Tue. Feb 27th, 2024

नेपाल में एमसीसी के विरोध का असली कारण : सन्तोष मेहता

फिलहाल राजनीतिक गलियारों में एमसीसी के पक्ष और विपक्ष में काफी विवाद है । कुछ कम्युनिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं ने, यहां तक कि गठबंधन में रहे हुवे दल भी, एमसीसी की अनुदान सहायता का विरोध करते हुए कहा है कि इससे देश की राष्ट्रीयता खतरे में पड़ जाएगी । हालांकि, कांग्रेस, लोसपा और नागरिक समाज खुले तौर पर कह रहे हैं कि सहायता स्वीकार करने मे कोइ दिक्कत नही है और कोई विकल्प भी नहीं है।

लेखक – सन्तोष मेहता,
 नेता लोसपा

नेपालि कांग्रेश के अध्यक्ष एवं प्रधानममन्त्री शेर बहादुर देउबा, जिनके पास संसद में एक चौथाई शक्ति भी नहीं है, उन्होंने पांच-दलीय मोर्चा बनाया है और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं । हालांकि एमसीसी के मामले में अन्य चार दल स्पष्ट रूप से देउबा के साथ नहीं हैं । ऐसे में एमसीसी प्रधानमंत्री देउबा के लिए दुःस्वप्न बन गया है । बाकी पार्टियों ने तरह-तरह के बहाने बनाए हैं और संशोधनों का प्रस्ताव रखा है. नेपाल द्वारा पूछे गए ११ सूत्रीय प्रश्न, उस पर अमेरिका की प्रतिक्रिया और एमसीसी के आधिकारिक दस्तावेजों का अध्ययन करने पर ऐसा लगता है कि प्रस्तावित संशोधन सिर्फ विवाद को भड़काने का एक बहाना मात्र है ।

नेपाल अपने नियमित खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष करती है, अपने देश को विकासोन्मुख बनाने के लिए विश्व बैंक सहित अन्य देशों से कई कर्ज लिए हैं । हमें विकास में छलांग लगानी है और हमारे पास इतनी छलांग लगाने के लिए पैसे नहीं हैं । इस बीच कोरोना महामारी से कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए करीब ६० अरब रुपये की विदेशी मुद्रा सब्सिडी कोई छोटी रकम नहीं है । दो साल से कोरोना के प्रकोप के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था के कमजोर होने और हर जगह विकास सहायता ठप होने के कारण, यह राशि नेपाली अर्थव्यवस्था में तरलता लाएगी ।

यह नेपाल के विदेशी मुद्रा भंडार में योगदान देगा । यदि यह राशि आज देनी होती तो कोई भी दानदाता नहीं देता । दुनिया में कहीं भी किसी देश या संस्था से मदद न मांगने की परंपरा हो तो अलग बात है, लेकिन यहां की हर सरकार विदेशी धन और विदेशी निवेश लाने के लिए कई प्रयास करते रहती है । इस मामले में, हमें संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दिए गए सहयोग राशी और मित्रता से क्यों डरना चाहिए ?

देउबा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार, जिस गठबन्धन मे काफी हद तक कट्टरपंथी कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि है, संसद से एमसीसी को पास करने के बारे में कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है । कट्टरपंथी कम्युनिस्ट ताकतों, जिन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका को एक ‘साम्राज्यवादी’, यूरोप को एक ‘पूंजीवादी’, भारत को एक ‘विस्तारवादी’ और चीन को एक ‘महान समाजवादी’ राष्ट्र कह के व्याख्या करती है, और कार्यकर्ता तथा आम लोगों को वही सिखाया जाता है । यहि उनकी विचारधारा है ।

बाकी दुनिया से संबंध खराब करने से, दूसरों को गाली देने से, चीन को ‘महान’ दिखाने से नेपाल को कोई फायदा नहीं होगा । यहाँ मुद्दा यह है कि कट्टरपंथी कम्युनिस्टों ने लोकतान्त्रिक देशौ को एक दुश्मन राष्ट्र का करार करने की अपनी पारंपरिक धारणा को राष्ट्रवाद की आड़ में एक राष्ट्रवादी टिप्पणी में बदल दिया है, और आज यह एक तमाशा बन गया है । समाज के मनोविज्ञान मे अमेरिका और भारत के खिलाफ जहर घोल दिया गया है । जब भी इन देशौ की प्रसंग आती है । तब तब इनकी राष्ट्रवाद उभार आती है । क्योकी कम्युनिस्ट अपने स्थापना के समय से, वे हमेशा दुश्मन के रूप में पढ़ते, सीखते और पढ़ाते रहे हैं ।इन देशौ को साम्राज्यवादियों और विस्तारवादियों मान लेने के बाद उन देशों के खिलाफ नफरत पैदा करने के लिए अतिवादी राष्ट्रवाद का सहारा लेना एक पुरानी रिवाज है । हालांकि, चीनी बीआरआई के खिलाफ राष्ट्रवाद की आवाज नही उठती है, कहीं से भी नहीं सुना गया है, इससे एक बड़ी मदद कहा जाता है, क्योकी दिमाग मे पहले से ही ड़ाल दिया गया है कि चिन साम्राज्यवादी या विस्तारवादी नहीं है । हालांकि, जिन क्षेत्रों में बीआरआई परियोजनाएं लागू की जा रही हैं, इसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में, वहां पहले की तुलना में अलग प्रकार कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाएं उभर रही हैं । जैसे कि बीजिंग ने झिंजियांग और तिब्बत जैसे क्षेत्रों पर सीधे नियंत्रण हासिल कर लिया है । चीन एक केंद्रीकृत राज्य होने के साथ-साथ एक नियंत्रित राज्य भी है । सी विचार धारा भी नियन्त्रित राज्य की वकालत करता है । इसी विचार धारा का समर्थक अब नेपाल की सड़कों पर अफरा-तफरी मचाने की कोशिश कर रहे हैं । यानी जो संघवाद के खिलाफ हैं, जो लोकतंत्र और गणतंत्र के खिलाफ हैं, जो केंद्रीयवाद, तानाशाही और एक-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में हैं, वे सड़कों पर हैं ।

इस संदर्भ में कहा जाए तो बीआरआई तानाशाही, नियंत्रित समाज और सी विचारधारा पर आधारित भविष्य बनाने में मदद कर रहा है । ऐसे राज्य जहा भविष्य में आधुनिक राज्यों में केंद्रीकृत संस्थान शक्तिशाली होंगे । पाकिस्तान में, सेना और संघीय सरकार ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरोडोर (सीईपीसी) परियोजनाओं के माध्यम से अधिक नियंत्रण प्राप्त किया है । इसी तरह के परिणाम श्रीलंका और बांग्लादेश में देखे गए हैं, जहां चीन समर्थित परियोजनाएं शुरू की गई हैं । आज श्री लंका का प्रजातन्त्र दियादी भैयारी प्रजातन्त्र भर रह चुका है ।  वेनेजुएला, दक्षिण अमेरिका का एक प्रमुख बीआरआई वाला देश एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है कि पारदर्शिता या सामुदायिक स्वामित्व के बिना चलने वाली परियोजनाओं का क्या हाल होता है । म्यांमार में भी सैन्य शासन की तानाशाही थोपी गई है । रोहिंग्या का जातीय सफाया चीनी समर्थित परियोजनाओं के लिए भूमि हथियाने की योजना का हिस्सा था ।

इसलिए, भले ही नेपाल बीआरआई पर हस्ताक्षर कर दे, उसे सावधान रहना चाहिए कि वह अपने लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन न करे । बीआरआई आने पर चिनिया राजनीतिक व्यवस्था को अपने साथ लाने में सावधानी बरतनी चाहिए । नेपाल को बीआरआई के माध्यम से निवेश बढ़ाने की जरूरत है, लेकिन खासकर उन परियोजनाओं का चयन करके जो रोजगार में वृद्धि, आय में वृद्धि और आर्थिक विकास में वृद्धि करेगी । लेकिन नेपाल के लिए रेलवे चीन की प्राथमिकता बन गया है । वह पहाड़ों को तोड़कर ट्रेन से नेपाल में प्रवेश करना चाहता है ।

चीन के आधिकारिक बीआरआई दस्तावेज़ में चीन और नेपाल को जोड़ने वाले रेलवे के पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन का भी उल्लेख है । लेकिन चीन नेपाल को देखकर रेलवे बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है । उसका निशाना भारत है । भारत का बाजार है । भारत १.२ अरब आबादी को  चीन के बाजार के साथ जोड़ा जाना है । हिन्दुस्तान जैसा बडा बजार चीनका टार्गेट है इसिलिए चीन रेलवे लाने की सोच रहा है । एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि रेलवे के निर्माण की लागत अभी तय नहीं की गई है । प्रारंभिक अनुमान केरुंग-काठमांडू रेलवे के निर्माण के लिए लागत २८० अरब रुपये है । याद रखें कि निवेश मुफ्त में नहीं आएगा । एमसीसी एक अनुदान है और बीआरआई एक ऋण है । इस पैसे को सावा समेत ८ से १४ फीसदी ब्याज के साथ चुकाना होगा । चालाखी देखिए, चिन अपने फ़ाइदे के लिए रेल लाएगि और निवेश नेपालको करना होगा । जब उधार लेने की बात आती है, तो हमे इस बात से सावधान रहने की जरूरत है कि हम किस कार्य में निवेश करना चाहते हैं । चिनिया कर्जमे डुबे हुवे हम पाकिस्तान और श्रीलंका की किस्मत देख रहे हैं ।

चीन अगर रियायती कर्ज भी देता है तो उस परियोजना का ठेका चीनी कंपनी को देना होता है । उधार देने वाले देश को ठेका मिलने की शर्त आपत्तिजनक क्यों नहीं लगती ? पोखरा हवाई अड्डे पर चीनी ठेकेदार द्वारा व्यवहार्यता अध्ययन करने के बाद लागत का अनुमान लगाया गया और फिर ठेका भी वही लिए । अन्य देशों के साथ बीआरआई ऋण समझौते में यहा तक कहा गया है कि “यदि ऋणी देश किसी भी परियोजना के लिए ऋण चुकाने में असमर्थ है, चीन उस परियोजना का स्वामित्व लेने पर विचार कर सकता है, तो ऋणी देश को ऐसा करने की अनुमति देगी ।” वह आगे कहते हैं कि ”इस मामले में बहुराष्ट्रीय संबंधों की कोई गुञ्जाइस नहीं होगा ।” इसलिए सचेतता पुर्वक देश के विकास के उत्पादक क्षेत्र में निवेश करके और उस निवेश को बढ़ाया जाए तो ऋण भी लिया जा सकता है । चाहे बीआरआई हो या एमसीसी, नेपाल की समृद्धि और सार्वभौम सत्ता सुरक्षित हो तो लेना है । 

कुछ दिनों पहले चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एशिया-पैसिफिक स्टडीज विभाग के प्रमुख लैन जियानचु का एक लेख चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था एमसीसी: यूएस स्ट्रेटजी टू कंट्रोल चाइना । लेख में कहा गया है, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने चीन के आसपास संघर्ष को भड़काने के अपने प्रयासों को तेज कर दिया है । एमसीसी चीन को नियंत्रित करने की रणनीति का हिस्सा है । इसका उद्देश्य चीनी राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाना और चीन के विकास में बाधा डालना है ।” आगे लिखा गया है कि “एमसीसी अपनी स्थापना के बाद से बुनियादी ढांचे के निर्माण के नाम पर एक भूराजनीतिक हथियार रहा है । एमसीसी के पूर्ण पारित होने का मतलब होगा कि नेपाल अमेरिका की चीन विरोधी रणनीति की कठपुतली बन जाएगा। ” जबकि एमसीसी लंबे समय से मंगोलिया में लागू है, जो चीन के साथ एक आरामदायक सीमा साझा करता है । हाल ही में बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जियांग यू की नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस मे भी एमसीसी के खिलाफ प्रतिरोध की चेतावनी दिया था । एमसीसी के खिलाफ चीन लगातार बयानबाजी कर रही है । चीन स्पष्ट रूप से एमसीसी को भू-राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का शिकार बनाना चाहता है ।

