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क्या बांग्लादेश भी म्यांमार और पाकिस्तान की राह पर चल पड़ा है?क्यों छोड़ना पड़ा शेख हसीना को देश ? : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति । कई दिनों से बांग्लादेश में चल रहा आंदोलन अब उग्र हो चला है और हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा है। क्या  बांग्लादेश भी म्यांमार और पाकिस्तान की राह पर चल पड़ा है? या फिर चीन की चालबाजियों के आगे लोकतंत्र ने घुटने टेक दिए हैं।

बेकाबू आंदोलनकारियों के आगे कानून-व्यवस्था ने लगभग दम तोड़ दिया है। राजधानी ढाका हुड़दंगियों के हवाले हो चुकी है और प्रधानमंत्री निवास में अराजकता के निशान चारों ओर दिखाई दे रहे हैं। गृहमंत्री का घर आग के हवाले हो चुका है और सत्ताधारी पार्टी के दफ्तर को जला दिया गया है।
इतना ही नहीं, प्रदर्शनकारियों ने बांग्‍लादेश के निर्माता और शेख हसीना के पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की मूर्ति को भी तोड़ दिया है। प्रधानमंत्री शेख हसीना को कई दिनों पहले ही यह समझ आ गया था कि देश की कमान उनके हाथों से निकल चुकी है। सोमवार को वो अपना विदाई भाषण दे ही रहीं थीं कि अचानक आंदोलनकारी वहां पहुंच गए और हसीना को जान बचाकर भागना पड़ा।

बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। ये प्रदर्शन देखते देखते हिंसक हो गया। विवाद उस 30 प्रतिशत आरक्षण को लेकर है, जो स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को दिए जा रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि मेरिट के आधार पर सरकारी नौकरियां नहीं दी जा रही है। सरकार अपने समर्थकों को आरक्षण देने के पक्ष में है।

बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर शुरु हुए छात्र आंदोलन में विपक्षी दल भी फ्रंटफुट पर आ गए। विपक्ष ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ व्यापक विरोध किया। विपक्षी पार्टी बांग्‍लादेश नैशनल‍िस्‍ट पार्टी ने खालिदा जिया के नेतृत्‍व में लाखों की भीड़ जुटाकर शेख हसीना की कुर्सी को हिला दिया। विपक्ष ने हसीना से इस्तीफे की मांग की। सरकार भी विपक्ष के विरोध का सामना करने में विफल रही।

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बांग्लादेश में हिंसा भड़काने में पाकिस्तान का भी हाथ है। बांग्लादेश की सिविल सोसायटी ने पाकिस्तान उच्चायोग पर कट्टरपंथी छात्र प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने का आरोप लगाया है। पाकिस्तान अंदरखाने छात्रों को समर्थन के जरिए बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है। कुछ रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान ‘मिशन पाकिस्तान’ समर्थक जमात से जुड़े छात्र प्रदर्शनकारियों के एक वर्ग के संपर्क में है, जो बांग्लादेश में प्रतिबंधित है।

बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति वैसे ही खराब थी, वहीं इस आंदोलन से इसे और झटका लगा है। वहां तेजी से बेरोजगारी बढ़ रही है। शेख हसीना लंबे समय से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। हाल ही में जब वो फिर से बांग्लादेश की पीएम बनीं, तो बेरोजगारों छात्रों में गुस्सा बढ़ गया। छात्र सड़क पर उतर आए और आंदोलन करने लगे।

शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद जॉय ने कहा है उनकी मां अब राजनीति में नहीं लौटेंगी. उन्होंने कहा कि उनकी मां शेख हसीना अपने नेतृत्व के खिलाफ हुए हालिया विद्रोहों से “बहुत निराश” है. उनका कहना है कि बांग्लादेश में सुधार की उनकी अहम कोशिशों के बावजूद उन्हें इस तरह की समस्या झेलनी पड़ी है, जॉय के मुताबिक, विरोध-प्रदर्शनों की वजह से वह पहले से ही इस्तीफा देने पर विचार कर रही थीं.

