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मधेश प्रदेश की अवस्था और राजनीति : अंशुकुमारी झा



अंशुकुमारी झा, हिमालिनी, अंक जून 024। फिलहाल नेपाल सात प्रदेशों से सुसज्जित है । जिसमें से एक है मधेश प्रदेश । पहले यह २ नम्बर प्रदेश के नाम से जाना जाता था । फिर बहुत कोशिशों के बाद उक्त प्रदेश का नाम मधेश प्रदेश पड़ा । नामकरण के समय भी मधेशी लोग एक आपस में लड़ ही रहे थे क्योंकि मधेश प्रदेश के अन्तर्गत मैथिली, भोजपुरी, अवधी तथा अन्य विभिन्न भाषाभाषी के लोग निवास करते हैं । उस समय सबकी यह इच्छा थी कि उक्त प्रदेश का नाम हमारी संस्कृति, हमारी भाषा और हमारे स्थान के नाम से रखा जाय । बहुत वाद विवाद के बाद २ नम्बर प्रदेश को मधेश नाम से अभिहीत किया गया । पर दुख की बात यह है तथाकथित मधेशी नेता जो स्वायत मधेश की बात कर रहे थे, जिसे मेची से महाकाली तक का मधेश चाहिए था । उसे सिर्फ ८ जिलों का मधेश मिला । जिसमें न तो कोई कल कारखाना है और न ही रोजगार की व्यवस्था है । अगर आप त्रिभुवन अन्तराष्ट्रीय विमान स्थल का अवलोकन करेंगे तो पता चलेगा कि खाड़ी देश जाने वाले अधिकांश युवा मधेश प्रदेश से है । मधेश को हरेक मामले में इतना सीमित कर दिया गया है कि मधेशियों का विकास असम्भव है ।

यह सत्य है कि मधेश का प्रशासन तथा मधेशी नेतागण खुद को बहुत काबिल समझते हैं पर मधेश का विकास कैसे हो, इस सम्बन्ध में नहीं के बराबर सोचते हैं । जानकारी के लिए मैं यहाँ एक तथ्यांक उल्लेख करना चाहती हूं, कुछ दिन पहले यह डाटा सोशल मीडिया पर भी भायरल हो रहा था । इससे स्पष्ट हो जाएगा कि मधेश प्रदेश का प्रशासन कितना अव्यवस्थित है । अन्य प्रदेशों के तरह मधेश प्रदेश की भी क्रमगत आयोजना थी पर उनलोगों ने सिस्टम लग इन ही नहीं किया । नया और क्रमगत दोनों तरह की योजनाओं के लिए बजट मांग का प्रस्ताव नहीं किया गया । अन्तिम दिन तक योजना आयोग प्रस्ताव करने के लिए कहता रहा पर मधेश प्रदेश ने कोई प्रस्ताव नहीं भेजा । इस विषय में मधेश प्रदेश सरकार प्रदेश नीति तथा योजना आयोग के सम्बन्धित उपाध्यक्ष नाथुप्रसाद चौधरी का कहना है कि संघीय समपूरक और विशेष अनुदान लेने के लिए आयोजनाओं की सूची प्राथमिकीकरण कर भेजने के बाद भी मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रीपरिषद के कार्यालय ने प्रक्रिया आगे नहीं भेजा । इसी प्रकार मधेश प्रदेश नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष भोगेन्द्र झा का कहना है कि पौष मसान्त तक नया एवं क्रमगत विशेष अनुदान का प्रविष्टि करना अनिवार्य होता है । अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम अनुदान से वंचित हो जाते हैं । अज्ञानता और संवेदनहीनता के कारण मधेश प्रदेश अरबों के अनुदान से वन्चित हो गया ।
आर्थिक वर्ष २०८१, ८२के लिए संघीय सरकार द्वारा विनियोजित बजट, लाख में

 कोशी प्रदेश, विशेष अनुदान ७८०१ , समपूरक अनुदान ६५५०
 मधेश प्रदेश, विशेष अनुदान ०, समपूरक अनुदान ०
 बागमती प्रदेश, विशेष अनुदान ९९१३, समपूरक अनुदान ८५५०
 गण्डकी प्रदेश, विशेष अनुदान ६५५५ समपूरक अनुदान ११९००
 लुम्बिनी प्रदेश, विशेष अनुदान ७४४६, समपूरक अनुदान ७९५०
 कर्णाली प्रदेश, विशेष अनुदान ६७२५, समपूरक अनुदान १२८५०
 सुदुरपश्चिम प्रदेश, विशेष अनुदान ५५६०, समपूरक अनुदान १४२००
 कुल विशेष अनुदान ४४०००, समपूरक अनुदान ६२००० ।

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स्रोत ः राष्ट्रीय योजना आयोग

इस तथ्यांक से स्पष्ट हो जाता है कि मधेश का नेता तथा प्रशासन कितना सक्रिय है । मधेशी जनता के लिए यह बहुत ही दुख की बात है कि वे इस तरह के नेतृत्व के अन्तर्गत हैं । यह तो बस अनुदान का विषय है, ऐसे ही बहुत सारे विषय हैं जो जनता के समक्ष नहीं आ पाया है ।

संघ में नया सत्ता समीकरण के बाद मधेश प्रदेश में भी नई सरकार गठन हो गयी है । संघीय व्यवस्था के बाद अभी तक जसपा नेपाल ही मधेश प्रदेश का बागडोर सम्भाला था । पहले कार्यकाल का पाँच वर्ष और दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष सात महीना जसपा नेपाल ने नेतृत्व किया । जसपा नेपाल से मुख्यमन्त्री बने सरोज कुमार यादव को प्रदेश सभा में बहुमत नहीं मिलने के कारण वे स्वतः पदमुक्त हो गये । प्रदेश सभा में विश्वास मत के दौरान उपस्थित १०३ सदस्य मध्ये ५० सदस्य यादव के प्रस्ताव के पक्ष में थे और ५३ सदस्य विपक्ष में बैठे । निवर्तमान मुख्यमन्त्री को बहुमत नहीं मिलने के कारण जसपा नेपाल की सरकार गिर गई । यादव के पक्ष में जसपा नेपाल के १९ सांसद, नेपाली कांग्रेस का २२, लोसपा का ८ और राप्रपा का १ , कुल ५० सदस्यों ने मत दिया था । इसी प्रकार प्रस्ताव के विपक्ष में एमाले २४, जनमत पार्टी के १३, माओवादी केन्द्र के ९और नेकपा एकीकृत समाजवादी के ७ सदस्यों ने मतदान किया । इससे पहले नि.मुख्यमन्त्री यादव ने चार बार विश्वास का मत लिया था । अभी मधेश प्रदेश में चार दल के सहमति अनुसार नया सरकार गठन हुई है । जनमत पार्टी के नेतृत्व में अन्य तीन दलों ने मिलकर सरकार बनाई है ।

प्रदेश सरकार गठन होने के बाद विक्रम संवत् २०७४ फागुन ३ गते जसपा नेपाल के तत्कालीन संघीय समाजवादी लालबाबु राउत मधेश प्रदेश क पहले मुख्यमन्त्री बने थे । उन्होंने पाँच वर्ष का कार्यकाल मधेश का नेतृत्व किया । उस वक्त भी सत्ता सहयात्री दल का अदला बदला हुआ था । २०७४ साल के चुनाव के बाद मधेश सरकार में जसपा नेपाल ही था । जसपा नेपाल को दल विभाजन के कारण संघ और प्रदेश दोनों जगह से झटका मिला । पार्टी विभाजन के बाद प्रदेश में १९ सांसद होने के बावजुद भी जसपा नेपाल सरकार नहीं बचा पाई । फलतः जसपा नेपाल सत्ता से प्रतिपक्ष में पहुँच गया ।
हम यहाँ कहना चाहेंगे कि आप चाहे जितना भी बाहुबली क्यों न हो पर जनता का मन जीतने के लिए जनता से सम्बन्धित कार्य कर दिखाना होगा । यह ज्ञात होना चाहिए कि अभी जनता जागरूक हो गई है । उसे अपने अधिकार के बारे में थोड़ा बहुत ज्ञान भी हो गया है इसलिए चाहे जो भी हो जनता के हक हित के लिए आप अगर समर्पित नहीं रहेंगे तो आप नहीं टिक पायेंगे । मधेश प्रदेश की अवस्था अन्य प्रदेशों की तुलना में चिन्तनीय है इसलिए सरकार चाहे जिसकी भी बने मधेशी जनता के हकहित में कार्य होना चाहिए । मधेश प्रदेश का विकास होना चाहिए ।

अंशुकुमारी झा

 



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