविक क्षमता को मान्यता प्रदान की है जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है । मनुष्य किसी–न–किसी ‘राज्य’ (पोलिस) के अंतर्गत रहता है, अर्थात एक सामूहिक सत्ता के माध्यम से अपने जीवन को व्यवस्थित करता है ताकि वह ‘उत्तम जीवन’ और ‘आत्म–सिद्धि’ को प्राप्त कर सके । इस प्रकार राजनीति मनुष्य के स्वाभाविक गतिविधि का क्षेत्र है । दरअसल अरस्तू की मान्यता है कि ‘राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आता है और अच्छे जीवन के निरंतर बना रहता है’। चूंकि राज्य राजनीति के अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि राजनीति का प्रमुख उद्देश्य ‘उत्तम जीवन’ की सिद्धि प्राप्त करना है । साधारण शब्दों में राजनीति शासन करने या सत्ता के प्रयोग की कला है। राजनीति द्वारा एक विशेष प्रकार कि सत्ता का प्रयोग जनता पर किया जाता है, जिसके द्वारा नियम या कानून बनाए जाते हैं, उन्हें लागू किया जाता है और निर्णय किए जाते है। राजनीति में जिस सत्ता या प्रभुत्व का प्रयोग किया जाता है वह अन्य सामाजिक संगठनों की सत्ता से भिन्न होती है।

किन्तु क्या सचमुच समाज का हर व्यक्ति राजनीतिक व्यक्ति है ? शायद नहीं क्योंकि अगर ऐसा होता तो राजनीति को गलत समझने वाले नहीं होते । आज के समय में राजनीति को सही नहीं मानने वालले बहुत हैं । किन्तु एक जागरुक नागरिक राजनीति को गलत कह कर देश और समाज से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता है । परन्तु एक कड़वी सच्चाई नेपाल की राजनीति के लिए यह है कि अगर सुखी सम्पन्न होना है और अपनी तीन पीढि़यों के लिए सम्पत्ति जमा करना है तो एक बार मंत्री, साँसद या कोई अन्य राजनीति से आबद्ध पद जहाँ पैसा हो प्राप्त कर लें बस कल्याण ही कल्याण है । खैर यह तो आम जनता की आम धारणा है परन्तु राजनीति की राह सहज भी नहीं है, बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं, तब कहीं जाकर सपने सच होते हैं, जनता की नहीं नेता की । कुछ समय से ऐसे उदाहरण यहाँ की राजनीति में बहुतायत में दिख रही है । मैक्स वेबर ने भी किसी संगठन को राजनीतिक संगठन तभी तक माना है जबतक कि वह राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल करता है । इसके अलावा राजनीतिक सत्ता हथियाने के लिए की प्रयोग में लाई जाने वाली दाँवपेंच की क्रिया भी राजनीति के अंतर्गत आती है । इसी दाँवपेंच के सन्दर्भ में पिछले दिनों नेपाल की राजनीति में तीन चेहरे अत्यन्त चर्चा में रहे हैं, वो हैं वामदेव गौतम, युवराज खतिवडा और कुलमान घिसिंग । तीन चेहरे जिनमें एक अतिमहत्वाकांछी, एक प्रधानमंत्री के अतिप्रिय और एक जनता के बीच अपनी प्रिय छवि बनाने वाले । यानि वामदेव गौतम, युवराज खतिवडा और कुलमान घिसिंग ये वो नाम हैं, जिन्होंने पिछले समय में राजनीतिक गलियारों में चर्चित व्यक्ति के रूप में जगह पाई है ।

