देखें ऊंट किस करवट बैठता है मधेशियों की शहादत जीतती है या सत्ता की जिद ?
संविधान मिला परन्तु वैधानिक स्तर पर मधेश समस्या का समाधान नही मिला है । राज्यों की सीमाओं के पुनर्निधारण से जुडी समस्याओं का किस कदर समाधान निकाला जाय और वो समाधान किस तरह सत्ताधारी दल और मधेश को सर्वमान्य हो देश इस में उलझा हुआ है ।
सरकार बदलती रही पर समस्या के समाधान का विकल्प नही मिला । फिलहाल यह सम्भावना दिख रही है कि सरकार मधेशी पार्टियों के साथ समझौते के करीब है । मुद्दों को समेट कर समग्र समझौते पर सहमति कैसे बनेगी सबका ध्यान इस ओर ही है । प्रांतीय सीमाएं, नागरिकता, ऊपरी सदन में प्रतिनिधित्व और भाषाओं को मान्यता दिलाने जैसी मांग मधेश की है जिसमे सबसे अहम मांग प्रतिनिधित्व और प्रान्त की है ।अब से पहले भी वार्ताएं हुई और कुछ हासिल होने से पहले किसी न किसी बहाने टल गईं । ऐसे में आज भी समाधान होगा या नहीं यह प्रश्न अपनी जगह कायम ही है ।
अब तक यह सामने नही आ रहा क़ि सीमाओं के मसले को हल करने के लिए कौन सी योजना बनाई गई है । माना यह जा रहा है कि दोनों पक्ष प्रान्त नंबर 5 के पहाड़ी और मैदानी इलाकों के बंटवारे पर सहमत हो गए हैं । मगर पूर्व के तीन विवादित जिले झापा, मोरंग,सुनसरी और पश्चिम के 2 जिलों कंचनपुर और कैलाली पर स्थिति अब भी साफ नही है । सत्ता इसे प्रान्त नंबर 1 और 7 का हिस्सा बने रहने के पक्ष में है तो मधेशी पार्टी इन जिलों को 2 और 6 में शामिल कराना चाहती है । ऐसे में यह तो जाहिर सी बात है कि किसीं एक को पीछे हटना होगा मगर कौन ? देखें ऊंट किस करवट बैठता है मधेशियों की शहादत जीतती है या सत्ता की जिद ।