दरअसल, बीते कुछ दिनों से पूरे बांग्लादेश में कोटा सिस्टम के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हो रहा था. शेख हसीना के कर्फ्यू लगाए जाने और आमर्मी को सड़क पर उतारने के बाद विरोध शांत हो गया था । इसके कुछ दिन बाद ही फिर से प्रदर्शन उग्र हो गया और देशभर में हिंसाएं देखी गई और प्रदर्शनकारी शेख हसीना का इस्तीफा मांगने लगे. इसके बाद हसीना को अपना पद और देश छोड़ना पड़ा.

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कैसे आईं शेख हसीना राजनीति में 

शेख हसीना का जन्म भारत को आजादी मिलने वाले साल यानी 28 सितंबर 1947 में ढाका में हुआ था। वह बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बड़ी बेटी हैं। पूर्वी बंगाल के तुंगीपाड़ी में ही उन्होंने स्कूल से पढ़ाई-लिखाई की थी। इसके बाद उनका पूरा का पूरा परिवार ढाका में ही शिफ्ट हो गया था। शेख हसीना की शुरुआत से पॉलिटिक्स की कोई भी दिलचस्पी नहीं थी। साल 1966 में वह ईडन महिला कॉलेज में पढ़ रही थी। यही वह समय था जब उनकी राजनीति में दिलचस्पी जगना शुरू हुई थी। वह यहां पर ही स्टूडेंट यूनियन का चुनाव लड़कर वाइस प्रेसिडेंट बनी थी। इतना ही नहीं इसके बाद में उन्होंने अपनी पिता की पार्टी आवामी लीग के स्टूडेंट विंग की कमान संभालने का फैसला किया।
1975 में शेख हसीना के परिवार पर आई आफत

आवामी लीग का काम संभालने के बाद साल 1975 उनके और उनके परिवार के लिए बिल्कुल भूचाल की तरह था। सेना ने बगावत कर दी और उनके परिवार के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया था। इस लड़ाई में शेख हसीना के बाप मुजीबउर रहमान और मां के अलावा तीन भाइयों की भी हत्या कर दी। उस समय शेख हसीना और उनके पति वाजिद मियां और छोटी बहन की जान बच गई थी। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि जब यह सब हुआ तो वह यूरोप में थी। इसके बाद भारत की पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत में शरण  दी थी।

साल 1981 में बांग्लादेश वापस लौटीं

पूर्व पीएम शेख हसीना साल 1981 में अपने वतन बांग्लादेश वापस लौटीं। यहां पर लौटने के बाद उन्होंने अपने पिता की पार्टी को आगे विस्तार देने का फैसला किया। वह पहली बार साल 1986 में आम चुनाव में उतरीं। हालांकि, इस इलेक्शन में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। इस समय वह विपक्ष की नेता चुन ली गईं थी। साल 1991 में स्वतंत्र तौर पर इलेक्शन हुए। इसमें भी शेख हसीना  के पिता की पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। विपक्ष दल की खालिदा जिया ने सरकार का गठन किया।

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साल 1996 में फिर चुनाव हुए। इस बार शेख हसीना की पार्टी भारी भरकम बहुमत से सत्ता में  और शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं। 2001 के इलेक्शन में उन्हें फिर से हार का सामना करना पड़ा। साल 2009 में उन्होंने पीएम के अपने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ग्रहण की। इतना ही नहीं उन्हें साल 2014 में तीसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री चुना गया। उन्होंने साल 2018 में फिर से जीत हासिल की और चोथे कार्यकाल के लिए पीएम बनीं। बांग्लादेश की पीएम ने पांचवी बार इसी साल शपथ ग्रहण की थी। हसीना की पार्टी ने संसद में लगभग तीन चौथाई सीटें जीत ली थी। वहीं विपक्षी दलों को बाकी सीटें मिली थी।

पिछले चुनाव के समय शेख हसीना ने कहा था कि “कोई भी मुझे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर नहीं निकाल सकता।” हसीना ने दावा किया था कि उन्हें मारने की 19 कोशिशों में वह बच गईं इसलिए  , “मुझे मारना ही मुझे खत्म करने का एकमात्र विकल्प है और मैं अपने लोगों के लिए मरने को तैयार हूं।” किन्तु यह हो नहीं पाया उन्हें इस तरह देश से निकलना पडा कि वो अपने पिता के मुर्ति को भी नहीं बचा सकीं ।

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