Tue. Nov 19th, 2019

चेतना प्रदत्त पीड़ा से गुजर रहा हूँ : दिनेश अधिकारी

परिवर्तन के नाम में हमारे यहां जो विकृतियां दिखाई दे रही है, उसके प्रति मैं असन्तुष्ट हूँ

 

Dinesh Adhikari
दिनेश अधिकारी, नेपाल सरकार के पूर्व सचिव,कवि तथा गीतकार

एक कुशल पूर्व–प्रशासक हैं– दिनेश अधिकारी । इससे अधिक आप को एक कवि और गीतकार के रूप में भी जाना जाता है । आप का जन्म वि.सं. २०१६ साल मार्गशीर्ष २२ गते काठमांडू (बानेश्वर) में हुआ है । आप का स्थायी निवास हरिवन नगरपालिका –८ सर्लाही है । आप के पिता नन्दनहरि उपाध्याय अधिकारी और माता शारदादेवी अधिकारी हैं । आपकी अभी तक १६ पुस्तकें प्रकाशित हो चूकी हैं, जिसमें से अधिकांशतः साहित्यिक पुस्तकें हैं । आप का एक दर्जन से अधिक गीति–एल्बम बाजार में हैं । आप के द्वारा रचित लगभग ५०० गीत रेडियो से प्रसारित हैं । वि.सं. २०७१ साल में नेपाल सरकार के सचिव पद से सेवानिवृत्त आपकी साहित्यिक और संगीतिक यात्रा आज भी जारी है । आप, मदन पुरस्कार, साझा पुरस्कार, छिन्नलता गीति पुरस्कार जैसे कई पुरस्कार और सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं । इन्हीं बहुमुखी प्रतिभा के धनी दिनेश अधिकारीजी का जीवन–सन्दर्भ यहाँ प्रस्तुत है । प्रस्तुतिः लिलानाथ गौतम

 

साल तक सह–सचिव रहने के कारण मैं भी सचिव के लिए दावेदार रहा । लेकिन मुझे देखकर बढुवा समिति ने हास्यास्पद निर्णय किया । जहां लिखा गया– ‘निज की योग्यता तो है, लेकिन सेवा परिवर्तन कर आने के कारण इस बार के लिए उन्हें उम्मीदवार नहीं माना जाएगा ।’ निर्णय समिति में रहनेवालों का कहना था कि इसके लिए कानून नहीं है । दूसरी बार भी मुझे सचिव नहीं बनाया गया 

पारिवारिक पृष्ठभूमि
मैं मध्यम वर्गीय परिवार में पला–बढ़ा एक सामान्य व्यक्ति हूं । शैक्षिक दृष्टिकोण से मेरी गिनती शिक्षित परिवार में होती है । मेरे पिता नन्दनहरि अधिकारी, नन्दनहरि उपाध्याय ‘ओखलढुंगे’ के नाम से लिखते थे, उनकी दो कृतियां प्रकाशित हैं । पिता जी सामाजिक सरोकार संबंधी विषयों को लेकर गोरखापत्र के सम्पादक को बार–बार पत्र लिखते रहते थे । उसी को देख कर मैं बचपन से साहित्यिक रचना और लेखन के बारे में सोचता था । १६ साल के उम्र (वि.सं. २०३२ साल) से ही मेरी रचना प्रकाशित होने लगी थी, और वि.सं. २०३९ साल से मेरे रचित गीत प्रसारण होने लगी थी ।
सिर्फ मैं ही नहीं, मेरे घर–परिवार के अन्य सदस्यों में भी साहित्यिक रुचि थी । मेरे बड़े भाई (दूसरे नम्बर के) ध्रुवहरि अधिकारी को तो आप भी जानते होंगे । संक्षेप में कहें तो घर–परिवार में पठन–पाठन का माहौल था । दो शाम खाने में कोई दिक्कत नहीं थी । मेरी शादी वि.सं. २०४१ में उषा अधिकारी के साथ हुई । आज की अवस्था में घर पर केवल हम दो ही हैं । वैसे तो हमारी एक बेटी और एक बेटा भी है । बच्चे की शादी भी हो गई है,वे अपनी जगह पर अच्छे हैं ।

