नेपाल की नियति : गठबन्धन सरकार की पुनरावृत्ति : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक फरवरी । अब्राहम लिंकन ने कहा है कि लोकतंत्र “जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार” है । अर्थात् लोकतंत्र जनता का शासन है । इसका मूल सिद्धांत यह है कि जनता लगातार, पारदर्शी और स्वतंत्र चुनावों के माध्यम से सरकार का चुनाव करती है । सभ्यता के इतिहास में, दुनिया को राजशाही, शाही और विजय आधारित सत्ता संरचनाओं से लोकप्रिय शासन, आत्मनिर्णय और शांतिपूर्ण सह–अस्तित्व में बदलने के लिए लोकतंत्र आवश्यक रहा है । दुनिया में सरकार की एकमात्र ज्ञात प्रणाली जो समानता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता की अवधारणाओं को स्थापित करने का वादा करती है, वह लोकतंत्र है, जहां नागरिक राष्ट्र के लिए निर्णय लेते हैं । सरकार नीतियों को विकसित करने और राष्ट्र के लिए चुनाव करने के लिए चर्चा और बातचीत के आधार पर कार्य करती है, जिसमें लोगों को अपने प्रतिनिधियों का चयन करने, राष्ट्र के मामलों के लिए जिम्मेदारी आवंटित करने और उनकी अस्वीकृति को आवाज देने का अंतिम अधिकार होता है । लोकतंत्र में शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता के हाथों में समाहित होती है । तथा जनता शासन में सक्रिय भूमिका निभाती है । लोकतंत्र में जनता को सरकार का निर्माण करने के साथ–साथ शासन की जन विरोधी नीतियों तथा कानूनों का संवैधानिक ढंग से विरोध करने का अधिकार भी प्राप्त है । लोकतंत्र प्रभुत्व शक्ति ना होकर निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रबुद्ध शक्ति को जनहित में प्रयोग करने की व्यवस्था का नाम है ।
लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है । लोकतंत्र एक समग्र और जीवंत प्रणाली है । यह समाज और राज्य के जीवन का तरीका है । लोकतंत्र के मूल में न्याय, स्वतंत्रता, समानता, स्वाभिमान, सुशासन और समृद्धि की आकांक्षा निहित है । लोकतंत्र एक सरलीकृत निरंतरता नहीं है । यह हमेशा ऊपर नीचे होता रहता है । दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां लोकतंत्र की हत्या की गई है । लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए इसकी प्रक्रिया और विषय–वस्तु दोनों को लगातार परिष्कृत और नवीकृत किया जाना चाहिए । समय–समय पर आम चुनाव लोकतंत्र के निरंतर शुद्धिकरण और नवीनीकरण की एक महान प्रक्रिया है । इसलिए आम चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है ।
नेपाल में लोकतंत्र का यह महापर्व हाल में ही सम्पन्न हुआ है । प्रतिनिधि सभा और प्रदेश सभा का निर्वाचन सम्पन्न होने के साथ ही परिणाम भी आ चुका है । नेपाली कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई है । नेपाली कांग्रेस एवं सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार बनाने की ओर अग्रसर है । पिछले दिनों संपन्न संसदीय चुनाव में मतदाताओं ने किसी भी दल या गठबंधन के पक्ष में जनादेश नहीं दिया । मुख्य विपक्षी दल एमाले ने हालांकि संसद में संतोषजनक उपस्थिति दर्ज कराई है । किन्तु एमाले अध्यक्ष के दावे और भारत विरोधी वक्तव्यों के बावजूद उन्हें वो स्थान नहीं मिला जो उनकी अपेक्षा थी ।
इस चुनाव में दो विलक्षण राजनीतिक प्रवृतियां उभरी हैं, जिन पर देश और देश के बाहर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चाएं जारी हैं । अगर यह दोनों प्रवृत्तियां स्थाई आकार लेती हैं तो आने वाले दिनों में हिमालयी राज्य की राजनीति में आमूल–चूल बदलाव हो सकते हैं । वास्तव में राजनीतिक विश्लेषकों के मन में ये दोनों प्रवृत्तियां कौतूहल पैदा कर रही हैं । पहली गौर करने वाली बात यह है कि राजतंत्र समर्थक माने जाने वाला दल राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी को अपेक्षा से अधिक सफलता मिली है और दूसरी युवाओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा गठित राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है । इसी वर्ष जून में इस पार्टी का गठन हुआ था । इस पार्टी की सफलता से युवाओं और नौजवानों में विशेष रूप से उत्साह देखा जा रहा है । इसकी सफलता से अन्य राजनीतिक दलों में भी युवा पीढ़ी को नेतृत्व हस्तांतरित करने का दबाव बढ़ रहा है । नेपाली राजनीति में यह एक नई परिघटना है ।
राष्ट्रीय प्रजातंत्र और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, इन दोनों को जो चुनावी सफलता मिली है उससे यह भी स्पष्ट होता है कि हिमालयी राज्य की राजनीति में विभिन्न वैचारिक समूहों के प्रति मतदाताओं का रुझान बढ़ा है । लेकिन चुनाव परिणाम यह भी बताता है कि नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व के प्रति मतदाताओं ने अपना भरोसा कायम रखा है ।
वर्तमान गठबंधन के साथ देउबा के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की संभावना प्रबल है, लेकिन उनकी आगे की राह भी चुनौतियों से भरी हुई है । कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ गठबंधन की सरकार चलाना अंगारों पर चलने की तरह है । नेपाल जैसे आर्थिक रूप से कमजोर देश के लिए आर्थिक विकास का रोडमैप तैयार करना उनके लिए दूसरी मुख्य चुनौती है । जिसे आसानी से हल नहीं किया जा सकता क्योंकि गठबन्धन की सरकार हमेशा टूट के कगार पर खड़ी रहती है । जनता का मतादेश फिर से दाँव पर है क्योंकि परिवर्तन के लिए बहुमत की सरकार का होना आवश्यक होता है । वैसे भी नेपाल की राजनीति में देश हित से अधिक स्वहित की परम्परा बहुत पुरानी है । नेताओं को पद की अपेक्षा रहती है और उन्हें साथ रखने के लिए अनावश्यक रूप से पद और मंत्रालय गठन का इतिहास रहा है जिसका भार जनता ही उठाती है ।
देश की राजनीति को चुनाव से पहले का परिदृश्य बहुत हद तक उजागर कर चुका था । इस बार का चुनाव एक जीवन्त लोकतान्त्रिक चुनाव कम और सिन्डिकेटतन्त्र का बकवास अधिक था । इस स्तर का, और इतनी अधिकता के साथ अराजनीतिक, अवैचारिक और विजातीय गठबन्धन नेपाल के लोकतान्त्रिक चुनाव के इतिहास में शायद ही कभी हुआ होगा । सम्भव है कि आगामी समय में इससे भी अधिक अनैतिक गठबन्धन हो क्योंकि यह राजनीति है जहाँ अब नीति नहीं अ–नीति की अधिकता हो गई है ।
पिछले चुनाव में भी ‘कम्युनिस्ट गठबन्धन’ हुआ था । एमाले और माओवादी के गठबन्धन को स्वाभाविक माना जा सकता है क्योंकि ये दोनों पार्टी २००६ साल में पुष्पलाल द्वारा स्थापित नेकपा के अंग थे । दोनों समूह विचार से माक्र्सवादी, लेनिनवादी ही थे । एक ही विचार, आन्दोलन और दल के भीतर के घटक के गठबन्धन को अराजनीतिक, अवैचारिक नहीं कहा जा सकता है । किन्तु इस बार जो सबसे अधिक अनैतिक था वह था एमाले के साथ जसपा का तालमेल और उससे भी अधिक यह अनैतिक है कि परिणाम के बाद खुद को उस पार्टी से अलग कर सत्ता गठबन्धन में शामिल होने की मंशा । अर्थात ऐन केन प्रकारेण हासिल सत्ता प्राप्ति ही है ।
इस चुनाव में एक और प्रवृत्ति उभर कर आई वह थी व्यक्तिगत स्वार्थ, अहं और आक्रोश । जहाँ ऐसे भी नेता थे जिन्हें उनकी पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वो स्वतंत्र से उठ खड़े हुए और जनता के दरवाजे पर यह कह कर गए कि मेरे साथ अन्याय हुआ है इसलिए मुझे आप जिताइए । यहाँ उनके पास व्यक्तिगत आक्रोश था, अपने क्षेत्र विशेष के लिए कोइृ एजेण्डा नहीं । और जनता फिर से जाति, पैसे और भावुकता में बह गई । यहाँ किसे दोष दिया जाए ? सीधी सी बात है कि जनता ही गलती करती आई है और आगे भी करती रहेगी । वो उन्हें चुनने की गलती कर बैठती है जिनके पास कोई सृजनशील बहस नहीं है, नीति नहीं है, कोई स्पष्ट विजन नहीं है अगर कुछ है तो व्यक्तिगत कुण्ठा, प्रतिशोध, और आक्रोश । ये वही नेता होते हैं जो अपने पद का धौंस दिखाते हैं और जब पद खोने का डर होता है तो जनता के पैरों पर गिरने से भी नहीं हिचकते हैं और महान जनता उस घडि़याली आँसू पर पिघलने की गलती कर बैठते हैं ।
इस समय राजनीति में अवसरवाद सबसे अधिक मजबूती से अपना स्थान बनाए हुए है बाकी ‘वाद’ धुमिल होता जा रहा है । चुनाव से पहले हम सब ने देखा कि नेताओं की बस एक ही नीति थी वह थी टिकट प्राप्त करना । चाहे उसके लिए पार्टी तोड़ना हो, जोड़ना हो, गठबन्धन करना हो, पार्टी छोड़ कर रातो रात विपरीत पार्टी की सदस्यता लेनी हो, चापलूसी करनी हो, चाकरी करनी हो, पैसा खर्च करना हो, सब करेंगे बस एक टिकत मिल जानी चाहिए । क्या ये सारे हथकंडे देश सेवा के लिए हैं ? जाहिर सी बात है कि बिल्कुल नहीं । ये हथकंडे तो आगामी चार वर्ष अपनी सेवा के लिए अपनाए जाते हैं ।
आज राजनीति अपनी परिभाषा खो चुकी है । राजनीतिक दलों के बीच की भिन्तता या मौलिकता अर्थहीन और अस्तित्वविहीन हो चुकका है । सभी हमाम में नंगे हैं, एक ही थाली के चट्टे बट्टे । जो यह सब गुर जानते हैं वही राजनीति के सफल खिलाड़ी हैं । परिणाम के बाद असल खेल अब शुरु हो चुका है । समानुपाती के नाम पर अपने अपने लोगों को संसद में स्थान देना, नेताओं की खरीद बिक्री, मंत्रीपद का आवंटन का खेल जारी है ।
यह इस देश की विडम्बना ही है कि देश में नया संविधान जारी होने के बाद, संविधान सभा द्वारा संविधान बनने के बाद, संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद, और साम्यवादी गठबंधन की लगभग दो–तिहाई सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक स्थिरता नहीं आ पाई । क्या हमने कभी सोचा कि बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना के ३३ साल बाद भी यह देश दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक क्यों है ? अर्थव्यवस्था में कोई संरचनात्मक सुधार क्यों नहीं किया गया ? दुनिया के सारे देश तरक्की कर रहे हैं, सिर्फ नेपाल हमेशा के लिए गरीब रहने के लिए अभिशप्त क्यों है ? इसका क्या कारण है और इसका हल क्या हो सकता है ? क्यों हमारे युवा पलायन कर रहे हैं ? क्यों विदेश की मिट्टी में अपने आप को लाशों में तब्दील कर रहे हैं ? नहीं हमने कभी यह सोचने की कोशिश ही नहीं की है, अगर की होती तो इस चुनाव में कई चेहरे राजनीतिक पटल से हट गए होते । उन्हें इस लिए नहीं चुना जाता कि अब वो ढलती उम्र की कगार पर हैं तो उन्हें जिता दिया जाए । एक दिन भी महत्तव रखता है पर आपने तो पूरे के पूरे चार साल गिरवी रख दिए और आगे भी वही करते आएँगे ।
यही वजह है कि देश में सामाजिक भेदभाव, बहुसंस्कृतिवाद और समावेशिता को समाप्त करना आज तक सम्भव नहीं हो पाया क्योंकि हम देश का भार उन कंधों पर दे रहे हैं जिनके पास वैश्विक स्तर की ना तो सोच है ना ही दूरदर्शिता ।
हम सोच ही नहीं पाए कि पिछले पांच सालों में भ्रष्टाचार क्यों बढ़ा है ? हमने किस तरह की संवैधानिक संस्थाएं और न्यायिक निकाय बनाए हैं ? जिन्हें हम फिर से चुन रहे हैं उन्होंने भ्रष्टाचार और कुशासन को रोकने के लिए कोई महत्वपूर्ण योगदान क्यों नहीं दिया ? इसके बजाय, वे बदनाम क्यों हुए ? अदालत इतनी बदनाम क्यों है ? सत्ता इतनी बदनाम क्यों है ? देश और जनता के दीर्घकालीन भविष्य से जुड़े तमाम मुद्दे क्यों आज भी सवाल ही बने हुए हैं ? लोकतंत्र की आत्मा खो गई है । सभी जानते हैं कि इस प्रवृत्ति से देश कहीं नहीं पहुंचेगा । संभावना और गतिशीलता को ऐसे मारा जा रहा है जैसे कंस ने अपनी सत्ता को खो देने के डर से सभी नवजात शिशुओं को एक के बाद एक मार डाला था ।
इन सभी तथ्यों के बाद भी इस चुनाव ने परिवर्तन की दिशा भी तय की है जिसमें चंद जागरुक जनता का महत्तवपूर्ण योगदान अवश्य है । क्योंकि इस चुनाव के परिणाम ने यह बताया कि वह नेपाली कांग्रेस, जिसने ७० वर्षों से अधिक के इतिहास के साथ राजशाही, पंचायत और राजशाही को उखाड़ फेंकने में अग्रणी भूमिका निभाई थी, नए मतदाताओं को आकर्षित करने में असमर्थ रही । अंतरराष्ट्रीय समुदाय, बुद्धिजीवियों और निजी क्षेत्र के भरोसे वाली कांग्रेस बहुमत हासिल नहीं कर पाई । जाहिर है कि जनता की अपेक्षा पर यह भी खरी नहीं उतर पाई है ।
राष्ट्रीय स्वतन्त्र, जनमत, नागरिक उन्मुक्ति जैसे दलों के उदय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोग अब एक खुले दिमाग वाले शिक्षित युवा नेता की तलाश कर रहे हैं, जिस पर इतिहास का बोझ न हो । इसलिए आज की आवश्यकता यह है कि यदि कांग्रेस जनता का विश्वास हासिल करना चाहती है तो पुरानी पीढ़ी के नेताओं को संरक्षकता संभालनी चाहिए और युवा पीढ़ी को पार्टी और सरकार चलाने का जिम्मा सौंपना चाहिए । क्योंकि उन्हीं के भरोसे कांग्रेस ने इस चुनाव में कुछ वोटों की बढ़ोतरी की है ।
अगर कांग्रेस युवा पीढ़ी को स्थापित करती है तो रवि, बालेन जैसे युवा और पार्टी से बाहर के बुद्धिजीवियों को एक साथ लाने का माहौल तैयार किया जा सकता है । क्योंकि ये युवा नेता दुनिया के बदलते हालात को समझ सकते हैं और एक दूरगामी नीति ला सकते हैं ।
कांग्रेस के पास युवा पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपकर पार्टी को नई ऊंचाई पर ले जाने का यह आखिरी और सुनहरा अवसर है । क्योंकि अगले ५–१० साल बाद यह पीढ़ी भी अप्रासंगिक हो जाएगी । उस समय तक, युवा लोगों की एक नई पीढ़ी नेतृत्व संभालने के लिए महत्वाकांक्षी हो चुकी होगी, इसलिए पार्टी के अस्तित्व को जारी रखने के लिए एक मजबूत पीढ़ी को तैयार किया जाना चाहिए यही समय और हालात की माँग है ।


