Tue. Oct 27th, 2026
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अयोध्यानाथ चौधरी

ऐ जिन्दगी!
तुम कब तलक , यूँही
दहलीज के बाहर
ऐसे ही अंगूठे से
मिट्टी कुरेदती रहोगी
इतनी संवेदनहीनता !
मेरा सूनापन
अब मौत के समीप है
बर्षों बीत गए
एक पल के लिए ही सही
तुम आओ
मैं चाहता हूँ
तुम आओ
मैं चाहता हूँ
तेरी गोद मे सर रख
मर जाऊँ
और फिर
तुम चली जाना
कभी ना आने के लिए ।

 

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