परिचय के अनेक रूप
हां,मैं व्यक्ति तो एक ही हूँ, लेकिन जो मुझे जानते हैं, उन लोगों का दृष्टिकोण अलग–अलग है । मेरी उपस्थिति जहां और जिस के साथ रहती है, वहां मेरा परिचय उन्हीं के अनुसार बन जाता है । इसीलिए लगता है कि जीवन में परिचय के कई पहलू हैं । उदाहरण के लिए मैं नेपाल सरकार का सेवा–निवृत्त सचिव हूँ । यह कर्मचारियों के सर्कल का एक परिचय है । कर्मचारियों के बीच मुझे एक पूर्व सचिव के रूप में जाना जाता है । मैं कानून का स्टूडेंट हूं । मैंने २१ साल सरकारी वकील के रूप में काम किया है । मेरे कुछ दोस्त सुप्रीम कोर्ट में जज भी हैं । इसीलिए न्याय क्षेत्र से जुड़े मित्रों के सामने मैं भी एक कानून का विद्यार्थी हो जाता हूं । इसके अलावा मेरी एक और दुनियां भी है– कविता और गीत–संगीत की दुनिया । साहित्यिक दुनिया में मैं एक कवि और गीतकार हूं । तब भी एक नए व्यक्ति के सामने अपना परिचय देता हूं तो मैं खुद को एक कवि और गीतकार के रूप में प्रस्तुत करता हूँ ।
अर्थात् मेरी विशेष रुचि साहित्य क्षेत्र में है । क्योंकि साहित्य प्रति मेरा झुकाव है, मैं अपना परिचय इसी में तलाश करता हूं । सरकारी नौकरी शुरु करने से पहले से ही मेरी साहित्यिक यात्रा शुरु हुई थी, जो आज भी जारी है । इसीलिए मेरे लिए नौकरी से बढ़कर है– मेरा साहित्यिक जीवन । और, मेरी पसंदीदा विधा भी है– कविता और गीत । आज भी समय मिलते ही कविता और गीत लिखता हूं । साहित्यिक और संगीतिक कार्यक्रमों में जाता हूं । मेरा जीवन साहित्यिक गतिविधियों से गुजर रहा है । इतना होते हुए भी मेरा व्यवसायिक जीवन तो सरकारी नौकरी से ही जुड़ा हुआ है, जिसको मैं चाह कर नहीं भुला सकता ।

सरकारी सेवा में प्रवेश
सरकारी सेवा में प्रवेश करने के पीछे दो कारण थे । मैं कानून में स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहा था । सुबह कॉलेज जाता था, लेकिन दोपहर के बाद बेरोजगार की तरह था । ऐसी ही अवस्था में कुछ मित्रों ने नायब सुब्बा (नासु) पद के लिए लोकसेवा का फॉर्म भरा, मैंने भी भर दिया । जाँच दिया, पास हो गया । इस तरह मैं सरकारी सेवा में प्रवेश किया । इसके लिए पहले से ही कोई भी योजना नहीं बनायी थी ।
स्नातक होने के बाद, मेरे पास दो विकल्प थे– एक निजी वकील के रूप में काम करने का, दूसरी सरकारी सेवा जारी रखने का । निजी वकील के रूप में काम करता था तो कम से कम ६ महीनों के खर्च का जुगाड़ करना पड़ता था । रूम का किराया, किताब और टाइपराइटर खरीदने के लिए आवश्यक रकम और एक निजी सहयोगी आदि के लिए मुझे अपने अभिभावक से कम से कम १ लाख रुपया मांगना पड़ता था । मध्यम वर्गीय परिवार होने के कारण यह सब करना मुझे ठीक नहीं लगा । दूसरी तरफ, स्नातक होने के बाद लोग सोचते थे कि अब पढ़ाई खतम हो गई, नौकरी करनी चाहिए । मैं भी ऐसा ही सोच रहा था । इसीलिए मैंने सोचा की सरकारी नौकरी को ही जारी रखना ठीक है । इसतरह मैंने सरकारी वकील की हैसियत से काम करना शुरु किया । यह वि.सं. २०४१ साल की बात है ।

आत्मसंतुष्टिपूर्ण काम
वैसे तो आज नेपाल की स्थिति ऐसी है, जहां कुछ नया और सकारात्मक काम करने का वातावरण नहीं है । जो सकारात्मक काम करना चाहते हैं,उन्हें रोका जाता है पर मैंने कुछ सकारात्मक काम किए जिससे मुझे आत्म गौरव मिलता है । जिस वक्त मैं सरकारी सेवा में रहा, उस वक्त मैंने भी कुछ ऐसे काम किया, जो मुझे तसल्ली देती है । इसके बारे में ज्यादा चर्चा–परिचर्चा तो ठीक नहीं है, तब भी कुछ स्मरण करना चाहता हूँ–
दरबारमार्ग में नेपाल सरकार के नाम में भौतिक संपत्ति थी, जिसके ऊपर एक प्रभावशाली नेता की नजर लगी थी । वह अपने निकटतम व्यक्ति द्वारा संचालित एनजीओ के नाम में उक्त संपत्ति को पंजीकरण कराना चाहते थे । लेकिन मैंने रोक दिया, इसमें मुझे बहुत चुनौती झेलनी पड़ी ।
इसी तरह इम्बोस्ड नंबरप्लेट की कहानी भी मेरी ही कार्यकाल में शुरु हुई । उस समय मैं श्रम और यातायात मन्त्रालय में था । इम्बोस्ड नम्बर प्लेट निर्माण की जिम्मेदारी एक विदेशी प्राइभेट कम्पनी को दिया जा रहा था । हालांकि इस घटना में सचिव सीधे तौर पर शामिल नहीं थे, लेकिन सचिव होने के नाते मुझे लगा कि यह तो नियमित होनेवाल काम है, विभाग और मन्त्रालय का काम भी है, इसके अलावा इसके पीछे देश की सुरक्षा संवेदनशीलता भी जुड़ी हुई है । इसीलिए मुझे लगा कि सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण से भी यह काम विदेशी कंपनी को देना ठीक नहीं है । उसके विरुद्ध मैं खड़ा हो गया, जिसके चलते मुझे बहुत कुछ झेलना पड़ा ।
इसीतरह वि.सं. २०६१ साल भाद्र १६ गते इराक में जो घटना हुई, वह हमारे दिमाग में आज भी ताजा है । उस घटना संबंधी एक प्रसंग को जोड़कर मैं हमारी प्रशासनिक और कुटनीतिक लाचारीपन का उल्लेख करना चाहता हूँ । उस समय इराक में १२ नेपाली नागरिक आतंकवादी संगठन द्वारा मारे गए थे, उस के बाद नेपाली श्रमिकों के लिए इराक प्रतिबंधित रहा । परराष्ट्र मन्त्रालय और दूतावास के सुझाव के आधार पर यहां नेपाली श्रमिकों के लिए प्रतिबंध लगाया गया था । लेकिन आश्चर्य ! जब बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना इराक से वापस हो रही थी, उस समय वहां ३ हजार नेपाली नागरिक श्रमिकों के रूप में पाया गया । प्रतिबंधित अवस्था में यह लोग कैसे इराक तक पहुँच गए ? यह गम्भीर सवाल था हमारे लिए । मुझे लगा कि हमारी कूटनीतिक नियोग की निष्क्रियता और परराष्ट्र मन्त्रालय की लापरवाही के कारण ऐसी घटना हुई है ।
उस समय भारतीय सुझाव के अनुसार ‘ब्याण्ड–लिफ्ट’ की बात हो रही थी । मुझे लगा कि ‘ब्याण्ड–लिफ्ट’ करेंगे तो ३ हजार नेपालियों की अवस्था क्या होगी ?इसी प्रश्न में गम्भीर होकर उस वक्त मुझे परराष्ट्र मन्त्राय के साथ थोड़ा–सा कड़े रूप में प्रस्तुत होना भी पड़ा । मैं श्रम मन्त्रालय में था, सात दिनों का समय था, अपनी ओर से भरपूर प्रयास किया । उस समय अमेरिका के लिए नेपाली राजदूत थे– शंकर शर्मा । उन्होंने अमेरिकी उच्चायोग से बात की । रातों–रात ईमेल में बात होने लगी । अन्तिम में नेपाली मजदूरों के पक्ष में निर्णय किया गया, यहां से भी प्रतिबंध खोल दिया गया । उस समय मैंने परराष्ट्र के सचिव को सम्बोधन करते हुए एक पत्र लिखा था । जहां मैंने हमारी कूटनीतिक विफलता के बारे में उल्लेखित किया था और उल्लेखित घटना की जिम्मेदारी के बारे में प्रश्न किया था । उसी पत्र को हाथ में लेते हुए एक दिन मुख्य सचिव माधव घिमिरे ने सचिवों के बीच में कहा– ‘देखो एक सचिव दूसरे सचिव को इसतरह का पत्र भी लिखते हैं ।’ उस समय मैंने पूछा– ‘क्या मुझसे गलती हो गई ?’ उन्होंने फिर कहा– ‘नहीं, आप ने ठीक किया है, ऐसा होना चाहिए ।’
इसीतरह लिबिया की घटना भी मुझे याद आती है । वहां २ हजार से अधिक नेपाली लोग थे । उन लोगों को बचाना था, देश में नयां सरकार बन रहन था, लेकिन पूर्णता प्राप्त नहीं हुआ था । झलनाथ खनाल प्रधानमन्त्री थे, एक बिना विभागीय मन्त्री थे । उस स्थिति में मैंने २ हजार नेपालियों को लीबिया से सकुशल उद्धार किया । इस काम के लिए नेपाल सरकार की ओर से अधिकतम १०–१५ लाख खर्च किया गया था । इसके लिए मैंने लिबिया स्थित नेपाली कामदार रहे सभी कम्पनी तथा उसके संचालकों को कहा था कि आप लोगों को ही नेपाली श्रमिकों का उद्धार करना है, अगर नहीं करेंगे तो भावी दिनों में नेपाली श्रमिकों को यहां आने के लिए प्रतिबंध लगाया जाएगा । उसके बाद चाइनिज कम्पनियों की ओर से जहाज रिजर्भ कर नेपालियों का उद्धार किया गया । नेपाली श्रमिक तो भागकर यहां आए थे, उन लोगों के पास जो लिभियन करेन्सी था, उसकी चिन्ता होने लगी । बाद में मेरे ही पहल में राष्ट्र बैंक के साथ समन्वय करने वाले रुपयों में परिवर्तित किया गया ।
जब मैं श्रम मंत्रालय में था, उस समय कोरिया में रोजगार के लिए जानेवालों के लिए ईपीएस कोटा केवल ४ हजार ही था । मैं १८ महीना श्रम मन्त्रालय में रहा और उस कोटा को ११ हजार बनाया । इसमें कोरियाई सरकार के साथ मेरा विश्वास था । इस तरह का कुछ काम है, जो मुझे सन्तुष्टि प्रदान करती है ।

