गुरुदेव उचित नारायण यादव की प्रतिमा का अनावरण
मिश्री लाल मधुकर ।गुरुदेव उचित नारायण यादव केजन्मोत्सव के उपलक्ष्य में उनकी प्रतिमा एवं स्मारक का अनावरण बिस्फी के पूर्व विधायक डॉ फ़ैयाज़ अहमद के बड़े पुत्र आसिफ़ अहमद द्वारा किया गया। अनावरण के उपरांत प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में ही गुरुदेव उचित नारायण यादव के प्रिय शिष्य अवकाश प्राप्त अभियंता श्री रामेश्वर ठाकुर लिखित पुस्तिका “गुरुवर:एक धरोहर” का लोकार्पण किया गया। उसके बाद संगीत एवं उद्बोधन का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो० मुनेश्वर यादव और मंच संचालन कॉमरेड कल्याण भारती ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत मंच संचालन करते हुए डॉ कल्याण भारती ने गुरुदेव उचित नारायण बाबू के स्वर्णिम संस्मरणों से किया। उन्होंने कहा कि उचित बाबु एक ऐसे शिक्षक थे जिनकी प्रतिबद्धता अंतिम साँस तक समाज के गरीब, शोषित, दमित उपेक्षित वर्ग के प्रति रही। आगे उन्होंने गुरुदेव उचित बाबू के पहले बैच के स्टूडेंट कारी राम का जिक्र किया। जब सामाजिक-आर्थिक कारणों से काली राम की पढ़ाई पर संकट मंडराने लगा तो उन्होंने कारी राम को अपने घर पर रख कर पढ़ाया। तो ऐसे शिक्षक की जयंती हम आज रहे हैं जो अंतिम दम तक एक समतामूलक प्रगतिशील, प्रबुद्ध समाज के निर्माण में एक कुशल शिल्पी की तरह संलग्न रहे।
अनावरण सभा को संबोधित करते हुए उनके पुत्र आसिफ अहमद ने कहा कि शिक्षक का इतना सम्मान मैंने अपनी ज़िंदगी में पहले नहीं देखा। शिक्षा काजैसा बाजारीकरण हुआ है आज इस दौर में दुर्लभ है। पुस्तिका के लेखक रामेश्वर ठाकुर ने भावुकता के साथ बताया कि जब मैट्रिक परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए उनके अर्थाभाव को देखते हुए उचित बाबू ने स्वयं प्रयास कर पैसे इकट्ठा किया। इसी घटना से प्रेरित हो कर लिखी अपनी कविता का एक अंश उन्होंने सुनाया – “गुरु भिक्षाटन खुद ही किये, शिष्य का रखने मान। चैन तभी वे ले सके, पूरण कर अरमान।। अपनी एक अन्य कविता की कुछ पंक्तियों से उन्होंने उचित बाबू के त्याग पर प्रकाश डाला : ” जन्मभूमि को सहज छोड़, कर्मभूमि-अपनाएं गुरुवर। कर्मनिष्ठ थे-धर्मनिष्ठ थे, जन-जन के थे प्रियवर गुरुवर”
L.C.S कॉलेज के प्रोफेसर श्याम लाल यादव ने गुरुदेव उचित बाबू को नमन करते हुए कहा कि वो एक शिक्षक के तौर पर पूरे समाज के लिए आदर्श हैं। कोई भी व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। हमारे बाबा गुरु कर्म से महान हुए। उन्होंने समाज में शिक्षित लोगों की एक ऐसी कतार खड़ी कर दी जो समाज में शिक्षा की अलख जला रहे!
गुरुदेव उचित बाबू को श्रद्धांजलि सुमन अर्पित करते हुए ललित नारायण मिथिला विश्विद्यालय में प्रोफेसर सुरेंद्र प्रसाद सुमन जी ने कहा कि उनका जो जीवन रहा, 94 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ। 70 वर्षों तक वो पढ़ाते रहे। उचित बाबू कबीर और मार्क्स को साथ लेकर चलने वाले जनवादी शिक्षक थे। उनकी वैचारिक परंपरा पर फ़ख्र होना चाहिए हमें। वो विचारधारा के प्रति कभी डगमग नहीं हुए। उन्होंने अपने से पूर्व की प्रगतिशील परंपरा से प्रेरणा ली और अपने जीवन को इस जनआंदोलन में समर्पित कर दिया। सुमन जी ने द्रोणाचार्य की परांपरा को खंडित करते हुए कहा उचित बाबू दधीचि की परंपरा के थे। वही दधीचि जिन्होंने समाजकल्याण के लिए अपनी अस्थि तक दान कर दिया।
खंगरैठा हाईस्कूल के पूर्व प्रधानाध्यपक सूर्यनारायण यादव ने कहा कि वो एक–एक विधार्थी का ध्यान रखते थे। उनसे प्रेरणा पा कर आज बहुत सारे विधार्थी भारत सरकार में, बिहार सरकार में कार्यरत हैं। यहाँ का समाज उनका ऋणी है। राजद नेता जय जय राम यादव ने गुरुदेव उचित बाबू के छात्र के रूप में अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि क्लास में ही नहीं क्लास से बाहर भी वो छात्रों को पढ़ाते रहते थे। उचित बाबू के छोटे पुत्र पूर्णेंदु यादव जी ने उचित बाबू की कृत्वनिष्ठता को रेखांकित किया। शिवशंकर राय ने गुरुदेव उचित बाबू को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कहा कि विपिन जी ने गुरु की प्रतिमा स्थापित करके गुरु–शिष्य परंपरा को जीवित रखने का काम किया। गुरु और पारस की तुलना करते हुए बताया कि गुरु पारस सिर्फ लोहे को सोना बना सकता है लेकिन एक गुरु किसी भी प्रकार के शिष्य के भविष्य उज्ज्वल कर सकते हैं। अंत में उन्होंने पुस्तकालय की स्थापना का संकल्प दोहराया। गुरुदेव उचित बाबू के प्रिय छात्र विपिन जी ने गुरुदेव को नमन करते हुए कि जो रिश्ता था गुरु जी से वो पिता–पुत्र से भी बढ़ कर था। उन्होंने जो किया हमारे लिए वो अविस्मरणीय है। सामाजिक कार्यकर्ता सुदिष्ट यादव ने छात्र दिनों के संस्मरण साझा करते हुए बताया कि उचित बाबू समाज की परवाह करने वाले व्यक्ति थे। वो आजीवन कम्यूनिस्ट रहे। उनका जितना गुरुदान से प्रेरित हो कर शिक्षण संस्थानों की शुरुआत की जा सकती है। रवीन्द्र नाथ शर्मा ने उचित बाबू को श्रद्धांजली देते हुए कहा कि उचित बाबू को दिल से मैंने अपना गुरु माना। वो मेरे आंतरिक गुरु रहे। जीवनपर्यंत गुरु जी पढ़ाई लिखाई के प्रति फिक्रमंद रहे। वो हमेशा मुझे कहा करते की शिक्षा ऐसी चीज है कि सौ बरस आगे के बाद के समाज निर्माण में अभी योगदान देती है। भविष्य की उज्जवलता शिक्षा पर निर्भर करती है। जाति–धर्म से ऊपर उठ कर उन्होंने समाज के लिए काम किया। कॉमरेड लक्ष्मीनारायण गिरी ने उन्हें सलाम करते हुए कहा कि उचित बाबू जीवनपर्यंत कर्मस्थल को समर्पित कर दिया। रिटायरमेंट के बाद भी वो घर नहीं लौटे। यहीं निशुल्क पढ़ाते रहे। कार्यक्रम का अध्यक्षीय भाषण में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग के सह–प्राचार्य मुनेश्वर यादव ने कहा ग्राम्शी ने जिस काउंटर कल्चर की बात की थी उसको खड़ा करने की जरूरत है। तमाम प्रगतिशील ताकतों को लामबंद करने की जरूरत है। समाज में जो विषमता थी वो आज भी बदस्तूर जारी है। उस विषमता को समाप्त करने के लिए अपनी प्रगतिशील परंपरा से प्रेरणा लेने की जरूरत है। उचित बाबू मानवता के अपराजित योद्धा थे। कार्यक्रम में स्थानीय लोगों के साथ परिवार जनों की भी गरिमामय उपस्तिथि रही। परिवार जनों में गुरुदेव उचित बाबू की पुत्रवाधुएं श्रीमती बबीता कुमारी, रेखा कुमारी, पुत्री सोना देवी, पौत्र पीयूष जी, मुकेश जी, शशि जी, समीर आदि उपस्थित रहे। ग्रामीण गणमान्य जनों में प्रो. लाल बाबू , डाॅ. श्रवन पंडित, विजय चंद्रघोष, सीपीआई के बिस्फी अंचल मंत्री महेश यादव आदि उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए दिनेश कुमार ने कार्यक्रम के समापन की औपचारिकताएं पूरी की।





