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आज शाम जब बरसा सावन, भ्रान्ति लिए बैठा हूँ सावन था या प्यार तुम्हारा

सावन की कुछ कविताएँ

 

1

रात सावन की / अज्ञेय

रात सावन की
कोयल भी बोली
पपीहा भी बोला
मैं ने नहीं सुनी
तुम्हारी कोयल की पुकार
तुम ने पहचानी क्या
मेरे पपीहे की गुहार?
रात सावन की
मन भावन की
पिय आवन की
कुहू-कुहू
मैं कहाँ-तुम कहाँ-पी कहाँ!

2

सावन बहका है / रजनी मोरवाल

लो, सावन बहका है

बूँदों पर है खुमार, मनुवा भी बहका है।

बागों में मेले हैं

फूलों के ठेले हैं,

झूलों के मौसम में

साथी अलबेले हैं।

कलियों पर है उभार, भँवरा भी चहका है।

ऋतुएँ जो झाँक रहीं

मौसम को आँक रहीं,

धरती की चूनर पर

गोटे को टाँक रहीं।

उपवन पर हो सवार, अम्बुआ भी लहका है।

कोयलिया टेर रही

बदली को हेर रही,

विरहन की आँखों को

आशाएँ घेर रही।

यौवन पर है निखार, तन-मन भी दहका है।

3

आज शाम जब बरसा सावन / ज्ञानेन्द्र मोहन ‘ज्ञान’

आज शाम जब बरसा सावन,

भीगा अपना तन-मन सारा।

भ्रान्ति लिए बैठा हूँ अब तक,

सावन था या प्यार तुम्हारा।

कान्हा ने राधा से पूछा,

तुम मुझको सच-सच बतलाना।

भली लगी कब तुम्हें बांसुरी,

और अधर तक उसका आना।

 

भीगे हम भी भीगे तुम भी,

शायद था सौभाग्य हमारा।

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कह देने से कम हो जाता,

दुविधा में क्यों जीते-मरते।

तुम्हीं कहो उन सुखद पलों का,

मूल्यांकन हम कैसे करते।

 

मनः पटल पर स्पर्शों का,

बार-बार ही चित्र उतारा।

 

क्या जाने फिर कब बरसेगा,

दूर हुए तो मन तरसेगा।

दिल की बात कहेंगे किससे,

दिल का क्या यह तो धड़केगा।

 

जितना जो कुछ मिला भाग्य से,

हमने तुमने है स्वीकारा।

सावन का झूला / नवीन सागर

सावन का झूला इस बार

इतना बड़ा डालना

जिसमें समा जाए संसार।

उस डाली पर

जो फैली है आसमान के पार

उस रस्सी का

कोई न जिसका पारावार!

एक पेंग में मंगल ग्रह के द्वार

और दूसरी में

इकदम से अंतरिक्ष के पार!

जेठ नहीं, यह जलन हृदय की,

रामधारी सिंह “दिनकर”

 

जेठ नहीं, यह जलन हृदय की,

उठकर जरा देख तो ले;

जगती में सावन आया है,

मायाविन! सपने धो ले।

 

जलना तो था बदा भाग्य में

कविते ! बारह मास तुझे;

आज विश्व की हरियाली पी

कुछ तो प्रिये, हरी हो ले।

 

नन्दन आन बसा मरु में,

घन के आँसू वरदान हुए;

अब तो रोना पाप नहीं,

पावस में सखि! जी भर रो ले।

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अपनी बात कहूँ क्या! मेरी

भाग्य-लीक प्रतिकूल हुई;

हरियाली को देख आज फिर

हरे हुए दिल के फोले।

 

सुन्दरि ! ज्ञात किसे, अन्तर का

उच्छल-सिन्धु विशाल बँधा?

कौन जानता तड़प रहे किस

भाँति प्राण मेरे भोले!

 

सौदा कितना कठिन सुहागिनि!

जो तुझ से गँठ-बन्ध करे;

अंचल पकड़ रहे वह तेरा,

संग-संग वन-वन डोले।

 

हाँ, सच है, छाया सुरूर तो

मोह और ममता कैसी?

मरना हो तो पिये प्रेम-रस,

जिये अगर बाउर हो ले।

मेघ बरसते हैं सावन के

सुमित्रानंदन पंत

झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के
छम छम छम गिरतीं बूँदें तरुओं से छन के।
चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के,
थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।

ऐसे पागल बादल बरसे नहीं धरा पर,
जल फुहार बौछारें धारें गिरतीं झर झर।
आँधी हर हर करती, दल मर्मर तरु चर् चर्
दिन रजनी औ पाख बिना तारे शशि दिनकर।

पंखों से रे, फैले फैले ताड़ों के दल,
लंबी लंबी अंगुलियाँ हैं चौड़े करतल।
तड़ तड़ पड़ती धार वारि की उन पर चंचल
टप टप झरतीं कर मुख से जल बूँदें झलमल।

नाच रहे पागल हो ताली दे दे चल दल,
झूम झूम सिर नीम हिलातीं सुख से विह्वल।
हरसिंगार झरते, बेला कलि बढ़ती पल पल
हँसमुख हरियाली में खग कुल गाते मंगल?

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दादुर टर टर करते, झिल्ली बजती झन झन
म्याँउ म्याँउ रे मोर, पीउ पिउ चातक के गण !
उड़ते सोन बलाक आर्द्र सुख से कर क्रंदन,
घुमड़ घुमड़ घिर मेघ गगन में करते गर्जन।

वर्षा के प्रिय स्वर उर में बुनते सम्मोहन
प्रणयातुर शत कीट विहग करते सुख गायन।
मेघों का कोमल तम श्यामल तरुओं से छन।
मन में भू की अलस लालसा भरता गोपन।

रिमझिम रिमझिम क्या कुछ कहते बूँदों के स्वर,
रोम सिहर उठते छूते वे भीतर अंतर!
धाराओं पर धाराएँ झरतीं धरती पर,
रज के कण कण में तृण तृण की पुलकावलि भर।

पकड़ वारि की धार झूलता है मेरा मन,
आओ रे सब मुझे घेर कर गाओ सावन !
इन्द्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन,
फिर फिर आए जीवन में सावन मन भावन !

 

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