Mon. Feb 26th, 2024

अवसाद की ओर बढ़ते नन्हें बच्चों के कदम

डा. महेश श्रीवास्तव
डा. महेश श्रीवास्तव

आज के युग में नन्हे बच्चे भी अवसाद की ओर अग्रसर हो रहे हैं । इस तथ्य का उजागर किया है अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडिया ट्रिक्स ने अपने शोध में कि बच्चे को निरन्तर डांटना, उलाहना देना या नीचा दिखाने की पीड़ा और प्रभाव उतनी ही गहरे हैं, जितनी शारीरिक प्रताड़ना के । अभिभावकों में एक गलत धारणा है कि उनके द्वारा उठाया गया प्रत्येक कठोर कदम बच्चों के लिए हितकारी होता है । मैकमास्टर युनिवर्सिटी के प्रोफेसर मैकमिलन के शोध के अनुसार जब बच्चा मौखिक प्रताड़ना का शिकार होता है तो वह उसके व्यक्तित्व को विखण्डित कर देता है । कभी पारिवारिक कलह के चलते तो कभी किसी बाहरी दबाव का आक्रोश बच्चों पर निकालना माता–पिता को असहज नहीं लगता । वे मानकर चलते है कि दण्डात्मक व्यवहार बच्चों को नियन्त्रित करने का सबसे बेहतर रास्ता है । ‘स्पेअर द रॉड और स्पाइल द चाइल्ड’ (मतलव डंडे के बिना बच्चे की बरवादी निश्चित हैं) की नीति पर यकीन करने वाले सिर्फ भारतीय अभिभावक ही नहीं है, अमरिका जैसा विकसित देश में अभिभावक अपने बच्चों को शारीरिक ढंग से अनुशासित करने में विश्वास रखते हैं । बिना यह जाने कि उनकी सोच उनके बच्चे को कितनी ठेस पहुँचा रही है । एक अध्ययन के मुताविक ६३ प्रतिशत मामलों में माता–पिता १–२ साल में बच्चों को शारीरिक सजा देते हंै, तो किशोरों के मामले में यह अनुपात ८५ प्रतिशत तक पहुँचता है । जबकि विश्व में २१ देश ऐसे भी हंै, जो अभिभावकों के द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की प्रताड़ना को अपराध मानते है । स्वीडन, फिनलैण्ड, जर्मनी पुर्तगाल एवं नर्वे में माता–पिता या अन्य रिश्तेदारों द्वारा संतानों को डाटना तक गैर–कानूनी है ।
बायोलॉजी के एक जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में विशेषज्ञों ने बताया है, शोषित बच्चों के मस्तिक में दो हिस्सों एटेरियर इन्सुला और एमाइग्लाडा में सक्रियता बढ़ जाती है, जो उनके भावनात्मक विकास को बाधित करती है और उन्हें अवसादग्रस्त बनाती है । बच्चो का कोमल मन जब भी किसी प्रकार की ‘आत्मीया हिंसा’ से प्रताडि़त होता है तो वह स्वयं को अपनों से दूर करने लगता है । अभिभावकाें के लिए यह समझने और जानने की आवश्यकता है कि अगर उनका बच्चा गलत आचरण कर रहा है, तो उसका वास्तविक कारण क्या है ?
बिना कारणों को खोजे बच्चाें को सजा देना, समस्या का ऐसा अस्थायी समाधान है, जो बच्चों को अभिभावको के समक्ष नियन्त्रित व्यवहार करने के लिए विवश कर देगा, परन्तु भीतर ही भीतर वह उग्र और उदण्ड होता चला जायेगा । उसमें यह विश्वास घर कर जायेगा कि किसी भी विवाद या समस्या का प्रभावी हल, दण्डनात्मक व्यवहार है । वह समस्याओं को मानवीय ढंग से सुलझाने की सकारात्मक सोच से दूर होता चला जाएगा ।
हमें विश्वास करना होगा कि संवाद एक मात्र माध्यम है, जिसके जरिए हम बच्चों को अनुशासनवद्ध जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित कर सकते है । संयुक्त राष्ट्र ने माता–पिता के हाथो कॉर्पोरल (दण्डात्मक) सजा को खत्म करने के लिए २००१ की सीमा निश्चित की थी, परन्तु कई देशों में ऐसा नहीं हुआ है । भारत में महिला एवं बाल कल्याण मन्त्रालय की ओर से एक बिल का प्रारुप पेश किया गया था, जिसके अनुसार संस्थानों में ही नहीं, बल्कि माता, पिता, रिश्तेदारों, पड़ोसियो के हाथों दण्डनात्मक सजा को दण्डनीय अपराध घोषित करने की बात कहीं ।
यह तय है कि इसका विरोध होगा, क्योंकि हम किसी भी कीमत पर यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होंगे कि माता–पिता को बच्चों को अनुशासन में रखने को यह सोच, उनके बच्चे के लिए किसी भी रुप में हितकर नहीं है । 
(लेखक केन्द्रीय विद्यालय भारतीय
दूतावास, काठमांडू, नेपाल से सम्बन्धित हैं)



About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: