“विभिषण” क्या सचमुच दुष्ट था ?: बिम्मी कालिन्दी शर्मा
“विभिषण”
बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बीरगंज (व्यंग्य) । विभिषण घर का भेदी नहीं था, वह तो सत्य और धर्म के स्थापना के लिए पूर्व समर्पित एक महा -मानव था ।
विभिषण यानी रावण का भाई जिसने अपने दुष्ट भाई का साथ न दे कर प्रभु श्रीराम का साथ दिया । रावण को हराने में विभिषण का विशेष सहयोग था । ईसी लिए विभिषण को ‘घर का भेदी लंका ढाए’ भी कहा जाता है । पर क्या सचमुच विभिषण दुष्ट था ? ऊसने तो सिर्फ सत्य और धर्म का साथ दिया । जो लोग रात दिन धर्म की दुहाई देते है पर करते पाप और कुकर्म है उनके लिए विभिषण खलनायक ही रहेगा । क्यों कि वह सत्य देखना और सुनना नहीं चाहते फिर सत्य को सहन करने की तो बात ही दूर है ।
सगा बडा भाई गलत करे, कुकर्म और पाप करे फिर भी क्या उसका साथ देना जरुरी है ? रावण विभिषण का सगा बडा भाई होते हुए भी राक्षसी प्रवृति का था । उसका ज्यादातर समय अय्याशियों में बितता था । रावण भले ही वह भगवान शिव का भक्त था पर था कामातुर और लंपट । ईसी लिए तो सीताजी को हरण कर के लाया की उनको अपनी मन मर्जी से वरण कर सके । पर लक्ष्मी और शक्ति स्वरुपा सीताजी के साथ जब उसकी मनोकांक्षा पूरी न हो सकी तो वह अनेक तिकड़म लगाने लगा । ईसमें कोई शक नहीं की रावण महाज्ञानी था पर उसने अपने ज्ञान का दुरुपयोग ज्यादा किया । यदि वह सच में अपने ज्ञान का सदुपयोग करता तो सीता का हरण कदापि न करता । पर उसे राम के हाथों मरने कि ईच्छा थी ईसी लिए जान बुझ कर कुकर्म करता था की वह जैसे भी हो राम के हाथों मर कर वैकुण्ठ को प्राप्त हो जाए । उसे यह भी मालूम था कि भगवान राम का जन्म उसको मारने के लिए ही हुआ है ।
वह अपने राज्य के गरीब प्रजा को दु:ख देता था और ऋषी और साधुओं से जबरजस्ति राजस्व मागता था । यदि वह राजस्व नगद के रुप में न दे पाए तो उनके शरीर से उनका रक्त निचोड कर राजस्व के रुप में वसुलता था । उसकी लंका सोने की थी पर बांकी प्रजा निर्धन थी । अब जो राजा अपनी प्रजा को ईतना दु:ख देता हो तो उसका साथ कौन देगा ? यदि विभिषण ने ऐसे दुष्ट भाईका साथ न दे कर श्रीराम का साथ दिया तो क्या गलत किया ? विभिषण वैष्णव और रामभक्त थे । उन्होने अपने भाई को कई बार समझाया । राम से शत्रुता न ले और हरण कर के लायी गयी सीता को स-सम्मान वापस कर दे । पर रावण नहीं माना । आखिर में दुसरे की बेटी, बहू और पत्नी का हरण कर के क्या मिलता है रावण जैसे राक्षसों को ? ऐसे में विभिषण ने रावण का साथ छोड कर सत्य और धर्म का साथ दे कर क्या गलत किया ? गलत को गलत कहना और सत्य और धर्म की रक्षा के लिए लडना हर युग मे सही था और है तो फिर विभिषण गलत कैसे हो सकता है ?
रावण की पत्नी भी विष्णु भक्त थी और वैष्णव थी । पर रावण के डर से अपने माथे पर लगाने वाला वैषण्व का श्री चिन्ह अंकित तीलक अपने गले में पिछे की और लगाती थी जंहा पर रावण की नजर पहुंच न सके । जब रावण की पत्नी ही ईतना डर डर के रहती थी तब बांकी प्रजा की हालत क्या होगी सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । ईसी लिए तो रावण के वध के बाद मन्दोदरी ने विभिषण के साथ विवाह कर लिया था । विभिषण सात्विक बिचार के थे । अपने बडे भाई रावण के जैसा राक्षसी प्रवृत्ति उनमें नहीं थी । ईसी लिए उन्होनें रावण के कुकर्मो में उस का साथ नहीं दिया और धर्म का साथ देने के लिए श्रीराम के शरण में चले गए । यदि राम भी गलत होते कुकर्म करते तो क्या लक्ष्मण और भरत राम का साथ देते ? नहीं देते न फिर विभिषण ने रावण के अत्याचारों में उसका साथ नहीं दिया तो वह ‘घर का भेदी’ कैसे हो गया ?
रावण का पतन तो निश्चित था । उसके पापकर्म ईतने बढ चूके थे कि राम के अलावा और कोई बचा नहीं सकता था । राम का जन्म ही जब रावण का वध करने के लिए हुआ था तो वह कब तक बचता ? भगवान शिव का अनन्य भक्त हो कर भी स्वयं शिव भी उसकी रक्षा न कर सके । बडे ऋषी और संत का संतान हो कर भी रावण में अहंकार बहुत था जिसके कारण वह हर कुकर्म करने से डरता नहीं था । ईसी लिए विभिषण ने अपने भाई का साथ नहीं दिया या जो एकदम सही था । जब न्याय और सत्य का पक्ष लेने और लडने की बात आती है तब हम कथित अपनों के भुलावे में आ जाते है और जानबुझ कर गलत और असत्य का साथ देते है । यदि अपना कोई दुष्ट हो राक्षसी प्रवृति का हो, अन्याय करता हो, दुसरों को दु:ख दे कर खुश होता हो तो ऐसे अपने का साथ कोई क्यों दें । बातें सत्य और ईमान की करते हैं और ब्यवहार ठीक उल्टा । ईसी लिए तो न्याय का तराजू हमेशा डगमगाया रहता है । विभिषण ने जो किया था एकदम सही किया था और हमें भी कभी खून का रिश्ते के नाम पर किसी दुष्ट अपने के पक्ष में अपने ईमान और विवेक को मारना नहीं चाहिए । विभिषण घर का भेदी नहीं था बल्कि हम छद्मवेशी है ईसी लिए तो सत्य और न्याय का साथ देने से डरते हैं और रावण के जैसा ही पतन हो कर रह जाते हैं ।

