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अंतोन चेखव जी के साथ उनकी कहानी के कुछ अंश

 

आज हिमालिनी पत्रिका ( नेपाल)  के आभार स्वरूप एक ऐसे लेखक से आप को रूबरू करवाते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ जो की रूसी परिवेश से आत्मसात होते हुए भी हिंदी साहित्य को एक ऐसे मुकाम पर लाए जहां वो विश्व के साथ हिन्दी वासियों के दिल मे याद बन कर बस गए उनके साहित्य में एक निरन्तरता महसूस होती है एक उत्साह जीवन को श्रंगारित करती है , जी हां आज मैं मनीषा गुप्ता #अंतोन चेखव जी के साथ उनकी कहानी के कुछ अंश लिए……!!

एक छोटा सा मज़ाक कहानी के कुछ अंश

–मेरी बात मान लो! –मैंने उससे कहा– नहीं-नहीं, डरो नहीं, तुममें हिम्मत की कमी है क्या?

आख़िरकार वह मान जाती है। और मैं उसके चेहरे के भावों को पढ़ता हूँ। ऎसा लगता है जैसे मौत का ख़तरा मोल लेकर ही उसने मेरी यह बात मानी है। वह भय से सफ़ेद पड़ चुकी है और काँप रही है। मैं उसे स्लेज पर बैठाकर, उसके कंधों पर अपना हाथ रखकर उसके पीछे बैठ जाता हूँ। हम उस अथाह गहराई की ओर फिसलने लगते हैं। स्लेज गोली की तरह बड़ी तेज़ी से नीचे जा रही है। बेहद ठंडी हवा हमारे चेहरों पर चोट कर रही है। हवा ऎसे चिंघाड़ रही है कि लगता है, मानों कोई तेज़ सीटी बजा रहा हो। हवा जैसे गुस्से से हमारे बदनों को चीर रही है, वह हमारे सिर उतार लेना चाहती है। हवा इतनी तेज़ है कि साँस लेना भी मुश्किल है। लगता है, मानों शैतान हमें अपने पंजों में जकड़कर गरजते हुए नरक की ओर खींच रहा है। आसपास की सारी चीज़ें जैसे एक तेज़ी से भागती हुई लकीर में बदल गई हैं। ऎसा महसूस होता है कि आनेवाले पल में ही हम मर जाएंगे।

मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या! –मैं धीमे से कहता हूँ।

अन्तोन पाव्लाविच चेख़व (जुलाई,१९०४) रूसी कथाकार और नाटककार थे। अपने छोटे से साहित्यिक जीवन में उन्होंने रूसी भाषा को चार कालजयी नाटक दिए जबकि उनकी कहानियाँ विश्व के समीक्षकों और आलोचकों में बहुत सम्मान के साथ सराही जाती हैं। चेखव अपने साहित्यिक जीवन के दिनों में ज़्यादातर चिकित्सक के व्यवसाय में लगे रही। वे कहा करते थे कि चिकित्सा मेरी धर्मपत्नी है और साहित्य प्रेमिका।

जीवन परिचयसंपादित करें

उनका जन्म दक्षिण रूस के तगानरोग में 29 जनवरी 1860 में एक दूकानदार के परिवार में हुआ। १८६८ से १८७९ तक चेखव ने हाई स्कूल की शिक्षा ली। १८७९ से १८८४ तक चेखव ने मास्को के मेडिकल कालेज में शिक्षा पूरी की और डाक्टरी करने लगे। १८८० में चेखव ने अपनी पहली कहानी प्रकाशित की और १८८४ में इनका प्रथम कहानीसंग्रह निकला। १८८६ में ‘रंगबिरंगी कहानियाँ’ नामक संग्रह प्रकाशित हुआ और १८८७ में पहला नाटक ‘इवानव’। १८९० में चेखव ने सखालिन द्वीप की यात्रा की जहाँ इन्होंने देशनिर्वासित लोगों की कष्टमय जीवनी का अध्ययन किया। इस यात्रा के फलस्वरूप ‘सखालिन द्वीप’ नामक पुस्तक लिखी। १८९२ से १८९९ तक चेखव मास्को के कनटिवर्ती ग्राम ‘मेलिखोवो’ में रहे थे। इन वर्षों में अकाल के समय चेखव ने किसानों की सहायता का आयोजन किया और हैजे के प्रकोप के समय सक्रिय रूप से डाक्टरी करते रहे। १८९९ में चेखव बीमार पड़े जिससे वे क्रिम (क्राइमिया) के यालता नगर में बस गए। वहाँ चेखव का गोर्की से परिचय हुआ।

१९०२ में चेखव को ‘संमानित अकदमीशियन’ की उपाधि मिली; लेकिन जब १९०२ में रूसी जार निकोलस द्वितीय ने गोर्की को इसी प्रकार की उपाधि देने के फैसले को रद्द कर दिया तब चेखव ने अपना विरोध प्रकट करने के लिये अपनी इस उच्च उपाधि का परित्याग कर दिया। १९०१ में चेखव ने विनप्पेर नामक अभिनेत्री से विवाह किया। इनकी पत्नी उस प्रगतिशील थियेटर की अभिनेत्री थी जहाँ चेखव के अनेक नाटकों का मंचन किया गया था। १९०४ में चेखव के नाटक ‘चेरी के पेड़ों का बाग’ का प्रथम बार अभिनय हुआ। १९०४ के जून में बीमारी (तपेदिक) जोर से फैल जाने के कारण चेखव इलाज के लिए जर्मनी गए। वहीं बादेनवैलर नगर में इनका स्वर्गवास हुआ। चेखव की समाधि मास्को में है।

चेखव ने सैकड़ों कहानियाँ लिखीं। इनमें सामाजिक कुरीतियों का व्यांगात्मक चित्रण किया गया है। अपने लघु उपन्यासों ‘सुख’ (१८८७), ‘बाँसुरी’ (१८८७) और ‘स्टेप’ (१८८८) में मातृभूमि और जनता के लिए सुख के विषय मुख्य हैं। ‘तीन बहनें’ (१९००) नाटक में सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता की झलक मिलती है। ‘किसान’ (१८९७) लघु उपन्यास में जार कालीन रूस के गाँवों की दु:खप्रद कहानी प्रस्तुत की गई थी। अपने सभी नाटकों में चेखव ने साधारण लोगों की मामूली जिंदगी का सजीव वर्णन किया है। चेखव का प्रभाव अनेक रूसी लेखकों, बुनिन, कुप्रिन, गोर्की आदि पर पड़ा। यूरोप, एशिया और अमरीका के लेखक भी चेखव से प्रभावित हुए। भाारतीय लेखक चेखव की कृतियाँ उच्च कोटि की समझते हैं। प्रेमचंद के मत से ‘चेखव संसार के सर्वश्रेठ कहानी लेखक’ हैं।

आजकल भी चेखव के सभी नाटकों का रूस के अनेक थियेटरों में प्रदर्शन किया जाता है। चेखव की कहानियों के आधार पर अनेक चलचित्र बनाए गए हैं, जैसे ‘कुत्तेवाली महिला’, ‘भालू’, ‘दूल्हन’, ‘स्वीडिश दियासलाई’। सोवियम संघ में १९१८ से १९५६ तक चेखव की कृतियाँ ७१ भाषाओं में प्रकाशित हुई थीं। इन सभी पुस्तकों की संख्या ४९ लाख है। चेखव के निवासस्थानों पर मास्को, यालता, तागनरोग और मेलिखेव में चेखव म्यूजियम खुले हैं। भारम में चेखव की अनेक कहानियाँ और नाटक बहुत सी भाषाओं में प्रकाशित हुए हैं।

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