मधेश हक के लिए माओवादी का साथ छोड़ना होगा

सरिता गिरि, मैं पश्चिमी साहित्य का बहुत अध्ययन करती हूँ । और उससे बहुत अधिक प्रभावित हूँ । हमारी जीवन शैली क्या और कैसी हो यह बहुत हद तक हमें हमारे धर्मग्रंथ से प्राप्त होता है । सवाल है विकास का तो आखिर विकास क्या है और यह कैसे सम्भव है ? हम जो नैसर्गिक गुण लेकर पैदा होते हैं विकास उसमें ही होता है । यहाँ आज जितनी भी बातें उठ रही हैं इन सब पर संविधान में चर्चा होती रही है । परन्तु एक कामन ग्राउन्ड की कमी है । संविधान आज अपने मूल विषय से ही भटक रहा है । जनआन्दोलन की जो भावना थी, संघीयता की जो मांग थी आज उसे ही विवादित बना दिया गया है । नागरिकता का अधिकार राज्य पुनर्संरचना की बात स्वशासन की बात ये सब संविधान में निहित होना पड़ा । नेपाली समाज शक्ति के द्वारा संचालित होता है । उसी का वर्चस्व है । मैं मानती हूँ कि हम जब तक देश के हर क्षेत्र में शक्ति के साथ नहीं होंगे तब तक हम विकसित नहीं होंगे । पहाड़ और मधेश के अन्र्तद्वन्द्ध को दूर करने की आवश्यकता है उसे सम्बोधन करने की आवश्यकता है । मधेश का जो हिस्सा तत्कालीन नेपाल को दिया गया और जिसके कारण युद्ध की समाप्ति हुई आज उन्हीं बातों को फिर से उठाया जा रहा है और एक पक्ष ऐसा है जो स्वतंत्रता की बात कर रहा है । पर यह समाधान नहीं है । जनजातीय आन्दोलन की बात जो है वह मुझे लगता है कि वह सांस्कृतिक है अब तक राजनीतिक रूप नहीं ले पाया है । लिम्बुवान और मधेश आन्दोलन नेपाल का सबसे पुराना आन्दोलन है । और आजतक यह किसी निष्कर्ष पर नहीं
पहुँच पाया है । अभी मैंने बाबुराम जी का वक्तव्य पढ़ा कि मधेश में दो और पहाड़ में आठ प्रदेश होना चाहिए । अगर ऐसा हुआ तो मैं मानती हूँ कि संघीयता का एजेन्डा फेल है । मधेश को अगर कोई स्पष्ट नीति बनानी है तो मधेशवादी दल को माओवादियों का साथ छोड़ना होगा । तभी मधेश को सही राह मिलेगी । आन्दोलन तो होना ही चाहिए और इसकी आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी । मेरे विचार में अगर मधेश नेतृत्व लेता है तो देश की एकता को ध्यान में रखकर ही नीति निर्धारण करना होगा ।