प्रशासनिक–राजनीतिक चरित्र, जो दुःखद रहा
पूरे जीवन (नौकरी) काल में मेरे पास एक–दो ही दुःखद घटना है । २० साल तक सरकारी वकील के रूप में काम करने के बाद मैंने सेवा परिवर्तन कर प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया । कानून सेवा में ७ साल तक सह–सचिव रहने के बाद भी मुझे प्रशासनिक क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए खुला प्रतियोगिता में लोकसेवा परीक्षा देना पड़ा । इसतरह लोकसेवा पास कर सेवा परिवर्तन करनेवाले कानून समूह का मैं पहला शख्स हूँ । उससे पहले मन्त्रिपरिषद् द्वारा निर्णय करवा कर सेवा समूह परिवर्तन किया जाता था ।
नया नियम लागू होने के कारण मैं प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गया । लिखित और अन्तरवार्ता जैसे परीक्षा उत्तीर्ण करके ही मैंने सेवा परिवर्तन किया था । मैंने सेवा परिवर्तन इसलिए किया कि मुझे लगा कि मुझे न्यायाधीश नहीं बनना है । पारिवारिक जीवन को देखकर मैंने यह निर्णय लिया था । न्याय क्षेत्र में रहता था तो मैं एक ही जगह नहीं टिक पाता था । न्याय क्षेत्र की प्रकृति ही ऐसी है । जैसे कि मैं २ साल के लिए डोटी में रहता था तो फिर २ साल के बाद मुझे इलाम भी जाना पड़ता था । लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में ऐसा कम ही होता है । इसीलिए मैंने अपने पारिवारिक जीवन, बच्चों की पढाई आदि को देखकर यह निर्णय लिया ।
खैर ! सह–सचिव के कार्यकाल को ५ साल पूरा होने के बाद कानूनतः हर व्यक्ति सचिव के लिए दावेदार होते हैं । ७ साल तक सह–सचिव रहने के कारण मैं भी सचिव के लिए दावेदार रहा । लेकिन मुझे देखकर बढुवा समिति ने हास्यास्पद निर्णय किया । जहां लिखा गया– ‘निज की योग्यता तो है, लेकिन सेवा परिवर्तन कर आने के कारण इस बार के लिए उन्हें उम्मीदवार नहीं माना जाएगा ।’ निर्णय समिति में रहनेवालों का कहना था कि इसके लिए कानून नहीं है । दूसरी बार भी मुझे सचिव नहीं बनाया गया । क्यों ? यही प्रश्न मैंने उर्मिला श्रेष्ठ से किया । श्रेष्ठ उस वक्त बढुवा समिति के अध्यक्ष तथा लोकसवा आयोग के सदस्य थीं । उन्होंने कहा– ‘भूल गयी ! अगली बार देखूंगी ।’
इस बीच में न्याय क्षेत्र में ही रहे दो मित्रों ने सेवा परिवर्तन के लिए प्रयास किया । वे लोग प्रवेश करने से पहले ही निजामती सेवा ऐन में संशोधन किया गया । जहां लिखा गया कि सेवा परिवर्तन कर आनेवाले व्यक्ति दो साल तक सचिव के उम्मीदवार नहीं हो सकते हैं । उक्त ऐन बनने से पहले ही मैं सह–सचिव हो गया था । कानूनी सिद्धान्त को मानते हैं तो उक्त ऐन मेरे ऊपर लागू नहीं हो सकता, लेकिन लागू किया गया । इसके लिए प्रशासनिक क्षेत्र में रहनेवाले मित्रों ने ही लॉबिङ किया । तत्कालीन मुख्य सचिव भोजराज घिमिरे ने मुझे यहां तक कहा कि आप का कार्य सम्पादन मूल्यांकन मुख्य सचिव ने किया ही नहीं, तो मैं आप को कैसे सचिव में बढ़ोत्तरी करूं ।
खैर ! दो साल बीत गए । उसके बाद मेरे दो मित्र पुनः न्याय सेवा परिवर्तन कर प्रशानिक क्षेत्र में प्रवेश करने की तैयारी में लगे । प्रशासन के मित्र लोग पुनः सक्रिय होने लगे और कहने लगे कि सेवा परिवर्तन कर आनेवालों को ५ साल के बाद ही बढ़ोत्तरी की जा सकती है । इसतरह २ वर्षीय अवधि को बढ़ाकर ५ साल बना दिया गया । मुझे लगता है कि सिर्फ मुझे ही देखकर इसतरह दो–दो बार निजामति सेवा ऐन में संशोधन किया गया है । इस तरह मेरी बढ़ोतरी रुक गई । इसके विरुद्ध मैंने बहुत जगहों पर कहा भी है, लेकिन सुनवाई नहीं हुई ।
बाद में जब सामान्य प्रशासन मन्त्री के रूप में पम्फा भुसाल आई तो उन से भी मैंने अपनी पीड़ा और अपने ऊपर हो रहे अन्याय को व्यक्त किया । उन्होंने कहा कि वह हर सम्भव न्याय दिलाने का प्रयास करेंगे । संयोग ही कहें, उनके ही कार्यकाल में मैं निमित्त सचिव बन गया । निमित्त तो बन गया, लेकिन सचिव नहीं बन पाया था । बाद में वि.सं. २०६६ साल में मुझे सचिव में बढ़ोत्तरी की गई । उस वक्त २२ सह–सचिव को सचिव में बढ़ोत्तरी की गई थी । उनमें से मैं प्रथम नम्बर पर था । निजामती सेवा ऐन में व्यवस्था है कि जिस जगहों में सीट खाली है, उसमें से योग्यता क्रम अनुसार उम्मीदवार अपने पसन्द का सीट (जगह) चयन कर सकता है । लेकिन मुझे लगा कि सचिव होकर इसतरह चुनाव करना ठीक नहीं है । उस समय रवीन्द्र श्रेष्ठ सामान्य प्रशासन मन्त्री और माधव घिमिरे मुख्य सचिव थे । उन लोगों ने मुझ से पूछा भी था– दिनेश जी, आप कहाँ पोष्टिङ चाहते हैं ? मैंने कहा– ‘ विभिन्न मन्त्रालयों में १३ सीट खाली है, उसमें से कोई भी एक जगह मिल जाएगा तो मेरे लिए ठीक है ।’ मैंने यह भी कहा था कि अगर कई दो सचिव है और उसमें से एक मुझसे सिनियर रहेंगे तो मैं जुनियर होकर रहने के लिए भी तैयार हूँ । और कहा कि अगर हो सकता है तो जहां एक ही सचिव हैं, वही मेरी पोष्टिंग कर दी जाए । उसके बाद मुख्यसचिव घिमिरे ने कहा– ‘आप की यही उदारता ही काफी है, हम भी अनुदार नहीं हो सकते । जहांं एक ही सचिव का सीट हैं, आपकी पोस्टिङ वही होगी ।’ उन लोगों ने कहा था कि मुझे श्रम तथा यातायात व्यवस्था मन्त्रालय में ही जिम्मेदारी दी जाएगी ।

लेकिन जब बाद में सचिवों की जिम्मेदारी का बँटवारा किया गया तो मैं आश्चर्यचकित हो गया । मुझे तो प्रशासन पुनर्संरचना आयोग में पोस्टिङ की गई थी । २२ नम्बर के सचिव को मन्त्रालय में जिम्मेदार दी गई थी, प्रथम नम्बर के सचिव होने के नाते भी मुझे अस्थायी आयोग में भेज दिया गया था । मुझे लगा कि इससे अधिक अन्याय तो क्या हो सकता है ? मैं मुख्यसचिव के पास पहुँचा और कहा– ‘मुख्यसचिव जी, आपने कहा था कि मेरे ऊपर कोई भी अन्याय नहीं होगा । लेकिन मेरी हालत देखिए । मैं इस्तीफा लेकर आया हूँ, मेरा इस्तीफा स्वीकृत किया जाए ।’ मुझे लग रहा था कि मुझे सचिव होना था, वह तो हो ही गया हूँ, अब नौकरी में नहीं रहूंगा । इसीलिए मैंने आगे कहा– ‘इसतरह के अन्याय को झेलकर मुझे नौकरी नहीं करनी है ।’ उसके बाद मुख्यसचिव अपनी बाध्यता सुनाने लगे । प्रधानमन्त्री के हस्तक्षेप से लेकर लम्बी–चौड़ी कहानियां सुनने को मिली । उस वक्त माधव कुमार नेपाल प्रधानमन्त्री थे । इतना होते हुए भी उन्होंने प्रतिबद्धता व्यक्त की– ‘आप को उस जगह में नहीं रखेंगे ।’ मैं प्रशासन पुनर्संरचना आयोग मेंं ही चला गया और हाजिरी किया । कुछ दिनों के बाद मीडिया में समाचार आने लगा कि यह तो अन्याय हो रहा है । क्योंकि मैं जहां था, वहां का कमरा भी बहुत छोटा था, सचिव और सह–सचिव को एक ही कमरे में रहना पड़ता था, कमरा और टेबल ही नहीं, ल्यापटॉप को भी शेयर कर हम लोग बैठ रहे थे । जब यह घटना चारों ओर चर्चा में आने लगी तो मुख्यसचिव माधव घिमिरे ने फिर पूछा– दिनेश जी, आप के लिए नेपाल ट्रस्ट कैसा रहेगा ?’ सुनने में आया कि मीडिया में समाचार आने के बाद प्रधानमन्त्री स्वयम् भी दबाव में पड़ गए थे । शुरु में तो मैंने कहा था– ‘तबादला के हिसाब से मैं नहीं जाऊगा ।’ लेकिन बाद वही पर पोस्टिङ होने के कारण मुझे नेपाल ट्रस्ट में जाना ही पड़ा और वहां १० महीना तक रहा । नेपाल ट्रस्ट में रहते वक्त भी कुछ काम किया है, जिससे मुझे सुखानुभूति होती है ।
सम्पूर्ण योग्यता होते हुए भी ५ साल तक प्रमोशन में अवरोध होना, १ नम्बर के सचिव होते हुए भी अस्थायी आयोग में मेरी पोस्टिङ होना, इसतरह की कई घटना नेपाल के प्रशासनतन्त्र में होती है, जो योग्य और ईमानदार कर्मचारियों के लिए ही दुःखद पक्ष है । इससे हमारे कर्मचारीतन्त्र के भीतर रहे विकृतियां उजागर होती है । इसतरह की विकृतियां के पीछे राजनीति मूल स्रोत है, कर्मचारीतन्त्र उसको बढ़ावा देती है ।

पछतावा नहीं
मैंने ऐसा कोई भी काम नहीं किया है, जिस को लेकर मुझे जीवन में पछताना पड़े । जिस काम से किसी को नुकसान नहीं पहुँचता, वह काम मैं करता हूँ । मैं पूर्ण रुप में आध्यात्मिक नहीं हूँ, लेकिन मन्दिर जाते वक्त सर झुकाता हूँ, जिससे मुझे शान्ति का अनुभव होता है । मैं जीवन को अवसर के रूप में लेता हूं । मैं मानता हूं कि जीवन को किस राह पर ले जाना है, वह खुद पर निर्भर होता है ।

सुख और शान्ति की अनुभूति
जीवन में सुख और शान्ति बनाए रखना मुश्किल है । इसके लिए आप जितना भी प्रयास करें, बाहरी दुनिया आप को सुख और शान्ति से जीने नहीं देगी । उदाहरण के लिए मेरे जीवन को ही देख सकते हैं, कई लोगों को लग सकता है कि मुझे सुख और शान्ति दोनों मिलनी चाहिए । क्योंकि मैं सेवा निवृत्त हूँ, सामान्य जीवन जी रहा हूँ । लेकिन मेरे मन में शान्ति नहीं है, चेतना की पीड़ा है । मुझे लगता है कि हर व्यक्ति के पास जो चेतना है, वही चेतना उसको चैन से जीने नहीं देगी ।
आप अपनी परिस्थिति देखते हैं, देश की राजनीति देखते हैं, देश की आर्थिक अवस्था देखते हैं, हमारे वादे, प्रतिबद्धता और क्रियाकलाप के बारे में मूल्यांकन करते हैं तो आप का मन उद्वेलित हो जाता है । जिस में आप प्रत्यक्ष संलग्न नहीं भी हो सकते हैं, तब भी आप के मन में एक घबराहट पैदा हो जाती है, उसी को मैं चेतना की पीड़ा मानता हूँ । मैं भी उसी चेतना प्रदत्त पीड़ा से गुजर रहा हूं । वही पीड़ा कभी कविता बनती है तो कभी गीत के माध्यम से अभिव्यक्त होता है । मुझे लगता है– साहित्य और संगीत वह ब्यूटी है, जो सभी के लिए हितकारी है, अगर किसी के लिए हितकारी नहीं है तो यह अहितकारी भी नहीं हो सकती ।
मैं अपने जीवन में सूखानुभूति करने के लिए अध्ययन करता हूं । अध्ययन कर फिर पीड़ा को जन्म देता हूँ । यह सब सुनकर आप को लगता होगा कि मैं निराशावादी व्यक्ति हूँ । लेकिन ऐसा नहीं है । मैं आशावादी व्यक्ति हूँ । लेकिन परिवर्तन के नाम में हमारे यहां जो विकृतियां दिखाई दे रही है, उसके प्रति मैं असन्तुष्ट हूँ । मैं मानता हूं कि देश में परिवर्तन लाना है तो राजनीति में परिवर्तन आवश्यक है । राजनीतिक वृत्त में राजनीति को नौकरी के तरह माननेवाली जो प्रवृत्ति है, उसका अन्त होना जरूरी है । राजनीति एक समाजसेवा है, जब तक इस भावनावाले व्यक्ति राजनीतिज्ञ नहीं बनेंगे, जब तक डबल–भत्ता और सुविधाओं के लिए राजनीति की जाती है, तब तक देश आगे बढ़नेवाला नहीं है ।

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