चीन के इतना कहने के बाद कोई कैसे समझ सकता है कि नेपाल की सड़कों पर दिख रही हिंसा प्रायोजित नहीं है? इसके अलावा, नेपाल मे इन लोगौ ने राष्ट्रवाद का सहारा लिया है । वे अच्छी तरह जानते हैं कि अतिवादी राष्ट्रवाद मन की स्थिति को उत्तेजित करता है । किसी के चरम पक्ष और विपक्ष मे बनाता है । इसीलिए राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आदि की बयानबाजी, गीत, नारे, रैलियां, प्रतिरोध समूह आदि ने नेपाल को इतना उकुसमुकुस बना दिया कि मानो नेपाल पतन के कगार पर है और हम पर अमेरिका का धारदार हथियार से हमला किया जा रहा है । 

चरमपंथी राष्ट्रवाद गद्दारों, दलालों, गैर-राष्ट्रीय तत्वों आदि के विशेषणों की व्याख्या करता है । नेपाल की राजनीति ने आज तक अपने नागरिकों को यही सिखाया है । ऋतिक रोशन काण्ड मे उन्होंने कहा कि भारतीय जैसा दिखानेवाले मधेसियों को पीटा जाना चाहिए । हमारा कितना हिंसक राष्ट्रवाद है जो मधेसी और जन जाति समूहों को उनकी पहचान में नेपाली राष्ट्रीयता की नहीं मानता है । 

हमारे राष्ट्रवाद का आंतरिक आधार एकल संस्कृति बन गया और बाहरी आधार दुश्मन करार किया गया तथाकथित साम्राज्यवादी और विस्तारवादी देशों जो बास्तव मे लोकतांत्रिक दुनिया के अग्रणी संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत आदिका विरोध बन गया । इस प्रकार बने राष्ट्रवाद में हम कठोर हैं और देश बर्बाद है, गरीब है । २०५० के दशक में, भारत अरुण जलविद्युत परियोजना बनाना चहती थी लेकिन यूएमएल ने इस परियोजना की भ्रूणों को मार डाला था । अभी तक फास्ट ट्रैक बन जाता । पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत ‘बूट’ (निर्माण, स्वामित्व, संचालन और हस्तांतरण) मॉडल में, भारतीय कंपनी चार साल के भीतर फास्ट ट्रैक को पूरा करने का उपक्रम कर रही थी ।  इसी तहत राष्ट्रवाद की आड़ मे नहीं बनने दिया गया । इतना समय बर्बाद हो गया, समय का क्या मूल्य है? बिना फास्ट ट्रैक के परिवहन में बढ़े निवेश का भुगतान कौन करेगा? आज नेपाली सेना इसको हमारी ३ ट्रिलियन से अधिक पैसा मे बना रही है, इतनी रकम मे हम एक और बडी योजना बना सकते थें । क्या देश को कर्ज में डुबोकर गरीब बनाना राष्ट्रवाद है या फिर संप्रभुता की रक्षा करते हुए इसे विकसित देश बनाना राष्ट्रवाद है ?

एमसीसी द्वारा बनाई जाने वाली प्रसारण लाइन से संबंधित परियोजनाओं में बैंकों द्वारा लगभग १,२०० अरब रुपये का ऋण निवेस किया गया है । एमसीसी नही आइ तो डूब सकता है । हाइड्रो नेपाल के लिए संभावित क्षेत्र है । अभि हाइड्रो में निवेश करने वाले उत्साहित हैं । अधिक बहारी निवेशकों को आकर्षित करने की प्रबल संभावना है । एमसीसी की मदद से, यदि नेपाल अंतरराष्ट्रीय बिजली व्यापार में सफल होता है, तो नेपाल के लिए त्रिपक्षीय व्यापार करना आसान हो जाएगा । एमसीसी का कार्यान्वयन आवश्यक है क्योंकि नेपाल ऊर्जा क्षेत्र के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था का विकास सुनिश्चित करेगा । यह सहयोग है, जिसे वापस करने की आवश्यकता नहीं है ।लेखक – सन्तोष मेहता, नेता लोसपा

इसे भी सुनें 

 

 



About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: