भानु जयन्ती विशेष : भानुभक्त रामायण ने नेपाली भाषा को स्थापित किया : डा श्वेता दीप्ति

डा श्वेता दीप्ति, भानुभक्त : नेपाली साहित्य में भानुभक्त आचार्य को आदिकवि के नाम से ससम्मान याद किया जाता है । उन्हें नेपाल तथा नेपाली भाषा का तुलसी कहा जाता है । भानुभक्त तथा उनकी रामायण पर नेपाली भाषा में जितनी चर्चा की गई है वह अन्य किसी ग्रंथ के लिए नहीं की गई होगी । भानुभक्त ने रामायण के अतिरिक्त भक्तमाला, प्रश्नोत्तरमाला, वधुशिक्षा जैसी मौलिक रचना की है । यों तो भानुभक्त आचार्य संस्कृत भाषा के विद्वान थे किन्तु रामायण की रचना इन्होंने नेपाली में की जो यह सिद्ध करता है कि उन्हें अपनी भाषा के प्रति गम्भीर आस्था थी । नंद कुमार अवस्थी के शब्दों में “श्री भानुभक्त संस्कृत भाषा में ही परिसीमित पुष्कल रामचरित को विभिन्न भाषाई अंचलों के अन्य रामायण–रचियताओं की भाँति, अपने भी जनभाषा में प्रस्तुत कर के, सामान्य जनता के प्रति अनन्य उपकार किया है ।”
नेपाली साहित्य के क्षेत्र में प्रथम महाकाव्य रामायण के रचनाकार भानुभक्त का उदय सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना है । पूर्व से पश्चिम तक नेपाल का कोई ऐसा गाँव अथवा कस्वा नहीं है जहाँ उनकी रामायण की पहुँच नहीं हो । भानुभक्त कृत रामायण वस्तुतः नेपाल का ‘राम चरित मानस’ है । नेपाली भाषा में रामायण की रचना करने वाले भानुभक्त ने नेपाली साहित्य को एक अमूल्य कृति दी है । भानुभक्त ने काव्य की भाषा में नहीं जन भाषा में पूरी जाति के लिए रामायण की रचना की है । उनके रामायण के आदर्श ने तत्कालीन राजतंत्र को हिला दिया था ।
तनहूँ जिला के चूँदी तामाकोट गाँव में वैक्रमाब्द के उन्नीसवी शताब्दी में श्रीकृष्ण आचार्य (जोखुपाध्या) रहते थे । उनका अनुमानित समय १८११¬–१८८८ है । श्रीकृष्ण बहुत विद्वान् संस्कारी बह्मण थे ये बात भानुभक्त द्वारा अपने परिचय देने के प्रसङ्ग में कही गई हैं ।
पाहाड्को अतिवेशदेश् तनहुँमाश्रीकृष्ण ब्रह्मण्थिया ।
खुप्उच्चाकुलआर्य वंशीहुन गै सत्कर्ममा मन्दिया ।
विद्यामापनि जो धुरन्धरभई शिक्षामलाई दिया ।
तिन्को नाति म भानुभक्तभनिहुम् यो जानिचिन्हीलिया ।
श्रीकृष्ण के छः पुत्र हुए धनञ्जय, काशिनाथ, पद्मनाथ (शेखर), तुलसीराम, गङ्गादत्त, इन्द्रविलास । और रुद्रप्रिया और रमा दो बेटियाँ भी थी । इन छः पुत्रों में सबसे बडे धनञ्जय के पुत्र के रूप में भानुभक्त जी को जाना जाता है । इनके कुल में कुल परम्परा से ही कर्मकाण्ड ज्योतिष आदि विविध शास्त्र का कतिपय हस्तलिखित पुस्तक प्राप्त होने से विद्या परम्परा अच्छी थी ये ज्ञान मिलता है ।
भानुभक्त के पिता धनञ्जय सरकारी नौकरी करते थे । भानुभक्त के घर में बहुत सारे संस्कृत ग्रन्थ मिलने की बात शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन द्वारा सम्पादित भानुभक्त कृत भाषा रामायण की भूमिका में उल्लेख किया गया है । भानुभक्त की वंश परम्परा विद्वत्तापूर्ण थी ।
१८७१ विक्रम संवत् आषाढ २९ के दिन कृष्ण पक्ष के अष्टमी के रविवार वर्षाऋतु में माता धर्मावती के गर्भ से खरीदार धनञ्जय आचार्य के पुत्र के रूप में नेपाली भाषा के अद्वितीय सर्जक भानुभक्त आचार्य का जन्म हुआ था । ‘आदिकवि भानुभक्त आचार्य को सच्चजीवनचरित्र’ नामक ग्रन्थ में अनेक विवाद का खण्डन कर के प्रमाण पुष्ट जन्म विवरण दिया है ।
भानुभक्त आचार्य एक सम्पन्न ब्रह्मण कुल के थे । भानुभक्त ने अपने पितामह श्रीकृष्ण आचार्य से शिक्षा ग्रहण की थी । भानुभक्त के दो विवाह की चर्चा मिलती है । पहली पत्नी के देहावसान होने के कारण उनकी १३ वर्ष की उम्र में दूसरा विवाह तनहुँमानुङ के सम्पन्न ब्राह्मण विद्याधर खनाल की १० साल की पुत्री चन्द्रकला के साथ हुआ था । इसके बाद भानुभक्त काशीबास में रहनेवाले अपने दादा श्रीकृष्ण आचार्य से अध्ययन हेतु वाराणसी चले गए थे । भानुभक्त वाराणसी में विद्वत्सभा में शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में जाया करते थे ।
भानुभक्त में स्वाभाविक रूप में काव्य रचना की प्रतिभा थी । माना जाता है कि उन्होंने यश के लिए कविता लिखना शुरु किया था । पर ‘आदिकवि भानुभक्त आचार्यको सच्चा जीवनचरित्र’ कृति में इस बात का खण्डन किया गया है । विविध समय में अपने आनन्द के लिए भानुभक्त ने विविध प्रकार की कविताएँ लिखी है । काशीवास में रहे पितामह से उनको वैराग्य विषय में बहुत कुछ सुनने को मिला था । उस समय उन्होंने प्रश्नोत्तरमालिका कण्ठ किया बाद में अनुवाद भी कर डाला । घर में अनेक व्यवहार में रहते हुए उन्होंने व्यवहारिक कविताएँ लिखी । मूलतः व्यवहारिक और भक्तिभाव से युक्त वेदान्त दर्शन से प्रभावित वैराग्य आदि के प्रभाव में कविता लिखी । भानुभक्त जहाँ जाते थे वही उसी विषय को लेकर कविता लिखते थे । भानुभक्त की रचना अत्यन्त सरल यथार्थ लालित्यपूर्ण और हृदयस्पर्शी होने के कारण जो भी सुनता था लिखकर कण्ठस्थ करता था इस प्रकार से इनकी सारी रचनाएँ लोकप्रिय तथा प्रसिद्ध हैं ।
भानुभक्त ने फुटकर कविता के साथ में अनेक काव्य लिखे जिनमें भक्तमाला प्रश्नोत्तर वधूशिक्षा के साथ–साथ रामगीता का और अध्यात्म रामायण का अनुवाद किया । अनुवाद में भी मौलिकता का अनुभव दिलाना उनकी काव्यगत विशेषता है ।
भानुभक्त कृत रामायण की कथा अध्यात्म रामायण पर आधारित है । इसमें उसी की तरह सात कांड हैं, बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, युद्ध और उत्तरकांड । इनकी रचना के बारे में टिप्पणी करते हुए ‘आदिकवि भानुभक्त आचार्यको सच्चा जीवनचरित्र’ के रचनाकार ने कहा है कि लड्डु में से किस भाग में मीठा कम होता है ? इसी प्रकार इनकी हर पंक्ति मीठी है सुन्दर है उत्कृष्ट है । भानुभक्त रामायण ने नेपाली भाषा को भी स्थापित किया । इसे पढ़ने के लिए लोग नेपाली सीखते थे ।
इनसे पहले इतना सुन्दर सर्वाङ्गीण महाकाव्य किसी ने नही लिखा था । अतः इनको नेपाली भाषा के आदिकवि का सम्मान मिला है । नेपाली रामायण धार्मिक दार्शनिक साँस्कृतिक भाषिक साहित्यिक तथा विशिष्ट राष्ट्रीय महत्त्वयुक्त आदिकाव्य दिव्यकाव्य के रूप में आज भी नेपालियों के बीच में शोभायमान है । हिन्दी में तुलसीदासकृत रामचरितमानस को जो आदर प्राप्त हैं वही आदर नेपाल में भानुभक्तीय रामायण को प्राप्त है, ऐसा कहा जा सकता है । भानुभक्त के बारे में सर्वप्रथम मोतीराम भट्ट ने लिखा । बाद में भानुभक्त के बारे में विविध लोगों ने लिखना शुरु किया किन्तु पण्डित कविराज नरनाथ कृत आदिकविको सच्चा जीवनचरित्र को विशेष प्रामाणिक माना जाता है । भानुभक्त के रामायण के पाठ समीक्षात्मक और लोकप्रिय संस्करण करके शिवराजआचार्य कौण्डिन्न्यायन द्वारा सम्पादित भानुभक्तीय रामायण इन दिनों में बहुत महत्तवपूर्ण माने जाते है । किन्तु इस रामायण के कई संस्करण प्रकाशित मिलते है ।
संवत् १९१० तदनुसार १८५३ई. में उनकी रामायण पूरी हो गयी थी, किंतु एक अन्य स्रोत के अनुसार युद्धकांड और उत्तर कांड की रचना १८५५ई. में हुई थी । भानुभक्त कृत रामायण की कथा अध्यात्म रामायण पर आधारित है । बालकांड का आरंभ नारद ब्रह्मा संवाद और शिव–पार्वती संवाद से हुआ है । तदुपरांत ब्रह्मादि देवताओं द्वारा पृथ्वी का भारहरण के लिए विष्णु की प्रार्थना की गयी है । पुत्रेष्ठियज्ञ के बाद राम जन्म, बाल लीला, विश्वामित्र आगमन, ताड़का वध, अहिल्योद्धार, धनुष यज्ञ और विवाह के साथ परशुराम प्रसंग रुपायित हुआ है ।
अयोध्या कांड में नारद आगमन, राज्याभिषेक की तैयारी, कैकेयी कोप, राम वनवास, गंगावतरण, राम का भारद्वाज और वाल्मीकि से मिलन, सुमंत की अयोध्या वापसी, दशरथ का स्वर्गवास, भरत आगमन, दशरथ की अंत्येष्ठि, भरत काचित्रकूट गमन, गुह और भारद्वाज से भरत की भेंट, राम(भरत मिलन, भरत की अयोध्या वापसी और राम के अत्रि आश्रम गमन का वर्णन हुआ है ।
अरण्यकांड में विराध वध, शरभंग, सुतीक्ष्ण और आगस्तमय से राम की भेंट, पंचवटी निवास, शूर्पणखा–विरुपकरण, मारीच वध, सीता हरण और राम विलाप के साथ जटायु, कबंध और शबरी उद्धार की कथा है ।
किष्किंधा कांड में सुग्रीव मिलन, वालि वध, तारा विलाप, सुग्रीव अभिषेक, क्रिया योग का उपदेश, राम वियोग, लक्ष्मण का किष्किंधा गमन, सीतानवेषण और स्वयंप्रभा आख्यान के उपरांत संपाति की आत्मकथा का उद्घाटन हुआ है ।
सुंदर कांड में पवन पुत्र का लंका गमन, रावण–सीता संवाद, सीता से हनुमान की भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, ब्रह्मपाश, हनुमान–रावण संवाद, लंका दहन, हनुमान से सीता का पुनर्मिलन और हनुमान की वापसी की चर्चा हुई है ।
युद्ध कांड में वानरी सेना के साथ राम का लंका प्रयाण, विभीषण शरणागति, सेतुबंध, रावण–शुक संवाद, लक्ष्मण–मूर्च्छा, कालनेमिकपट, लक्ष्मणोद्धार, कुंभकर्ण एवं मेघनाद वध, रावण–यज्ञ विध्वंस, राम–रावण संग्राम, रावण वध, विभीषण का राज्याभिषेक, अग्नि परीक्षा, राम का अयोध्या प्रत्यागमन, भरत मिलन और राम राज्याभिषेक का चित्रण हुआ है ।
उत्तरकांड में रावण, बाली एवं सुग्रीव का पूर्व चरित, राम–राज्य, सीता वनवास, राम गीता, लवण वध, अश्वमेघ यज्ञ, सीता का पृथ्वी प्रवेश और राम द्वारा लक्ष्मण के परित्याग के उपरांत उनके महाप्रस्थान के बाद कथा की समाप्ति हुई है ।
भानुभक्त कृत रामायण में अध्यात्म रामायण के उत्तर कांड में वर्णित ‘राम गीता’ को सम्मिलित नहीं किया गया था । भानुभक्त के मित्र पं. धर्मदत्त ग्यावली को इसकी कमी खटक रही थी । विडंबना यह थी कि उस समय भानुभक्त मृत्यु शय्या पर पड़े थे । वे स्वयं लिख भी नहीं सकते थे । मित्र के अनुरोध पर महाकवि द्वार अभिव्यक्त ‘राम गीता’ को उनके पुत्र रामकंठ ने लिपिबद्ध किया । इसतरह यह महानकृति रची गई जो नेपाली जनमानस का कंठहार बनी ।
इतना ही नहीं भानुभक्त ने राम के जीवन को लोकहित चेतना का प्रेरणा स्रोत बनाकर नेपाली समुदाय के लिए बहुत बड़ा काम किया था । जिस वक्त भानुभक्त ने रामायण की रचना की वह समय कठोर राजतंत्र का था । राजतंत्र ही जीवन धर्म बना हुआ था । भानुभक्त की रामायण को हम यह कह सकते हैं कि यह राजतंत्र से विद्रोह की रचना थी ।
भानुभक्त के राम साधु संत को प्रताडि़करने वाले, उनकी हत्या करने वाले को नष्ट करने की प्रतिज्ञा करते हैं —
राक्षसका छलले बहुत ऋषि मर्या भन्या कुरा यो सुनी ।
ताहां सब ऋषिलाई राखि सबका सामने प्रतिज्ञा पनि ।।
सब राक्षसहरुको म नष्ट गरुला भन्या प्रभुले गर्या ।
खुशी मन ह्युगो र ताहिं ऋषि ता आनन्दमा सब पर्या ।।(अरण्यकांड–श्लोक–१५, भानुभक्त रामायण)
भानुभक्त के राम को मनुष्य का रूप इसलिए धारण करना पड़ता है कि उन्हें रावण जैसे लोकपीड़क शासक का नाश करना है । ऐसी शासन व्यवस्था कायम करनी है जहाँ भेदभाव ना हो । न कोई उत्पीड़क हो, न कोई उत्पीडि़त हो । न दीन हो न दुखी हो । समाज से विषमता समाप्त हो जाय । भानुभक्त ने केवल रावण राज्य समापन की ही वकालत नहीं की, बल्कि एक ऐसे राज्य की परिकल्पना भी दी जो जनहितैषी हो । ऐसा शासन जिसमें जनता सुख चैन की साँस ले सके ।
राजा राम भईबक्सन जब भयो प्राणी प्रजा खुश भया ।
जो पथ्र्या अघि ताप अनेक तरहका ती सब प्रजाका गया ।।
गर्देनन् विधवा विलाप् मुलुकमा लाग्दैन रोग्व्याध् पनि ।
सब डाकू दब्या परेन कहिं ताप यो चीज हरायो भनि ।। –श्लोक ३७४, युद्धकाण्ड, भानुभक्त रामायण)
इसमें राजा की महत्ता की जगह राम की महत्ता प्रतिपादित की गई । राजा की भक्ति की जगह राम की भक्ति की ओर प्रेरित किया गया । भानुभक्त रामायण लोक हित की चेतना का प्रवर्तन है जो राजतंत्र के विरुद्ध जाता है । भानुभक्त रामायण ने यह संदेश जनता के समक्ष दिया कि राजहित से ऊपर लोकहित है । कवि भानुभक्त को सम्भवतः इसलिए सजा भी मिली । उन्हें कैद कर लिया गया था । देखा जाय तो उस वक्त भानुभक्त ने रामायण खिलकर न केवल नेपाल भारत के सम्बनधों को एक मजबूत आधार दिया बल्कि आम जनता के समझ में आने वाली भाषा में रामायण की रचना कर नेपाली भाषियों को राजतंत्र सामंततंत्र से एक भिन्न उच्च आदर्शवाद प्रदान किया था । नेपाली भाषा का जातीय आधार है भानुभक्त की रामायण । नेपाल की सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है भानुभक्त की रामायण में । नेपाल की नारी कर्मठ होती है और उसकी बहुत इज्जत होती है । भानुभक्त की रामायण में जब राम की चरण–रज से अहिल्या का कल्याण होता है और वह शिला से औरत बनती है तो राम उन्हें प्रणाम करते हैं जबकि रामचरित मानस में अहिल्या राम को प्रणाम करती है । भानुभक्त की यह मौलिक अवधारणा है जो नेपाली लोकसंस्कृति का परिचायक है, जिसमें स्त्री का आत्मसम्मान एक विशेष अर्थ रखता है ।
भानुभक्त और तुलसीदास दोनों ने मानवीय जीवन आदर्शों पर बल दिया । तुलसीदास लिखते हैं— “परहित सरिस धरम नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अघमाई ।।” इन दोनों कवियों ने मानवीय बोध को जगाया है । जिसकी आज के समय में बहुत जरूरत है । भानुभक्त तथा तुलसीदास ने लोकभाषा को साहित्यिक भाषा का दर्जा दिया जो हिन्दी तथा नेपाली के लिए वरदान सिद्ध हुई ।
नेपाल में इससे पूर्व रामकाव्य परम्परा में इतना सफल राम–काव्य नहीं लिखा गया था । भानुभक्त के द्वारा वर्णित रामायण कथा में लोकजीवन, लोक परम्परा, समाज, कला–संस्कृति के चित्र तथा कई रूप विद्यमान हैं । लोकजीवन से जुड़ाव ही साहित्य को शाश्वता प्रदान करता है । लोकचेतना के अभाव में किसी भी साहित्य का दीर्घजीवी होना सम्भव नहीं है । भानुभक्त रामायण की इसी विशेषता ने इसे लोक से आबद्ध कर लोकप्रिय बना दिया । जो आज भी और अनन्त काल तक नेपाल और नेपालियों के मानस में अपना स्थान कायम रखने में सफल रहेगा ।
कुछ समीक्षकों का कहना है कि भानुभक्त कृत रामायण अध्यात्म रामायण का अनुवाद है, किंतु यह यथार्थ नहीं है । तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भानुभक्त कृत रामायण में कुल १३१७ पद हैं, जबकि अध्यात्म रामायण में ४२६८ श्लोक हैं । अध्यात्म रामायण के आरंभ में मंगल श्लोक के बाद उसके धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला गया है, किंतु भानुभक्त कृत रामायण सीधे शिव–पार्वती संवाद से शुरु हो जाती है । इस रचना में वे आदि से अंत तक अध्यात्म रामायण की कथा का अनुसरण करते प्रतीत होते हैं, किंतु उनके वर्णन में संक्षिप्तता है और यह उनकी अपनी भाषा–शैली में लिखी गयी है । यही उनकी सफलता और लोकप्रियता का आधार है ।

