नेपाल पर गिद्धदृष्टि – अजय कुमार झा
अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक नवंबर । नेपाल, हिमालय की गोद में बसा एक छोटा किन्तु सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण देश है । भारत और चीन जैसे एशियाई दिग्गजों के बीच स्थित यह राष्ट्र सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है । यहाँ की भौगोलिक स्थिति, जलस्रोत, प्राकृतिक सम्पदा, रासायनिक औषधीय वनस्पतियाँ तथा धार्मिक सहिष्णुता ने विश्व की कई शक्तियों की दृष्टि को अपनी ओर खींचा है । यही कारण है कि आज नेपाल केवल पड़ोसी राष्ट्रों का नहीं, बल्कि पश्चिमी शक्तियों का भी गिद्धदृष्टि युक्त कूटनीतिक अखाड़ा बन चुका है ।
नेपाल की राजनीति में देश ने कभी लोकतंत्र का उदय देखा, तो कभी पंचायत व्यवस्था की स्थिरता, कभी राजतंत्र की पुनस्र्थापना, और कभी गणतंत्र की स्थापना के साथ राजतंत्र का औपचारिक अंत । हालाँकि, नेपाल की राजनीति की एक सच्चाई यह भी है कि कोई भी व्यवस्था पूरी तरह से स्थिर नहीं रही है । इतिहास के संदर्भ में देखें तो, हालाँकि गणतंत्र की स्थापना के साथ ही राजतंत्र का अंत माना जाता है, फिर भी कई बार राजतंत्र की वापसी को लेकर बहस होती रही है । खासकर हाल के वर्षों में, देश की राजनीतिक अस्थिरता, जनता का मोहभंग, लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन और सत्ता के दुरुपयोग ने राजतंत्र के विकल्पों पर चर्चा को बढ़ा दिया है ।
विक्रम संवत २०५८ में राजदरबार नरसंहार के बाद राजा ज्ञानेंद्र सत्ता में आए । विक्रम संवत २०६१ में उनके प्रत्यक्ष शासन संभालने के बाद, राजशाही का पतन शुरू हो गया । जन असंतोष, राजनीतिक दलों के आंदोलनों और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण, ज्ञानेंद्र को २०६३ में सत्ता सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ा । संवत २०६५ में, संविधान सभा ने गणतंत्र की घोषणा करके राजशाही को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया । राजशाही संभव है या नहीं, यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के लिए गहन विश्लेषण की आवश्यकता है । हाल के दिनों में, नेपाल में लोकतांत्रिक प्रथाएँ कमजोर होती जा रही हैं । जनप्रतिनिधियों में जनता का विश्वास कम होता जा रहा है । देश को एक स्थिर सरकार नहीं मिल पाई है । भ्रष्टाचार, कुशासन, निष्क्रियता और दलों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा ने नागरिकों में राजनीतिक हताशा बढ़ा दी है । ऐसा लगता है कि कुछ लोगों में राजशाही का विकल्प तलाशने की मानसिकता विकसित हो गई है । खासकर युवाओं में, ’राज आओ, देश बचाओ’ का नारा जोड़ पकड़ने लगा है । सत्ता की होड़, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दलों के बीच नीतिगत मतभेद और राजनीतिक असहमतियाँ पूरे देश को कमजÞोर कर रही हैं । ऐसे में, लोगों की हताशा और असंतोष इस बदलते राजनीतिक परिवेश में आसानी से झलक सकती है । बहुत से लोग अपने भविष्य के लिए राजनीतिक स्थिरता और मजÞबूत नेतृत्व की तलाश में हैं । अगर सरकार और राजनीतिक दल जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाते, तो लोगों द्वारा वैकल्पिक समाधान ढूँढने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता । इस कारण, वर्तमान समय में राजशाही की वापसी की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता । भविष्य में, कोई भी अप्रत्याशित घटनाक्रम या जन–इच्छाशक्ति राजनीति और समाज में बदलाव का एक महत्वपूर्ण वाहक बन सकती है ।
नेपाली तथाकथित राजनेताओं और डॉलरे विद्वान के अदूरदर्शी सोच, द्रव्य पैशाची अंध पाश्चात्य भक्ति, और होली वाइन संस्कृति के पिट्ठुओं नेपाल और नेपाली के सार्वभौमिकता का संरक्षण के कल्पना ही अज्ञानता का द्योतक था । जिसके परिताप ने देशभक्त युवाओं के सीने में ज्वालामुखी प्रज्ज्वलित कर दिया । और भीषण क्षति देश को स्वीकारना पड़ा । विभिन्न समाचार माध्यम ने यह स्वीकार किया कि इस आंदोलन को हवा देने का काम विदेशियों के निर्देशन और उद्देश्य पोषण हेतु संचालित एन जी ओ का ही मुख्य हाथ है । ईसाई मिशनरियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के नाम पर नेपाल के ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय हैं । विद्यालयों और अस्पतालों के माध्यम से वे गरीब तबकों में सहायता का हाथ बढ़ाते हुए धर्मान्तरण की प्रक्रिया चला रही हैं । यह सांस्कृतिक आक्रमण नेपाल की पारम्परिक हिन्दू–बौद्ध पहचान के लिए चुनौती बनता जा रहा है । तो वहीं दक्षिणी सीमावर्ती इलाकÞों में इस्लामिक धार्मिक संगठनों द्वारा जनसांख्यिकीय परिवर्तन की सूक्ष्म नीति चल रही है । यद्यपि नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित है, परन्तु इसकी सांस्कृतिक आत्मा अभी भी वैदिक और बौद्ध परम्पराओं से जुड़ी हुई है, जिसे विदेशी धर्म अपने विस्तार हेतु चुनौती दे रहे हैं । नेपाल के सार्वभौम अखंडता को यदि किसी से खतरा है तो वह धार्मिक सांस्कृतिक पर किए जा रहे बाहरी गिद्धों का आक्रमण ही है ।
नेपाल के लिए दूसरा सबसे बड़ा खतरा “भारत–चीन–अमेरिका के त्रिकोणीय प्रतिस्पर्धा” का केन्द्र बनना है । चीन नेपाल को अपने “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” में जोड़ना चाहता है, ताकि दक्षिण एशिया में अपनी सामरिक पहुँच बढ़ा सके । चीन नेपाल में बुनियादी ढाँचा, ऊर्जा परियोजनाएँ और राजनीतिक सहयोग के माध्यम से अपना प्रभाव जमाने में लगा है । दूसरी ओर अमेरिका नेपाल को “इंडो–पैसिफिक स्ट्रैटेजी” के अंतर्गत एक साझेदार बनाना चाहता है । “एमसीसी” परियोजना इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसके माध्यम से अमेरिका चीन के विस्तारवाद को रोकना चाहता है । इस प्रतिस्पर्धा का सीधा प्रभाव नेपाल की आन्तरिक राजनीति और नीतिनिर्धारण पर पड़ रहा है । इधर नेपाल के संदर्भ में भारत की भूमिका ः रक्षात्मक या प्रभुत्ववादी है यह भी नेपालियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है । भारत और नेपाल के सम्बन्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक हैं । नेपाल की खुली सीमा, साझा संस्कृति और धार्मिक एकता इसे भारत से जोड़ती है । परन्तु राजनीतिक दृष्टि से कई बार भारत पर नेपाल के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया जाता रहा है । भारत का उद्देश्य नेपाल को अपने सनातन पारम्परिक प्रभाव क्षेत्र में अडिग बनाए रखना है, ताकि चीन जैसी शक्ति दक्षिण एशिया में अपनी पकड़ न बना सके । किन्तु डॉलर के लालच में डूबे नेपाल के नेतृत्व वर्ग को अपनी ही संस्कृति को उखाड़ फेंकने में गर्व महसूस हो रहा है । और पाक की तरह अपनी हर गलती का दोष भारत को देना अपनी बौद्धिक सफलता मनाते हैं ।
नेपाल, वर्तमान में वैश्विक प्रतिस्पर्धा का शिकार बन चुका है । आज नेपाल की परिस्थिति ऐसी है कि हर शक्ति अपने–अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए इसे “सामरिक मोहरा” बनाना चाहती है । धार्मिक संगठन “धर्मान्तरण” के माध्यम से संस्कृति पर आक्रमण कर रहे हैं । चीन और अमेरिका “भू–राजनीतिक प्रभुत्व” की दौड़ में नेपाल को निवेश का चारा बना रहे हैं । भारत सनातन की सुरक्षा और प्रभाव को बनाए रखने के लिए सतर्क निगाह रखे हुए है । इस प्रकार नेपाल की स्थिति एक “सांस्कृतिक और राजनीतिक युद्धभूमि” की बनती जा रही है, जहाँ उसके अपने राष्ट्रीय हित विदेशी हितों के दबाव में दबते जा रहे हैं । अतः अब हम को चाहिए कि हम अपनी राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक अस्मिता और स्वाधीन विदेश नीति को सशक्त बनाएं । शिक्षा में राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को केंद्र में रखा जाए ।