भूकम्प के दस साल : महाविनाश का वो दिन जब जिन्दगी थम गई थी
12 गते, 2072 आम दिनों की ही भाँति था वह दिन भी । शनिवार का दिन और दिनों की अपेक्षा निश्चिन्तता का दिन होता है । ना कोई अफरातफरी और ना ही जल्दबाजी । सब कुछ अपनी गति से हो रहा था । कुछ खा चुके थे और कुछ खाने वाले थे । छुट्टी का दिन है तो कुछ घूमने का मन बना चुके थे और कुछ तो घूमने निकल भी चुके थे । कहाँ पता था तब कि प्रकृति कुछ ऐसा करने वाली है जो जीवन की दिशा ही बदल देगी । १२ बजे भी नहीं थे कि सबकुछ बदल दिया ईश्वर ने ।
हाहाकार, अफरातफरी, रोना चिल्लाना और फिर सूनी आँखों से अपनों को खोजने की तलाश…..जिन्दगियाँ खत्म हो गईं, आशियाने बिखर गए और दब गए उन मलबों के नीचे कई साँसें, कई सपने । और आज सिर्फ स्तब्धता है, अपनों के बिछड़ने का गम है और जिन्दगी किस सिरे से शुरु की जाय इस बात की जदेजहद है । ये जो कुछ हुआ इसपर मानव जाति का वश नहीं चलता क्योंकि प्रकृति को हम अपने हिसाब से तब तक ही बाँध सकते हैं जब तक वह अपने पर नहीं आती । वैज्ञानिकता के युग में हम भूल जाते हैं कि प्रकृति की अपनी गति है, वह न तो किसी के बाँधे बँधी है और न ही किसी के रोके रुकी है ।
नेपाल में आये विध्वंशकारी भूकम्प ने देश की सांस्कृतिक, भौतिक और आर्थिक बुनियाद को अन्दर से हिलाकर रख दिया । उसके बाद लगातार आए छोटे बड़े कई झट्कों ने कहर बरपाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ा । इस विपदा ने हजारों नेपालियों को दर्दनाक मौत की नींद सुला दिया, हजारों को बेघर, लावारिस और अंग–भंग कर दिया । सारा नेपाल शोकमग्न हो गया है । हिमाल, पहाड़ और तराई समूचा देश मर्माहत हो गया । दुनिया के हर कोने से इस पीड़ा पर मानवीय संवेदना जग उठी । सहयोग के लिए कई हाथ आगे आ रहे हैं ।
काठमांडू की सांस्कृतिक धरोहर भीमसेन स्तम्भ जैसे कई पुरातात्विक भवन, ऐतिहासिक मन्दिर और पवित्र स्थल देखते–ही–देखते मलवे में तब्दील हो गये थे । हिन्दु और बौद्ध मंदिरों के शहर के रूप में दुनिया में परिचित पर्यटकीय शहर काठमांडू को कुदरत ने कुरुप बना दिया था । पौराणिक काल से निरन्तर चली आ रही सांस्कृतिक विरासत की कई अहम् गवाह अब जमीनदोज हो गयीं । अकेले काठमांडू की बात नहीं थी, गोरखा जिले से पुरब के सभी पहाड़ी जिलों में भी भारी तबाही हुई थी । भारी मात्रा में लोग हताहत हूए थे । उसी अनुपात में आशियाने गिर गये हैं । दस साल लम्बा अर्थतंत्र को तहसनहस करता सशस्त्र द्वन्द और उसके बाद उतने ही समय तक चलती संक्रमणकालीन लम्बे राजनीतिक झगड़ और अस्थिरता से उब रहा नेपाली जनमानस इस हादसे की पीड़ा से उबरने की कश्मकश में अभी भी है । प्रतिकूलताओं को झेल रहे नेपाल के लिए यह सचमुच एक और गहरा झट्का था । वर्तमान राजनीतिक उथलपुथल ने देश में आज भी आम जनता को त्रसित ही किया हुआ है । नेता आज भी अपनी फितरत से बाज नहीं आ रहे । अर्थतंत्र का गिरता आकंडा कायम है ।
दस वर्ष गुजरे और वर्ष भी गुजर जाएँगे, जो दर्द नेपाल के हिस्से आया वह मिटेगा तो नहीं पर वक्त की धूल जरुर जमी है । जिन्दगियाँ मिटीं, ऐतिहासिकता और नेपाल की धरोहर मिटी किन्तु अगर कुछ नहीं मिटी है तो वह है हमारे नेताओं की नीयत और जनता की नियति ।


