“सोचता हूँ दोस्तों पर मुकदमा कर दूं – गुलजार के पढने के बाद : वसन्त लोहनी
,pre>“सोचता हूँ दोस्तों पर
मुकदमा कर दूं
इस बहाने हर तारीखों पर
अदालत में मुलाकात तो हो जाएगी।”
– गुलजार
(भारतीय कवि, गीतकार तथा चलचित्र निर्देशक)
पढने के बाद
मुलाकातें अब कहाँ?
वह निकलते ही नहीं
सुबह से मे देखता रहता हूँ
हर दिन
दूर तक फैलीं हुई निगाहों से
सब दिखाईं देते है
सिर्फ़ मेरे दोस्त नही
सुनहरे यादें निकलते रही
लेकिन दिल खाली नहीं हुइ
और भरता गया
खुशी से नाचने लगा मे
स्मृति के ताजगी से
भरा हुआ दिल से बात कर
अपनें से विभोर हो कर
जब बातों बातों मे
हंसते हंसते
में अपने में आ गया
तब देखता हूँ
वहीं कमरा
वहीं कमरा मे बिखरा हुवा में
और सिर्फ़ अकेला में
यादों को बर्दाश्त नहीं कर सका
तब मुकदमा डाले
मासूम खयालो से
कहीं ना भि हो
कचहरी मे जरुर मिल जाएंगें
मिलनें को उताउला होकर
मे चारों ओर देखने लगा
पिछे से आवाज सुनाई दिया
एक सख्स की
जो बडेबाबु के सामने खडे थे
हात मे एक अर्जी लेकर
कहें रहें थे –
‘मे उनके वारिस हु’
मे स्तब्ध हुवा
हवा बनकर निकल गया
सकल तक नही देखा उसके।