आर्थिक नीति में स्वदेशी संसाधनों को प्राथमिकता में रखते हुए आत्मनिर्भर चिरस्थाई आर्थिक आधार तैयार किया जाय । साथ ही कूटनीति में ‘संतुलन और समान दूरी’ की नीति अपनाते हुए अपनी धर्म, संस्कृति और सार्वभौम सत्ता के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए किसी भी अन्य देश से कोई समझौत नहीं कि नीति अपनाई जाए । ध्यान रहे!यदि नेपाल अपने मूल सांस्कृतिक धरोहरों और आत्मसम्मान की रक्षा में दृढ़ रहेगा, तो कोई भी शक्ति उस पर गिद्धदृष्टि नहीं डाल सकेगी ।
देश की सूरत बदलने वाले २७ घंटे के जेनजी विद्रोह को अगर सिर्फÞ सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की प्रतिक्रिया समझा जाए, तो इसे संकीर्ण और सतही विचार माना जाएगा । इसने सिर्फÞ असंतोष की आग भड़काने का काम किया है । यह लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अंतर्विरोधों और प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रति असंतोष की प्रतिक्रिया है । यह लोगों में आक्रोश का विस्फोट भी है । सड़कों पर उतरे युवाओं के गुस्से को बेरोजÞगारी, भ्रष्टाचार, भाई–भतीजावाद, विलासिता और असमानता के दर्द की आवाजÞ माना जाना चाहिए । इसके कई आंतरिक और बाहरी कारण समय के साथ धीरे–धीरे सामने आएंगे, लेकिन विद्रोह से आए बदलावों को नकारना या उनका गलत विश्लेषण करना देश और जनता के हित में नहीं होगा ।
नेपाल की अर्थव्यवस्था लंबे समय से धन प्रेषण पर निर्भर रही है । कृषि क्षेत्र बर्बाद हो रहा है । उद्योग और व्यवसाय बदहाल हैं । लाखों युवाओं को अपना भविष्य विदेश में तलाशना पड़ा है, जबकि देश में रोजÞगार के अवसर कम हैं । छात्रों की भी यही मानसिकता है कि उन्हें बारहवीं कक्षा पूरी करते ही विदेश चले जाना चाहिए । आँकड़े बताते हैं कि २०२४ में युवा बेरोजÞगारी दर लगभग २० प्रतिशत होगी । लगभग ६० लाख लोग निर्वासन में हैं । उनमें नेताओं, पार्टी और उनके चरित्र को लेकर घोर निराशा और मोहभंग है । देश का कोई भी युवा और छात्र जो पार्टी से जुड़ा है, वो भी संतुष्ट नहीं है ।
जेनजी आंदोलन एक पूर्ण लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की कल्पना करता है । इसका अर्थ है कि नागरिक अपने दैनिक जीवन की आवश्यक सेवाओं– जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजÞगार और प्रशासनिक सेवाओं– को किसी और के धन, सेवाओं या संसाधनों पर निर्भर हुए बिना आसानी से प्राप्त कर सकें । उनका स्पष्ट मानना है कि लोकतांत्रिक शासन की नींव सरकारी या निजी सेवाओं तक बिना किसी अतिरिक्त रिश्वत दिए या बिचौलियों की मदद के आसानी से पहुँचने को कहते हैं । इससे राज्य में लोगों का विश्वास बढ़ता है और नागरिक सशक्त होते हैं ।
जेनजी एक ऐसी व्यवस्था की माँग कर रहे हैं जो योग्यता और क्षमता को मुख्य आधार मानती हो । वे भाई–भतीजावाद, पक्षपात या राजनीतिक पहुँच के आधार पर नियुक्तियों, पदोन्नति या अवसरों को अस्वीकार करते हैं जो पुरानी व्यवस्था में जड़ जमाए हुए हैं । वे विश्वविद्यालयों, नौकरशाही और सभी सरकारी संस्थानों में दलगत राजनीति और भाई–भतीजावाद का अंत चाहते हैं । उनके विचार में, शिक्षा, रोजÞगार, नेतृत्व या अवसरों तक सभी की पहुँच समान होनी चाहिए । इससे संस्थागत उत्कृष्टता और सामाजिक न्याय दोनों सुनिश्चित होते हैं । जिससे राष्ट्रीय अखंडता को बल मिलता है ।
जेनजी पुरानी पीढ़ी की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक कुशल हैं । वे डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से सेवा वितरण को पारदर्शी और प्रभावी बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं । उनकी प्राथमिकताओं में ऑनलाइन एप्लिकेशन, ट्रैकिंग सिस्टम, ओपन डेटा और नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देने वाली तकनीक का उपयोग शामिल है । इससे न केवल भ्रष्टाचार कम होता है, बल्कि जनभागीदारी और जवाबदेही भी बढ़ती है । समय, श्रम और संपत्ति की भी बचत होती है । यही एक माध्यम है, जिससे नेपाल खुद को इजराइल की तरह अपनी सामथ्र्य को वैश्विक बना सकता है ।
जेनजी आंदोलन नेपाल में सामाजिक परिवर्तन की आवाजÞ मात्र नहीं है, बल्कि एक गहन लोकतांत्रिक पुनर्गठन की माँग है । इस पीढ़ी ने दलीय व्यवस्था की सीमाओं को देखा है और इस वास्तविकता को स्वीकार किया है कि दलीय व्यवस्थाएँ व्यवहार्य नहीं हैं । उनके विचार में, यह दलों का लोकतंत्रीकरण, सेना में राजनीति की अनुमति न देना और शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाना है । उनका मानना है कि सभी को समावेशी बहसों के माध्यम से, सुशासन को प्राथमिकता देते हुए, एक साथ आगे बढ़ना चाहिए । वे योग्यता और दक्षता के पक्षधर हैं और अवसर की समानता तथा संस्थागत उत्कृष्टता की माँग कर रहे हैं । इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भावी पीढ़ी के लिए रहने लायक देश का निर्माण करना है । इसके लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों का गहन परीक्षण, तथ्यों का विश्लेषण, अनुभवों की समीक्षा और व्यापक बहस होनी चाहिए । वे केवल विरोध ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि समाधान भी सुझा रहे हैं । नीति निर्माण में वैज्ञानिक सोच, एक समावेशी दृष्टिकोण और एक विकसित राष्ट्र । उनके आंदोलन को नेपाल में लोकतंत्र को मजÞबूत करने, उसे दलीय व्यवस्था की सीमाओं से मुक्त करने और नागरिकों के जीवन पर सीधा प्रभाव डालने वाली शासन व्यवस्था के निर्माण की दिशा में एक सार्थक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए ।
दूसरी ओर, नेपाल की वर्तमान, निवर्तमान और पारंपरिक राजनीतिक ताकतों को नजÞरअंदाजÞ नहीं किया जा सकता । इस ताकत की जनमत के साथ–साथ राज्य सत्ता तक भी मजÞबूत पहुँच है । यह संगठित है और अब इस पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं । कुछ भ्रष्ट हैं, व्यवस्था भ्रष्ट है, लेकिन इनके अधिकांश कार्यकर्ता और मतदाता राष्ट्र और सुशासन के प्रति ईमानदार हैं । ये एक निश्चित राजनीतिक दर्शन के आधार पर संगठित हैं । इनकी यह संगठित ताकत जल्द ही अव्यवस्थित या विखंडित होती नहीं दिखती । वर्तमान कार्यवाहक मंत्रिमंडल, राष्ट्रीय सभा, प्रांतीय और स्थानीय विधान सभाएँ, जो अभी भंग नहीं हुई हैं, और प्रतिनिधि सभा को पुनस्र्थापित करने में सक्रिय (एमाले कांग्रेस और माओवादी) लगायत अन्य दलों के हाथों में ही बहुमत है ।अगर चुनाव होगा तब भी ए लोग आंतरिक सहमति कर खुद के पार्टियों को पुनः स्थापित करने में सफल हो जाएंगे और यदि पुनस्र्थापना होता है तो इनका बहुमत है ही । अतः बीच में बुरी तरह फसते हुए जेनजी देशभक्त युवा ही दिखाई दे रहे हैं । पार्टी खोलकर चुनावी मैदान में उतरना और इन भेडÞिए से टक्कर लेना दीवा स्वप्न के अलावा कुछ नहीं । जेन जी आंदोलन अथवा कहें विद्रोह चुनाव के लिए नहीं था । बल्कि भ्रष्टों को पहचान कर उसे सदा के लिए दंडित करना था । वैसे चरित्र को सार्वजनिक पद से सदा के लिए अधिकार शून्य करना था । देश बेचुआ के संपत्ति को वापस सरकारी खजाने में भरना था । परन्तु, पूरा आंदोलन ही भटक गया जैसा लगता है । देशभक्त विचारवान लोग भी अटके भटके लग रहे हैं । खंडित विचारों के संप्रेषण से पूरे राष्ट्र अन्यौलग्रस्त होता जा रहा है । अन्यौलग्रस्त अर्थात, अनिर्णय की अवस्था विनाश का परिचायक होता है । इसे गंभीर होकर दूरदृष्टि के साथ विश्लेषण और मंथन किए जाने की आवश्यकता है ।

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