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राजनीतिक दलदल में नेपाल : अजयकुमार झा

 

 

अजयकुमार झा, जलेश्वर । नेपाल के सभी राजनीतिक व्यक्ति और सत्ताधारीयों का एक ही आदर्श है; वह है- उग्र राष्ट्रवाद के नामपर आमजन और देसके भविष्य को गर्त में डालते हुए भी व्यक्तिगत विकास और पारिवारिक उन्नति करना। धन और पद के आगे धर्म, संस्कृति और सभ्यता तक को बेचने वालों से सुरक्षित भविष्य का कल्पना करना मूढ़ता का ही प्रतीक है। आज, क्या एक भी नेपाली नागरिक अपनेआप को विश्व के किसी भी देश में गौरव के साथ माओवादी के नामपर शिर उठाके जीने का अनुभव कर पा रहे हैं ? नेपाल के किसी राजनीतिक बिचारक के आदर्श को विश्व पटल पर स्थापित होने का गरिमा से मंडित होने का सौभाग्य मिल पाया है? इस विश्व मंच में यदि आज नेपाल को जो कुछ गरिमा प्राप्त है वह राजर्षि जनक और सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के कारण है, जिसे नेपाल के तथाकथित माओवादी, मार्कसवादी, समाजवादी और लेलिनवादियों ने इसाइयों के हाथो बेच डाला है। धर्म निरपेक्षता के षडयंत्र तहत 90% नेपालियो के आत्मा से छल किया गया है। देस के सर्वोच्च व्यक्तियों द्वारा होली वाइन के नामपर आत्मपतन रस पीना बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग और सम्यक आहार तथा सम्यकता रूपी नेपाली संस्कार का धज्जी उड़ाना है। हिन्दू संस्कृति के शिखर अस्तित्व के रुपमे चीर परिचित पशुपति नाथ, स्वर्गद्वारी, जानकी मंदिर, बराह क्षेत्र को नजरअंदाज करना संस्कारगत पतन का द्योतक है। क्या संस्कार है हमारे नेतृत्व वर्ग में कि जिसके कारण आज हमें विश्व में प्रतिष्ठा और पहचान मिल पाए? वास्तव में हम मूढ़ता रूपी धर्म निरपेक्षता के नामपर योजनाबद्ध तरीके से सामूहिक रूपसे अपनी ही जड़ो को उखाड़ने पर तुले हैं, और खुद को आधुनिक समझ गौरवान्वित समझ रहे हैं। क्या हम इतने दीनहिन् और बुद्धू हो गए हैं कि जिसके निर्देस पर क्षणिक लोभ में फ़सकर हम अपनी धर्म, संस्कृति और सभ्यता को लात मार रहे हैं, वही, वो अपनी धर्म, संस्कृति और सभ्यता का पाँव हमारे यहाँ पसार रहा है, और हमें वोध तक नहीं हो रहा! जनसाधारण इसबात से वाकिफ़ होते हुए भी खुदको अपने ही चक्रव्यूह में फ़सा हुआ और मजबूर अनुभव कर रहा है। लोग देख रहे हैं, कि सबकुछ जनता के नामपर ही किया जा रहा है; लेकिन उन्हें बोलने तक का अधिकार नहीं है। यहाँ के अधिकाँश प्रौढ़ नागरिक भोलेभाले हैं और युवावर्ग वेहोश है। ए धूर्त राजनीति कर्मी अपनी तात्कालिक लाभ और सत्ता समरक्षण के लिए इन्हें बड़ी आसानी से अपनी चक्रव्यूह में फसाकर युवाओं के द्वारा ही युवाओं के भविष्य को मटियामेट कराते आ रहे हैं। दुर्भाग्य तो तब लगता है, जब देस के भविष्य युवा पुस्ता इन्हें अपना आदर्श और संरक्षक मानकर इनके लिए मरने मारने को उतारू हो जाते हैं। तथाकथित बिकाऊ नेपाली बुद्धिजीबी वर्ग क्षणिक लाभ के लिए अपनी ही युवाओं को गुमराह कर सामूहिक आत्महत्या के लिए अपनी कलम को गतिमान कर तात्कालिक वाहवाही लुटने में अपनी काबीलियत समझते हैं। कबीर दास ने कहा है “बुरे बंश कबीर के उपजे पूत कमाल”।
अतः देस के एक भी आम नागरिक, जो किसी भी पार्टी और संस्था के सदस्य नहीं है; उनसे गणतंत्र का स्वाद पूछा जाय, तब जा के पता चलेगा कि लोकतंत्र में लोक का हाल क्या है! इसके बावजूद निराशा की कोई बात नहीं है। हम बदल सकते हैं; हम बदल रहे हैं; इसका प्रमाण काठमांडू के बुद्धिमान देशभक्त नागरिकों ने वालेन को अपना समर्थन देकर दे दिया है। इस से एक ही तीर से दो काम सहज हो गया है। पहला मधेस और पहाड़ के विशुद्ध नेपाली जनता के बीच का वह दरार जो राजा महेंद्र से लेकर गणतंत्रवादी नेताओं के द्वारा योजनाबद्ध तरीके से प्रायोजित था, का खात्मा होने लगा है। दूसरा नेपाल के अस्तित्व संरक्षण एवं संवर्धन के लिए गणतंत्र नहीं गणतंत्र के गुणवत्ता और आवश्यकता की पहचान। हमें अब इसी पहचान को पोषित करते हुए आनेवाले समय में पूरी जिम्मेदारियों के साथ सक्रिय भूमिका निर्वाह करना होगा। समाज में दवे छुपे अच्छे व्यक्तियों को सम्मान के साथ राजनीति में सक्रिय भूमिका निर्वाह करने के लिए उत्साहित करना होगा। जैसे चिकित्सक के हाथों का छुरा भी प्राणदायी सिद्ध होता है वैसे ही जब ईमानदार के हाथों में हम अपना बागडोर सौपेंगे तो भविष्य सुंदर होगा ही।

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प्रत्येक समाज में कुछ लोग ईमानदार होते ही हैं। ईमानदारी का भी एक जुनून होता है। कुछ लोग मिल जाएंगे जो भ्रष्टाचारी के बदले कष्ट झेलना पसंद करेंगे लेकिन बेइमानी पर नहीं उतरेंगे। क्या ऐसे लोग आप के समाज में नहीं हैं? ध्यान रहे! संसार में सत्य है, ईमानदार है; इसी लिए असत्य और बेईमान भी जिंदा है। एक बस ड्राईभर पर हम विश्वास करते हैं; तब जाकर पूरे परिवार का जीवन उसके हाथों में सौंप देते हैं। परंतु, किसी पागल अथवा नसेड़ी पर हम इतना भरोसा नहीं कर सकतें। अतः हमें इतना तो विश्वास है, कि समाज के सब लोग खरब ही नहीं है। बहुत बड़े बड़े समाजसेवी, त्यागी, महात्मा, योगी आज भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ हमारे बीच उपस्थित हैं। उन्हें पहचान ने के लिए हमें ही एक्टिव होना होगा। क्या योगी आदित्य नाथ इसका सर्वोत्तम उदाहरण नहीं हैं? जाति, पार्टी, क्षेत्र और सिद्धांत विशेष के आधार पर हम विश्वास करने लायक अच्छे व्यक्तियों को नहीं खोज पाएंगे। ऐसे लोगों का अपना अलग सामाजिक और राजनीति कार्नर होता है। ऐसे लोग अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने में नहीं हिचकते। इस तरह के षडयंत्रों से ही राजनीति भड़ी पड़ी है। महाभारत, प्रथम और दूसरा विश्वयुद्ध, भारत पाक बड़वारा, सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और इजराइल हमास युद्ध तथा जापान का एटम कांड और रूस यूक्रेन युद्ध; मानवता के इतिहास में कलंक का धब्बा ही है। ऐसा कलंक तब लगता है जब हम पागल, उद्दंड, अति लोभी, अति लालची, स्वार्थी, पतित तथा गुंडों के हाथों में राष्ट्रीय सक्ति रूपी सत्ता सौंप देते हैं। क्या कमी थी कृष्ण प्रसाद भट्टराई में? किसके कहने पर काठमांडू बासी ने उन्हें हराया था? क्या उसका दुष्परिणाम आज नेपाली जनता, राजनीति और अर्थव्यवस्था को नहीं झेलना पड़ रहा है? जनता के प्रिय राजा वीरेंद्र के परिवार का सामूहिक हत्या क्या नेपाली के सहयोग बिना संभव था? क्या उस समय के सरकार से हमने यह प्रश्न किया? हमारे ऊपर वैदेशिक कर्ज बढ़ता जा रहा है। गर्भ में पल रहे बच्चे लाखों के कर्ज में डूबे हुए हैं; इसका खयाल है हमें? कल ऋण न चुका सकने पर हमें अपनी ही देश में गुलाम की भांति जीना पर सकता है; कभी सोचा हमने? नहीं न? अरे, ऊपर से ऋण का भार दिन प्रतिदिन इन नेताओं को पालने में बढ़ता जा रहा है। कौन सोचेगा इस पर? आप ही बताइए?
अब एक बात साफ हो गया है कि वर्तमान के नेपाली राजनीति के इन भेड़ों से कुछ भी आशा नहीं किया जा सकता है। यहां के किसी पार्टी का कोई सिद्धांत नहीं है। सब मिल जुलकर लूटने में माहिर हैं। यहां न पक्ष है न विपक्ष। सबके सब मतलब के यार हैं। जिस देश में सत्ताधारी और विपक्ष दोनों मिलकर देश लूटता हो; उस देश में राजनीतिक आदर्श की बात करना ही मूर्खता है। अतः अब व्यक्तित्व की पहचान किया जाय। और अच्छे व्यक्तियों को सम्मान के साथ राजनीति में आगे बढ़ाया जाए।
सोरह साल के हो जाने का यह मतलब नहीं होता कि वह शासन को चुनने में सक्षम हो गए हो। शासन का चुनाव एक बहुत ही कुशल, बुद्धिमत्तापूर्ण काम होना चाहिए। लेकिन शासन का चुनाव करना, ऐसे लोगों को चुनना जिनके हाथों में हमसभी के ऊपर शासन करने की ताकत होगी, और जो देश और दुनिया की नियति तय करने वाले होंगे, उसके लिए केवल सोरह साल का होना निश्चय ही काफी नहीं है। जिस प्रकार हम उनका चुनाव कर रहे हैं वह बिलकुल मूढ़तापूर्ण है। हर प्रांत के सभी विश्व विद्यालय सारे उपकुलपतियों और ख्याति प्राप्त प्राध्यापकों की परिषद आयोजित करना चाहिए। जो प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी वर्ग है, जो कि विश्वविद्यालय में काम नहीं कर रहा होगा: कलाकार, कवि, लेखक, उपन्यासकार, नर्तक, अभिनेता, संगीतज्ञ उन्हें भी आमंत्रित किया जाए। उसमें प्रतिभा के सारे आयाम और वे सारे लोग सम्मिलित होंगे जिन्होंने कुछ योग्यता दिखाई हो, राजनीतिकों को सर्वथा छोड़ कर।
राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए प्रत्येक प्रांत से एक प्रतिनिधि मंडल चुना जाए जो इसका ब्योरा देगा कि गुणतंत्र कार्यान्वित कैसे किया जाए। राष्ट्रीय सदस्य विश्व भर के विश्व विद्यालयों और बुद्धिजीवियों का सम्मेलन बुलाएंगे। यह अपने किस्म का पहला सम्मेलन होगा क्योंकि आज तक विश्व का समूचा बुद्धिजीवी वर्ग मानवता का भविष्य तय करने के लिए कभी एकत्रित नहीं हुआ। वे लोग विश्व का पहला संविधान लिखें। वह न अमरीकी होगा, न भारतीय होगा, न चीनी होगा, न हिन्दू का होगा न मुसलमान और न ईसाइयों का, वह केवल संपूर्ण मनुष्य-जाति का संविधान होगा। भिन्न-भिन्न प्रकार के क़ानूनों की कोई जरूरत नहीं है। कोई भी जरूरत नहीं है। सभी आदमियों को एक ही तरह के कानून की जरूरत होती है।
राजनीतिकों के पास क्या ताकत है? उनके पास जो भी ताकत है वह हमारी दी हुई है। हम उसे वापस ले सकते हैं। वह उनकी ताकत नहीं है, वह हमारी ताकत है। हमें सिर्फ उसे वापस ले लेने का उपाय खोजना है। क्योंकि देना बहुत आसान है, लेना थोड़ा कठिन है। एक बार हम तय कर लें कि मतदान का अधिकार हर व्यक्ति का जन्मजात हक नहीं है। बल्कि ऐसा अधिकार है जिसे हमें अपनी बुद्धिमत्ता से अर्जित करना होगा। हर व्यक्ति को उसे अर्जित करने का अवसर दिया जाएगा। हर व्यक्ति को उसे अर्जित करने का समान अवसर मिलेगा लेकिन वह जनमत प्राप्त नहीं होगा, तुम्हें उसे सिद्ध करना होगा। ऐसा आदमी, जिसने अपना पूरा जीवन शिक्षा और उसकी समस्याओं का चिंतन करने में व्यतीत किया है, शिक्षा का मूलभूत तत्व, शिक्षा के सभी संभव दर्शन और उसकी सूक्ष्म बारीकियां खोजने के लिए यथासंभव कोशिश की है, अगर वह शिक्षा मंत्री होता है तो इसकी संभावना है कि वह कुछ करेगा।
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा चाहे दुनिया के लिए नई हो परंतु इसकी जड़ें हमारी संस्कृति में पहले से ही विद्यमान रही हैं। अतीत का अध्ययन करें तो पाएंगे कि चाहे हमारी राज्य व्यवस्था राजतांत्रिक हो परंतु उसका उद्देश्य गणतांत्रिक और जनकल्याण ही रहा है। राजा को ईश्वर का रूप बताया गया परंतु उसका धर्म प्रजापालन ही माना गया है। आदर्श गणतंत्र की जो व्याख्या जो देवर्षि नारद जी करते हैं वह किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक व गणतंत्र व्यवस्था के लिए आदर्श बन सकती है। धर्मराज युधिष्ठिर के सिंहासनरोहण के दौरान उन्होंने पांडव श्रेष्ठ से ऐसे प्रश्न पूछे जो आज आधुनिक युग में भी कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार बने हुए हैं।
महाभारत सभा पर्व के ‘लोकपाल सभाख्यान पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 5 के अनुसार राजा के उन सभी दायित्वों का वर्णन है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत राज्याध्यक्षों के वर्तमान युग में भी निर्धारित किये गये हैं। युधिष्ठिर से नारद जी बोले- राजन! क्या तुम्हारा धन तुम्हारे राजकार्यों व निजी कार्यों के लिए पूरा पड़ जाता है ? क्या तुम प्रजा के प्रति अपने पिता-पितामहों द्वारा व्यवहार में लायी हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्ति का व्यवहार करते हो ? क्या तुमने दूसरे राज्यों से होने वाले हमलों व राज्य के अंदर समाज कंटकों (अपराधियों) से निपटने के लिए पर्याप्त सैनिक तैनात कर रखे हैं ? दुश्मन राज्यों पर तुम्हारी नजर है या नहीं ? तुम असमय में ही निद्रा के वशीभूत तो नहीं होते ? तुम्हारे राज्य के किसान-मजदूर आदि श्रमजीवी मनुष्य तुमसे अज्ञात तो नहीं हैं ? क्योंकि महान अभ्युदय या उन्नति में उन सब का स्नेहपूर्ण सहयोग ही कारण है। क्या तुम्हारे सभी दुर्ग धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र, शिल्पी और धनुर्धर सैनिकों से भरे-पूरे रहते हैं ? भरत श्रेष्ठ! कठोर दण्ड के द्वारा तुम प्रजाजनों को अत्यन्त उद्वेग में तो नहीं डाल देते ? मन्त्री लोग तुम्हारे नियमों का न्यायपूर्वक पालन करते व करवाते हैं न ? तुम अपने आश्रित कुटुम्ब के लोगों, गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों, व्यापारियों, शिल्पियों तथा दीन-दुखियों को धनधान्य देकर उन पर सदा अनुग्रह करते रहते हो न ? तुमने ऐसे लोगों को तो अपने कामों पर नहीं लगा रखा है जो लोभी, चोर, शत्रु अथवा व्यावहारिक अनुभव से शून्य हों ? चोरों, लोभियों, राजकुमारों या राजकुल की स्त्रियों द्वारा अथवा स्वयं तुमसे ही तुम्हारे राष्ट्र को पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है ? क्या तुम्हारे राज्य के किसान संतुष्ट हैं ? जल से भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये हैं ? केवल वर्षा के पानी के भरोसे ही तो खेती नहीं होती है ? किसान का अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता ? तुम किसान पर अनुग्रह करके उसे एक रूपया सैकड़े ब्याज पर ऋण देते हो ? राजन! क्या तुम्हारे जनपद के प्रत्येक गाँव में शूरवीर, बुद्धिमान और कार्य कुशल पाँच-पाँच पंच मिल कर सुचारू रूप से जनहित के कार्य करते हुए सबका कल्याण करते हैं ? क्या नगरों की रक्षा के लिये गाँवों को भी नगर के ही समान बुहत-से शूरवीरों द्वारा सुरक्षित कर दिया गया है ? सीमावर्ती गाँवों को भी अन्य गाँवों की भाँति सभी सुविधाएँ दी गई हैं ? तुम स्त्रियों को सुरक्षा देकर संतुष्ट रखते हो न ? तुम दण्डनीय अपराधियों के प्रति यमराज और पूजनीय पुरुषों के प्रति धर्मराज सा बर्ताव करते हो ?

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‘लोकपाल सभाख्यान पर्व’ में नारद जी द्वारा पूछे गए प्रश्नों में से इन कुछ प्रश्नों को पढ़ कर ही पाठक स्वत: अनुमान लगा सकते हैं कि महर्षि ने युगों पहले ही कल्याणकारी गणतांत्रिक व्यवस्था को युधिष्ठिर के राज्य के रूप में मूर्त रूप प्रदान करने का प्रयास किया और युधिष्ठिर का राज्यकाल साक्षी भी है कि वह किसी भी रूप में रामराज्य से कम नहीं था। नारद जी के इन सिद्धांतों पर आएं तो हर राष्ट्र को सर्वप्रथम तो धन, अन्न व श्रम संपन्न होना चाहिए। इसके लिए राजा को सतत् प्रयास करने चाहिएं। किसानों को ऋण, सिंचाई के लिए जल, बीज, खाद, यंत्र की व्यवस्था करनी चाहिए। व्यापार की वृद्धि के लिए राज्य में चोरों, डाकुओं, ठगों का भय समाप्त करना चाहिए। प्रशासनिक अधिकारियों व राजा को अपने सगे-संबंधियों पर पैनी नजर रखनी चाहिए कि कहीं वह राजकीय शक्तियों का प्रयोग अपने स्वार्थ के लिए तो नहीं कर रहे। आवश्यकता पड़ने पर व्यापारियों का आर्थिक पोषण भी राज्य की जिम्मेवारी है। देश को बाहरी खतरों से सुरक्षित करने के लिए शक्तिशाली सेना का गठन करना चाहिए, दुर्गों को मजबूत करना चाहिए, सीमावर्ती ग्रामों को सर्वसुविधा संपन्न करना चाहिए ताकि यहां रह रहे लोग सुरक्षा पंक्ति के रूप में वहीं टिके रहें। देश के अंदर और बाहर गुप्तचरों का मजबूत जाल होना चाहिए। राज्य निराश्रित लोगों जैसे वृद्धों, बेसहारों, दिव्यांगों, परितक्याओं, विधवाओं के सम्मानपूर्वक जीवन की जिम्मेवारी राज्य को उठानी चाहिए। राजा को दुष्टों व अपराधियों के प्रति यमराज और सज्जनों के प्रति धर्मराज की जिम्मेवारी निभानी चाहिए।
अब जरा गम्भीरता पूर्वक मनन किया जाय, क्या नेपाली नागरिक ने 2046 साल के क्रांति में स्थापित प्रजातंत्र और 2062 में माओवादी क्रांति के पश्चात स्थापित गणतंत्र में उपरोक्त राजनीतिक नैतिकता और आदर्श का भनक भी मिल पाया है ? क्या आम नागरिक के हित और कल्याण के लिए एक भी ऐसा निर्णय और योजना कार्यान्वयन किया गया जिसमें देश के साथ साथ आम नागरिक के जीवन में दीर्घकालीन समृद्धि प्राप्त हो ? उत्तर में नहीं के अलावा और कुछ आ ही नहीं सकता। ऐसी हालत में आम आदमी द्वारा नए नए विचारों और संभावनाओं की ओर अपनी रुख को मोड़ना स्वाभाविक ही है। कोई भी जीवित प्राणी ऐसा ही करेगा। हम तो ठहरे विश्व के सर्वोत्तम प्राणी मनुष्य। बस इतना ख्याल रखना ही क्रांति के लिए कदम में उर्जा का संचार होना आरंभ कर देता है। आज नेपाली युवा इसी मोड़ पर तरंगायित है। जिसके कारण सत्ताधीशों की निंदे हराम हो गई है। छटपटाहट और घबराहट बढ़ती जा रही है। अहंकार के इमारत की ईंटें खिसकती जा रही है। सारे पाप एकत्रित होकर त्रासदी में डालने लगा है। त्राहिमाम की स्थिति निर्माण होती जा रही है। आम जनता या तो विरोध में सड़कों पर तांडव नृत्य करते हुए दिख रहे हैं कि मजे में अपनी घरों में मोबाइल में व्यस्त हैं। सरकार और सत्तासिनों के प्रति किसी में कोई रुझान ही नहीं है। राजनीतिक अपराधों और जन विरोधी निर्णयों के पहाड़ तले दबे इस सरकार के प्रति किसी में कोई रुचि नहीं दिखाई देती है। यह एक प्रकार से जनता के भावनाओं को कुचलते रहने के कारण अभिशप्त हो गई है। अभिशप्तों से कल्याण की आशा दुखदायी सावित होता है।

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