महत्वाकांक्षी गौतम

बात की शुरुआत करूँ बामदेव गौतम की यानि वह नेता जिसे जनता ने नहीं चुना, जो चुनाव में हारा हुआ नेता है, बावजूद इसके उपप्रधानमंत्री, अर्थमंत्री बनने की इच्छा आपकी कभी कम नहीं हुई और अन्ततोगत्वा आपने राष्ट्रीय सभा के सदस्य  के रूप में शपथ ले ही लिया या यूँ कहूँ कि जबरन लेने में सफल हो गए । राजनीतिक विज्ञों का मानना है कि उनकी महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की थी इसकी वजह से प्रतिनिधि सभा में आना चाहते थे । किन्तु ये हो न सका । फिर उनकी कोशिश रही कि राष्ट्रीय सभा सदस्य भी प्रधानमंत्री बन सके इसके लिए संविधान संशोधन किया जाए पर ये भी नहीं हो पाया । उनकी कोशिश २०७४ से लगातार जारी रही । चुनाव में हारने के बाद भी ऐन–केन–प्रकारेण वो प्रतिनिधि सभा में आने की कोशिश करते रहे । पहले तो एमाले से ललितपुर से चुनाव जीते हुए सांसद नवराज सिलवाल को हटाकर स्वयं संसद में जाने की कोशिश की । इसी तरह बर्दिया २ से निर्वाचित सांसद सन्तकुमार चौधरी, पूर्वी रूकुम से निर्वाचित कमला रोक्का, नवलपुर–२ से निर्वाचित तिलक महत, बाँके–३ के नन्दलाल रोकाया, कञ्चनपुर–३ से जीते दीपकप्रकाश भट्ट आदि नेताओं को भी उन्होंने मनाने की कोशिश की पर यह सम्भव नहीं हो सका ।

अन्त में काठमाडौँ–७ से चुनाव लड़ने की कोशिश की इसके लिए  सांसद रामवीर मानन्धर को मनाने में सफल भी हो गए पर जनविरोध ने उनकी यह कामना भी सिद्ध नहीं होने दी । फिर यह भी चर्चा सामने आई कि पोखरा से  स्व. रविन्द्र अधिकारी की जगह से चुनाव लड़ेंगे परन्तु, यहाँ वो स्वयं पीछे हट गए शायद उन्हें वहाँ से एक बार फिर से चुनाव हारने का डर था ।
इस उपरांत पिछले समय में जो एमाले में आन्तरिक विवाद का खुला तमाशा हुआ वो भी जग जाहिर है । प्रधानमंत्री पर पद छोड़ने का दवाब, पार्टी विपरीत काम करने का आरोप, तानाशाही का आरोप और इन सबके साथ रोज की बैठक तथा रूठने मनाने का सिलसिला हम सबने देखा । परिणामस्वरूप प्रचण्ड को विशेष अधिकार का प्रलोभन और गौतम को राष्ट्रीयसभा की सदस्यता का तोहफा मिला और प्रधानमंत्री की कुर्सी बच गई । इन सबके बीच माधव नेपाल थोड़ा पीछे रह गए हैं । शायद आगे के समय में उनकी झोली में भी कुछ मनोनुकूल तोहफा आ जाए ।

यह भी पढें   प्रधानमंत्री बालेन आज उद्यमियों के साथ करेंगे चर्चा

हम सब यह भी जानते हैं कि गौतम उपप्रधानमंत्री और अर्थमंत्री बनने का दावा करते आए हैं और यह दावा आज भी उनके साथ है । आज भी इसी दावे को सच करने के लिए  राष्ट्रीय सभा के सदस्य  के रूप में शपथ लेना उनकी पहली सफलता मानी जा सकती है । अब सवाल यह है कि क्या अतिमहात्वाकांक्षी व्यक्ति गौतम सदस्यता मात्र से संतुष्ट हो जाएँगे ? वैसे विज्ञों का मानना है कि आगे के समय में गौतम पार्टी को आन्तरिक संघर्ष में ले जाएँगे, अपने लिए महत्त्वपूर्ण मंत्रालय खोजेंगे । क्योंकि मनुष्य की इच्छाओं का अंत नहीं है वह सदैव कुछ–न–कुछ पाने की कोशिश करने में तत्पर रहता है और यहाँ तो सवाल गौतम जैसे जटिल और जिद्दी प्रकृति वाले नेता का है । यह मान कर चलना चाहिए कि वामदेव एमाले के गले की फाँस बनने वाले हैं । वैसे उन्होंने शपथ लेने के बाद बड़े ही उदार मन से कहा है कि वो राष्ट्रीय सभा की गरिमा बढ़ाने के लिए गए हैं और संविधान तथा राष्ट्रीय सभा नियमावली के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करेंगे, सदस्य की हैसियत से राष्ट्रीय सभा की गरिमा और प्रतिष्ठा गिराने का काम नहीं करेंगे, और सबसे महत्तवपूर्ण कार्य राष्ट्रीयता के पक्ष में रहेंगे । उन्होंने कहा है कि,‘पार्टी द्वारा स्वीकार किए गए समाजवाद के संकल्प को पूरा करने में अपनी भूमिका का निर्वाह करुँगा, इससे अधिक मेरा कोई स्वार्थ नहीं है ।’ खैर ये नेताओं की सबसे प्रिय उक्ति है ये दावे और ये वादे, ये जो पब्लिक है न वो सब जानती है ।

प्रधानमंत्री के चहेते युवराज खतिवडा

दूसरा चेहरा जो पिछले समय में चर्चा में रहा वो है युवराज खतिवडा का । एक अर्थशास्त्री के तौर पर एक नजर उनकी शैक्षिक स्थिति पर डालें । खतिवडा ने मेची कैम्पस भद्रपुर से अर्थशास्त्र विषय में स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त की है । उसके बाद  अर्थशास्त्र में उन्होंने त्रिभुवन विश्व विद्यालयसे वर्ष ०३७ में तथा ०४० में जनप्रशासन में स्नातकोत्तर की शिक्षा हासिल की । तत्पश्चात् खतिवडा दिल्ली स्कुल ऑफ इकोनोमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय से ०४७ में वित्तीय अर्थशास्त्र में पीएचडी की उच्च शिक्षा प्राप्त की है । अर्थात् शैक्षिक दृष्टिकोण से आप एक अर्थमंत्री के रूप में सक्षम व्यक्तित्व हैं । अर्थमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की समीक्षा करने से पहले एक नजर उनके अन्य कार्यक्षेत्र पर भी नजर डालें ।

आपने सहायक अनुसन्धान अधिकृत के रूप में ०३९ में नेपाल राष्ट्र बैंक में प्रवेश किया जहाँ उन्होंने करीब बीस वर्ष काम किया वहीं से आपकी राष्ट्र बैंक के  कार्यकारी निर्देशक में प्रोन्नति हुई । राष्ट्र बैंक के अनुसन्धान विभाग प्रमुख के रूप में करीब तीन वर्ष काम करने के बाद ०५८ से २०६१ तक राष्ट्रीय योजना आयोग के  सदस्य रहे । जहाँ उन्होंने पञ्चवर्षीय योजना तर्जुमा में महत्वपूर्ण योजना बनायी थी ।
योजना आयोग छोड़ने के बाद ०६२ से तीन वर्ष तक युएनडिपी के क्षेत्रीय केन्द्र, कोलम्बो में वरिष्ठ अर्थविद् के रूप में काम किया । जहाँ से नेपाल वापस आने के बाद उन्हें असार ०६६ में तत्कालीन प्रधानमन्त्री माधवकुमार नेपाल ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष में नियुक्त किया । जहाँ उन्होंने सिर्फ नौ महीना काम किया और उसके बाद इस्तीफा दे दिया । ९ चैत ०६६ में उन्हें नेपाल राष्ट्र बैंक का गभर्नर नियुक्त किया गया । यहाँ विज्ञों का मानना है कि उनका पाँच साल का कार्यकाल सफल रहा ।

०७२ में पुनः योजना आयोग के उपाध्यक्ष बने । तत्कालीन प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली के  कार्यकाल में उन्होंने योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में काम किया । उस वक्त कहा जाता था कि, तत्कालीन अर्थमन्त्री विष्णु पौड्याल को अर्थशास्त्र का  ज्ञान नहीं है इसलिए  खतिवडा को छाया अर्थमन्त्री माना जाता था । यानि एक समर्थ व्यक्तित्व जिन्हें देश ने महेन्द्र विद्या भूषण, सुप्रबल गोर्खा दक्षिणबाहु आदि सम्मान से नवाजा है । जिन्होंने देश को अर्थमंत्री के रूप में अपनी सेवा दी । किन्तु अन्य क्षेत्र में सफल रहने वाले खतिवडा अपने अर्थमंत्री–पद पर जनता को खुश नहीं कर पाए । हाँ सरकार यानि प्रधानमंत्री के खास चहेते जरूर बने रहे ।

यह भी पढें   बैंकक के पब में लगी आग, २७ की मृत्यु, ६३ लोग घायल

यही वजह थी कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी उन्हें विशेष छः महीने के लिए पुनर्नियुक्त किया गया । युवराज खतिवडा को मन्त्री पद से इस्तीफा देने के  २४ घण्टे के भीतर पुनर्नियुक्त कर दिया गया था ।  प्रधानमन्त्री केपी ओली की सिफारिस में राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी ने खतिवडा को पुनः अर्थ और सञ्चार तथा सूचना प्रविधिमन्त्री में नियुक्त कर दिया था । संवैधानिक व्यवस्था अनुसार सांसद नहीं होने के बाद भी खतिवडा ने मन्त्री के रूप में छः महीने तक काम किया  और नया आर्थिक वर्ष का बजट भी लाया । जबकि उनके हटने के खबर के साथ ही शेयर बजार बढ़ा था किन्तु उनके फिर से कार्यभार सम्भालने के साथ ही शेयर बाजार फिर से नीचे की ओर खिसक गया था । जाहिर सी बात है कि वो बाजार के पसंद नहीं थे । छः महीने के बाद प्रधानमन्त्री के कृपापात्र होने की वजह से ही खतिवडा पुनः सिंहदरबार  में प्रवेश पाने में सफल हो चुके हैं ।

गत फागुन में २ वर्षे कार्यकाल पूरा करने के बाद ही प्रधानमन्त्री  राष्ट्रीयसभा सदस्य में पुनः खतिवडा को मनोनित सदस्य के रूप में लाना चाहते थे किन्तु यह नहीं हो सका था क्योंकि सामने बामदेव गौतम सवाल और आकांक्षा के साथ सामने खड़े थे ।  फिर भी संविधानतः ६ महीना राष्ट्रीयसभा सदस्य नहीं रहने के बाद भी  खतिवडा ने अर्थमन्त्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया । सिंहदरबार से बाध्यात्मक बहिर्गमन  की पीड़ा भोगने वाले खतिवडा पुनः  मजबूत स्थिति के साथ सिंहदरबार में प्रवेश  पा चुके हैं ।

अर्थमन्त्री पद से इस्तीफा देने के बाद से ही  प्रधानमन्त्री ने यह इशारा कर दिया था कि खतिवडा को किसी–ना–किसी रूप में शक्ति संग्रहित पद दिया जाएगा । जब खतिवडा पदमुक्त हुए तो वह पद प्रधानमंत्री के हक में चला गया था । गौर करने की बात यह है कि इस पद को सम्भालने के बाद जब प्रधानमंत्री ने व्यवसायियों से मुलाकात की थी तो वहाँ किसी पद पर ना होने के बावजूद युवराज उपस्थित थे । यह संकेत था कि युवराज कहीं बाहर नहीं गए हैं । यूँ भी जानकारों का मानना था कि खतिवडा भले ही अर्थमंत्री ना रहें किन्तु वो प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार के रूप में रह कर अर्थमंत्रालय पर अपना नियन्त्रण रख सकते हैं । और यह कयास सही साबित हुआ जब मंत्रियों की तरह सुविधा प्राप्त पद पर  विशेष आर्थिक सलाहकार बनाकर ‘डिफ्याक्टो’ अर्थमन्त्री की भूमिका युवराज खतिवडा को हासिल हुई है । देखा जाए तो अपने अर्थमंत्रीत्व के सम्पूर्ण कार्यकाल में युवराज खतिवडा प्रधानमंत्री की इच्छा के पोषक और उन्हें खुश करने की कोशिश में अधिक सक्रिय रहे हैं । यह आरोप उन पर समय–समय पर लगता रहा है । प्रधानमंत्री के वफादार तो वो बने किन्तु अपनी योग्यता और प्रतिभा दिखाने में असफल रहे । खतिवडा एक सामान्य अर्थमंत्री होकर ही रह गए । कोई ऐसा योगदान उनका नहीं रहा जिसे इतिहास में दर्ज किया जा सके । हाँ अगर इतिहास में कुछ दर्ज होगा तो यह कि, उन्हें प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का वरदहस्त प्राप्त था ।

लोकप्रिय चेहरा कुलमान घिसिंग

अब चर्चा उनकी जिन्होंने जनता में अपनी छवि बनाई और जिनकी पुनर्नियुक्ति की मांग के साथ जनता सड़क पर है । वो हैं नेपाल विद्युत प्राधिकरण के कार्यकारी निर्देशक पद से अपने कार्यकाल को समाप्त कर सेवामुक्त होने वाले कुलमान घिसिंग । जिन्हें ऊर्जा संकट निवारण में उल्लेख्य भूमिका प्रदान करने हेतु सरकार ने सुप्रवल जनसेवा श्री मानपदवी से सम्मानित किया था । सिइओ क्लब द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में उन्हें उत्कृष्ट सिइओ की उपाधि मिली थी । नेपाल चेम्वर ऑफ कमर्स ने उन्हें बेस्ट मेनेजर की उपाधि दी थी । ऐसी कई उपाधियाँ उन्हें अपने चार साल के कार्यकाल में प्राप्त हुई हैं ।

यहाँ तक कि झापा के कन्काई नगरपालिका ४ और शिवसतासी नगरपालिका १० के बीच में पड़ने वाले टेका गाँव वासी ने अपने गाँव के चौक का नाम ‘कुलमान घिसिङ चौक’ रखा है । घिसिंग के गाँव रामेछाप में भी उनके नाम से चौक का नामकरण हुआ है । कहने का तात्पर्य यह कि उन्हें जनता का प्यार स्वतः मिल रहा है । कोई उन्हें ‘रियल लाइफ हीरो’ कहता है तो कोई ‘रोल मॉडल’ । कुछ तो उन्हें ‘उजाले का पर्याय’ भी कहते हैं । जी हाँ कुछ हद तक यह सही भी है क्योंकि उनके पदभार सम्भालने से पहले नेपाल की जनता ने एक दो घंटे नहीं बल्कि अठारह–अठारह घंटे का लोड सेडिंग झेला था । अंधकार में रहने को विवश थी नेपाली जनता । नदियों और पानी का धनी देश ‘अंधेरों का देश’ हो गया था । इनभरटर और बैट्री बेचने वालों की वाहवाही थी ।

यह भी पढें   निर्वाचन आयुक्तों की सुनवाई प्रक्रिया शुरु होगी आज

कुलमान घिसिंग ने पहली बार वि.सं. २०५० साल में सातवें तह के कर्मचारी के रूप में विद्युत प्राधिकरण में प्रवेश किया था । उसके बाद से आपने एक–एक सीढ़ी तय की । ऊर्जामन्त्री जनार्दन शर्मा की सिफारिस में २०७३ भाद्र २९ गते को मन्त्रिपरिषद् की बैठक ने प्राधिकरण के प्रबन्ध निर्देशक में घिसिंग को नियुक्त किया था । यह वह समय था  जब नेपाली जनता की नियति बन गई थी ऋण लेकर भी इनभरटर और बैट्री खरीदना और अपने घर को उजाला करना । कमीशन के खेल से नेपाली समाज आक्रान्त था । यह उम्मीद ही नहीं थी कि कभी अँधेरे से मुक्ति मिलेगी । विद्युत प्राधिकरण लोडसेडिङ की दैनिक तालिका बनाने में व्यस्तथो । नेपाल सरकार के पास इनसे मुक्ति का कोई योजना नहीं थी । ऐसी विकट परिस्थिति में नेपाल विद्युत प्राधिकरण के कार्यकारी निर्देशक के रूप में घिसिंग उजाला नेपाल के एक मात्र अभियान में सक्रिय हुए और अपनी मजबूत कार्यशैली के साथ प्राधिकरण को सुधारा और ४ वर्ष की अवधि में नेपाल को पूर्ण रूप में लोडसेडिङ मुक्त बनाने में सफल हुए । यही कारण है कि नेपाली जनता उन्हें पदमुक्त नहीं देखना चाहती और इसके लिए वो सरकार से मांग कर रही है कि उन्हें फिर से नियुक्त किया जाए ।

किन्तु राजनीतिक नेतृत्व इसके लिए उदासीन बना हुआ है । यानि यह कह सकते हैं कि जनता के तो प्रिय कुलमान बने, परन्तु सत्ता या प्रधानमंत्री के प्रिय नहीं बन पाए । अगर बने होते तो उन्हें भी युवराज खतिवडा की तरह सहजता के साथ पुनः नियुक्त किया जा सकता था क्योंकि यह पावर प्रधानमंत्री के पास है ।

नेकपा के भीतर एमाले समूह घिसिंग से शुरु से ही असन्तुष्ट है । तत्कालीन उर्जामन्त्री राधा ज्ञवाली ने रसुवा चिलिमे जलविद्युत आयोजना में प्रबन्ध निर्देशक घिसिंग को लेकर केन्द्रीय कार्यालय में तनाव पैदा किया था और आरोप लगाया था । उस समय चिलिमे का शेयर पहली बार सर्वसाधारण के लिए जारी किया गया था ।  जिसके कारण उनकी चर्चा हुई थी और उन्हें चिलिमे से हटाया गया जिसकी काफी आलोचना हुई थी और उनके पक्ष में आन्दोलन भी हुआ था ।  ।

आज वही असन्तुष्ट खेमा कुलमान की निरन्तरता के विरोध में सामने खड़ा है । खुली प्रतिस्पद्र्धा के साथ सरकार कार्यकारी निर्देशक नियुक्त करने की तैयारी में है । पूर्वएमाले और पूर्वमाओवादी के बीच पुनः मतभेद दिखाई दे रहा है । नेकपा के प्रवक्ता नारायणकाजी श्रेष्ठ ने कुलमान की निरन्तरता के लिए सामाजिक संजाल में लिखा था जिस पर उनकी आलोचना भी हुई ।  प्रधानमन्त्री के प्रेस सलाहकार की असन्तुष्टि के बाद प्रधानमन्त्री की असन्तुष्ट स्पष्ट होती है ।
दैनिक १८ घण्टे लोडसेडिंग अन्त करने वाले कुलमान जनता के बीच ही लोकप्रिय नहीं हुए हैं बल्कि प्राधिकरण को घाटे की स्थिति से निकाल कर वार्षिक ११ अर्ब से भी अधिक नाफा कमानेवाली सबसे बड़ी सार्वजनिक संस्था के रूप में स्थापित करने में सफल हुए हैं । प्राधिकरण के नेतृत्व सम्हालने के साथ घिसिंग ने  वित्तीय ग्राफ ही नहीं बल्कि अन्य कई सूचक में भी पर्याप्त सुधार किया है ।

घिसिंग के कार्यकाल में कुछ विवाद भी हुए जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है । इनपर एलईडी बल्ब खरीद प्रकरण में आरोप लगा  जिसके कारण बल्ब खरीद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी । घिसिङ कार्यकाल में कई काम थे जो पूरे नहीं हो सके बावजूद इसके नेपाली जनता उन्हें एक बार फिर से प्राधिकरण में देखना चाहती है । इससे यह तो साफ पता चलता है कि जिस उजाले में कुलमान जनता को लेकर आए उस उजाले को जनता फिर से अँधेरे में बदलता नहीं देखना चाहती है । जो उजाला माफिए के जाल में कैद था उसे कुलमान ने आजाद कराया था और जनता फिर से उस अँधेरे को अपने घर में नहीं देखना चाहती है । परन्तु सवाल वही है कि कुलमान पर फिलहाल सुप्रिमो का वरद हस्त नहीं दिख रहा है । इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कुलमान घिसिंग को पुनः यह जिम्मेदारी मिलेगी या नहीं । किन्तु यह सर्वविदित है कि  राजनीति एक वर्चस्व की लड़ाई है और जहाँ छल–कपट इत्यादि धारणाओं का जन्म होता है, जो हमें साम दाम दंड भेद का बोध कराती है । यानि जिसकी लाठी उसकी भैंस बाकी सभी तमाशाई ही हैं ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed