महामारी, भुखमरी और बेरोजगारी के बीच मध्यावधि चुनाव की घोषणा सिर्फ घोषणा ही है
रात के अँधेरे में राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप करते हुए राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने संसद को भंग कर दिया है। देश में अब फिर से संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के लिए चुनाव होंगे। इस मध्यावधि चुनाव के लिए नई तारीखों की घोषणा भी कर दी गई है। देश में दो चरणों में चुनाव होगा। पहले चरण का चुनाव 12 और दूसरे चरण का चुनाव 19 नवंबर को होगा।राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री पद के लिए शेर बहादुर देउबा और केपी शर्मा ओली दोनों के दावों को खारिज करते हुए संसद भंग करने का ये फैसला संविधान की अनुछेद 76 (7) के तहत लिया है।
संविधान के अनुच्छेद 76(5) के अनुसार, जो व्यक्ति प्रधानमंत्री बनना चाहता है, उसे सांसदों के हस्ताक्षर प्रस्तुत करके बहुमत का आधार प्रस्तुत करना होता है। देउबा ने कांग्रेस के 61 सांसदों, यूसीपीएन-एम के 48 सांसदों, जनता समाजवादी पार्टी (जेएसपी) के 12 सांसदों, सीपीएन-यूएमएल के 26 सांसदों और राष्ट्रीय जन मार्च के एक सांसद के हस्ताक्षर सौंपे थे. संवैधानिक रूप से देउबा के प्रधानमंत्री बनने की राह खुल गई थी।
वहीं ओली ने भी 121 यूएमएल सांसदों और 32 जेएसपी सांसदों के समर्थन का दावा किया था। दूसरी ओर, राष्ट्रपति भंडारी ने जवाब दिया कि परामर्श के बाद निर्णय लिया जाएगा क्योंकि दो दावे थे। लेकिन राष्ट्रपति भंडारी ने आधी रात को दोनों दावों का खंडन करने के बाद संसद को भंग करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया ।
इस नाटक की पटकथा तो उस समय ही तय हो गई थी जब दस मई को ओली को विश्वास मत हासिल न होने के बाद राष्ट्रपति ने विपक्षी दलों को तीन दिन में सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए कहा था। विपक्षी उस समय पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाए। बाद में ओली के नेतृत्व वाले दल को तीस दिन में विश्वास मत हासिल करने का समय दिया गया। किन्तु गुरुवार को ओली फ्लोर टेस्ट से पीछे हट गए , और उसके बाद देउबा के नेतृत्व में सरकार बनाने के दावे से पहले ही ओली ने अपना दांव चल दिया।
पिछली बार जब संसद भंग किया गया था तो सिर्फ प्रधानमंत्री केपी ओली को जिम्मेदार ठहराया गया था किन्तु इस बार तो राष्ट्रपति की भागीदारी भी स्पष्ट हो गई है। वैसे पहले भी राष्ट्रपति की कार्यशैली पर सवाल तो उठते ही रहे हैं इसलिए अभी जो हुआ वह नया भी नहीं है ।
अभी सबसे अहम सवाल यह कि क्या राजनीतिक नाटक के लिए यह समय सही है ? महामारी के इस दौर में क्या जनता इन सबके लिए अपने प्रतिनिधियों को माफ कर पाएगी ? मौत से रुबरु होती जिन्दगी और घरों में कैद जिन्दगी क्या इस परिदृश्य के लिए तैयार है ?
नाटक के मुख्य किरदार केपी शर्मा ओली इस बार एक मुहावरा प्रयोग कर हँसाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि मँजे हुए और खतरनाक खिलाडी के रुप में सामने आए हैं । इस मरतबा तो इस खेल में सर्वोच्च न्यायालय से भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि कई विषयों पर यहाँ से भी जनता का भरोसा उठता ही नजर आ रहा है ।
संसद भंग कर दी गई है। और देखा जाए तो महामारी, भुखमरी और बेरोजगारी के बीच मध्यावधि चुनाव की घोषणा सिर्फ घोषणा ही है क्योंकि जो समय और तिथि निर्धारित की गई है उस समय चुनाव की कोई भी संभावना नजर नहीं आ रही है । इस स्थिति में जाहिर तौर पर ओली ही सत्ता में विराजमान रहेंगे । देख तमाशा कुर्सी का ।
संपादक


Very good analysis. Only demons and owls make such decisions in night.