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देश का लड़खड़ाता अर्थतन्त्र : अंशुकुमारी झा

 

अंशु कुमारी झा, हिमालिनी, अंक जुलाई 022। अर्थ का हमारे जीवन में बहुत ही महत्व है । हर एक व्यक्ति को पृथक–पृथक अर्थ की आवश्यकता होती है । बिना अर्थ हम सुखी जीवन कल्पना भी नहीं कर सकते हैं । आज के जमाने में एक कदम बढ़ाने के लिए सबसे पहले पैसा ही चाहिए तो हम सोच सकते हैं कि एक समूचा देश चलाने के लिए अर्थ कितना मायने रखता है । अब बात आती है, अर्थ तो सभी को चाहिए पर हम उसे व्यवस्थित ढंग से उपभोग कैसे कर सकते हैं । तब हम कह सकते हैं कि एक सहज बजट का निर्माण कर अर्थव्यवस्था को संतुलित बना सकते हैं । एक छोटा सा परिवार हो, समाज हो, संस्था हो या एक देश हो सभी के दूरगामी विकास के लिए बजट का होना आवश्यक है । बजट शब्द की उत्पत्ति इटली के राजा द्वारा हुई है । उन्होंने ही सबसे पहले भरी सभा में चमड़े की थैली निकाला जिसमें पैसे थे, बजट शब्द का उच्चारण किया । वहीं से बजट की अवधारणा शुरु हुई । बजट हम वार्षिक, अद्र्धवार्षिक, मासिक या अपनी आवश्यकता अनुसार निर्माण कर सकते हैं । परन्तु देश चलाने के लिए वार्षिक बजट ही तैयार करना होता है । इससे हम एक वर्ष की आर्थिक गतिविधि का मूल्यांकन सही तरीके से कर सकते हैंं और आने वाले बजट के लिए सचेत भी हो जाते हैं ।

फिलहाल हमारे देश की अर्थव्यवस्था कुछ हिल सी गई है । आप कल्पना कर सकते हैं कि जहां का अर्थमन्त्री ही हिले हों वहां की अर्थव्यवस्था की क्या कही जा सकती है ? देश की समग्र स्थिति कहीं भी सही नहीं है । जिधर देखिये उधर शून्य ही शून्य दिखता है । नेपाल का अर्थतन्त्र भी संकट के राह पर अग्रसर है । बैंक तथा वित्तिय संस्थाओं में अर्थ का अभाव होना हमें आर्थिक संकट का सिगनल दे रहा है ।
जब हम एक देश चला रहे होते हैं तो हमें देश की सम्पूर्ण जनता का ध्यान रखते हुए बजट निर्माण करना होता है परन्तु २०७९÷८० का बजेट निर्माण के क्रम में किसी कम्पनी विशेष का ध्यान रखा गया जिससे अर्थतन्त्र गम्भीर अवस्था में पहुंच गया । फलतः अर्थमन्त्री को अपने पद से राजीनामा देनी पड़ा ।

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अब पछताए होत क्या
जब चिडि़या चुग गई खेत ।

देश की वैदेशिक मुद्रा सञ्चिति खिसकती जा रही है । उपभोग की वस्तुओं की मूल्यवृद्धि आसमान को छू रहा है । जनता को आर्थिक संकट का आभास हो रहा है । उक्त संकट के समाधान का पहल अगर समय पर नहीं किया गया, शासक सत्ताभोग में ही लिप्त रहा तो वह दिन दूर नहीं कि नेपाल की भी श्रीलंका जैसी अवस्था आ जाय । इस वक्त सत्ता सम्भालने वाले को अहोरात्र देश के अर्थतन्त्र सुधारने हेतु काम करना चाहिए परन्तु उन्हें तो देश की नाजुक स्थिति की छटपटी ही नहीं है । सत्ता के ताप से अभी भी प्रज्जवलित हो रहे हैं । इधर से उधर से सम्पति इकट्ठा करने में लगे हुए हैं । सत्ताभोग के सिवाय अभी भी कुछ नहीं सूझ रहा है । हमारे देश की जो परम्परागत नीति है, कुर्सी पर बैठकर धन बटोरना इस नीति में फिलहाल परिमार्जन करना अत्यन्त आवश्यक है ।

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हमारे राष्ट्र की सरकार की सोच भी कुछ अलग ही है, देश के अर्थततन्त्र को सबल बनाने के लिए डालर का जुगार करने के बजाय हथियार खरीदने के नाम पर ८४ करोड़ रुपैया उल्टे विदेश भेजने की घटना कितनी अजीब है न । देश की यह आर्थिक दुर्दशा आज ही हुई है यह बात नहीं है । एक कहावत है न, बूंद बूंद से तालाब भरता है उसी प्रकार यह आर्थिक समस्या भी धीरे–धीरे बढी है । फिलहाल पानी नाक से ऊपर आ गया है तो डूब मरने के डर से कुछ भद्र नेताओं ने आवाज उठाई है । विगत में जो भी हुआ वर्तमान सरकार का दायित्व बनता है कि वह अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निर्वाह करे और अर्थतन्त्र सुदृढ़ करने के तरफ कदम बढ़ाए । विदेशी मुद्रा को कहां और कैसे खर्च किया जाय इस पर सावधानीपूर्वक विचार करें । हमारे विचार में नेपाल के लिए महंगे हथियार की आवश्यकता ही क्या है ? देश संकट से जूझ रहा है इस वक्त इस वक्त हमें हथियार नहीं जीवन यापन के लिए उपभोग की वस्तुओं की जरुरत है । देश के किसानों को खेती के लिए उपयुक्त बीज और मल भी सरकार उपलब्ध नहीं करा सकती इससे चिन्तनीय विषय क्या हो सकता है । तराई को अन्न का भण्डार माना जाता परन्तु सरकार के अकर्मन्यता के कारण अपेक्षा अनुरूप अन्न उगाने में किसान असक्षम हो जाते हैं । अगर खेती योग्य भूमि को और भी उपजाऊ बनाई जाय तो अन्न आयात में कुछ तो कमी आएगी । इसी तरह बहुत सारा क्षेत्र है जिस पर अगर हम ध्यान दें तो हम आयात का दर घटा सकते हैं और निर्यात बढा सकते हैं ।

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विपक्षी दलों का कहना है कि इस वर्ष का बजट विधि और मान्यता को कुचलकर लाया गया है इसलिए हमें उक्त बजट मान्य नहीं है और यह कार्यान्वयन भी नहीं हो सकता है । कितनी दुख की बात है, किसी व्यक्ति विशेष या कम्पनी विशेष के लिए बजट के साथ छेडखानी करना । जनता के साथ या देश के साथ धोखा करना बहुत ही निंदनीय है ।

समग्र में अभी देश संकट में है । जिस प्रकार हम सब मिलकर अपनों को संकट से उबारते हैं यसी प्रकार अपने देश को भी आर्थिक संकट से बचाने के लिए सबको एकजुट होना होगा । उदाहरणस्वरूप हम गृहिणी रसोई में थोडा सा जीरा बचाकर अगले महीना के बजट में बचत कर लेते हैं । उसी प्रकार देश के हर नागरिक का कर्तव्य बनता है कि अपने आप में बचत करने का अभ्यास डालें ताकि देश की अर्थ व्यवस्था थोड़ी बहुत सुधर सके । सरकार अभी के संकट घड़ी में धैर्यतापूर्वक निर्णय लें ।

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