भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति : डॉ. शैलेश शुक्ला
डॉ शैलेश शुक्ला, हिमालिनी अंक जुलाई ०२५। जब कोई आम नागरिक सरकारी कार्यालय के चक्कर काटते–काटते थक जाता है, तब उसे एक मार्गदर्शक तारे की तरह भ्रष्टाचार की रोशनी दिखाई देती है । बिना चाय–पानी के भुगतान के फाइलें धूल फांकती रहती हैं, पर जैसे ही जेब गर्म होती है, फाइलें पंख लगाकर उड़ती हैं और मंजÞिल तक पहुँच जाती हैं । सोचिए, अगर भ्रष्टाचार न होता, तो एक वृद्ध व्यक्ति पेंशन के लिए चार साल सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता और अंत में दम तोड़ देता, पर भ्रष्टाचार की कृपा से अब वह केवल चार हजार रूपये खर्च कर उसी सप्ताह पेंशन प्राप्त कर लेता है । यह समय की बचत है, जीवन की बचत है और कहने की आवश्यकता नहीं कि यह व्यवस्था की गतिशीलता का प्रतीक है । स्कूल में दाखिले से लेकर अस्पताल में इलाज तक, हर जगह भ्रष्टाचार की अनौपचारिक सेवा जनता को अत्यंत लाभ पहुंचा रही है । जो गरीब नागरिक पहले हफ्तों सरकारी राशन के लिए लाइन में लगता था, वह अब “थोड़ा दे–दिलाकर” अगले ही दिन अनाज का थैला लेकर मुस्कुराते हुए घर लौटता है । और ऊपर से ये सेवा बिना किसी जीएसटी या टैक्स के है– कितनी उदार व्यवस्था है ये । अतः यह स्पष्ट है कि जनता के जीवन को सरल, सुगम और संगीतमय बनाने में भ्रष्टाचार से बढ़कर कोई उपाय नहीं– भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति ।
पैसे देने वालों को लाभ ः अगर कोई सोचता है कि रिश्वत देना महज पैसे की बर्बादी है, तो वह आज के यथार्थ से अंजान है । पैसे देने वाला हर बार अपना काम “नो सवाल, नो अटकाव” के सिद्धांत पर करवा लेता है । सरकारी बाबू को पैसा देकर यदि पासपोर्ट जल्दी बन जाए, बिजली कनेक्शन बिना सत्यापन के लग जाए, या पुलिस रिपोर्ट आपके मन–मुताबिक तैयार हो जाए– तो इसमें घाटा कहाँ है ? दरअसल, पैसा देने वाला अपना ‘सामाजिक निवेश’ कर रहा होता है औरयह निवेश इतना लाभकारी है कि शेयर बाजÞार भी शर्मा जाए । एक छात्र जिसने परीक्षा में पास नहीं किया, वह थोड़े प्रयास और मोटे नोटों के दम पर न सिर्फ पास हो जाता है, बल्कि अच्छे अंकों से होता है– यह प्रगति नहीं तो और क्या है ? भ्रष्टाचार ने पैसे देने वालों को वह अधिकार दिया है जो पहले केवल योग्यता वालों के पास होता था– अब योग्यता की जगह मौद्रिक विनम्रता ने ले ली है । ये नया लोकतांत्रिक सिद्धांत है जिसमें हर किसी को बराबर मौका मिलता है, बशर्ते वह जेब गर्म रखे । इस प्रकार, पैसे देकर काम करवाने की व्यवस्था में फायदा ही फायदा है– भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति ।
पैसा लेने वालों को लाभ ः भ्रष्टाचार की असली लॉटरी तो उस महान आत्मा के हाथ लगती है जो पैसे लेता है । सरकारी बाबू से लेकर ऊंचे पद के अधिकारी तक, यदि कोई सचमुच अपने परिवार का भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहता है तो उसकी पहली पाठशाला भ्रष्टाचार ही होनी चाहिए । सैलरी तो सिर्फ जीने के लिए होती है, लेकिन रिश्वत जीवन को “लाइफस्टाइल“ में बदल देती है । बच्चों की इंग्लिश मीडियम स्कूल, विदेश यात्रा, पाँच मंजÞिला बंगला और बीएमडब्ल्यू– ये सब ‘सर्विस रूल्स’ से नहीं, ‘सेवा भाव’ से आते हैं, जहाँ सेवा का मूल्य नकद में चुकाया जाता है । और सोचिए, इससे सरकार का भी फायदा है– अफसर खुश तो व्यवस्था खुश औरव्यवस्था खुश तो देश खुश । ऊपर से यह सब ‘नॉन–ऑफिशियल’ होता है, जिससे टैक्स की कोई झंझट नहीं । इससे अफसर अपने कर्मचारियों को ‘अनौपचारिक बोनस’ भी देते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था में प्रोत्साहन और भाईचारे की भावना पनपती है । हर महीने सैलरी के अलावा यदि पाँच जगहों से ‘सहयोग राशि’ मिल जाए तो नौकरी में नई ऊर्जा और प्रेरणा आती है– भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति ।
ठेकेदारों को लाभ ः जब कोई ठेकेदार सरकारी दफ्तर में प्रवेश करता है, उसके पास दो फाइलें होती हैं– एक में उसका प्रस्ताव और दूसरी में प्रस्ताव की ‘प्रेरणा’ । यह प्रेरणा ही है जो फाइल को सरकाती है, मंजÞूरी लाती है और कार्यादेश का वरदान प्रदान करती है । और सच पूछिए तो यही प्रेरणा पूरे निर्माण उद्योग को जीवन देती है । यदि सड़क, पुल, भवन, जल योजना, विद्युत ग्रिड जैसी विशाल परियोजनाओं के पीछे अगर कोई अदृश्य शक्ति है, तो वह भ्रष्टाचार ही है ।
ठेकेदार को लाभ मिलता है क्योंकि वह जानता है कि यदि वह इंजीनियर, निरीक्षक औरआपूर्ति अधिकारी को उनकी “सहभागिता राशि” देगा, तो कार्य बिना अवरोध संपन्न होगा । इसका सीधा लाभ यह होता है कि समय पर भुगतान भी हो जाता है और गुणवत्ता के नाम पर सस्ता माल चल जाता है । और इसी पैसे से वह अगला टेंडर भी सुनिश्चित करता है । यही कारण है कि देश की सड़कें पहली बारिश में बह जाती हैं– यह किसी त्रुटि का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुगठित वित्तीय व्यवस्था का प्रमाण है, जो हर बार निर्माण, मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए पैसे जारी करवा देती है । और इसमें हर कोई संतुष्ट– ठेकेदार को पैसा, अधिकारी को हिस्सा औरजनता को सड़क । तो जब ठेकेदार कम लागत में जÞ्यादा लाभ कमाए, बिना झंझट ठेका ले, बिना गुणवत्ता की चिंता किए भुगतान पा जाए, तो इसे भ्रष्टाचार नहीं– ‘स्मार्ट ठेका प्रबंधन’ कहना उचित होगा । और जब सभी संबंधित पक्ष प्रसन्नचित्त हों, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति ।


