Fri. Jul 10th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें himalini-sahitya

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो : जाॅन एलिया

 

Image result for image of john elia

बेदिली ! क्या यूं ही दिन गुजर जाएंगे
सिर्फ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएंगे

जाॅन एलिया, शेर-ओ-शायरी, गजलों और नज्मों से जरा सा भी इत्तेफाक रखने वाले इंसान ने यह नाम न सुना हो, ऐसा शायद ही देखने को मिले। खुद की बर्बादी, इश्क़ में हार और अकेलेपन को इस शायर ने जिस अंदाज में कागज पर उतारा वैसा करने का फन शायद ही कहीं देखने को मिले। कलम में असर ऐसा कि उर्दू न समझने वाला आदमी भी शेर का पहला-दूसरा लफ्ज सुनते ही बता दे कि यह शेर जौन का है।

यादों का हिसाब रख रहा हूँ
सीने में अज़ाब रख रहा हूँ

यह भी पढें   मधेस आंदोलन: पहचान, संघीयता और नागरिक समानता की ऐतिहासिक क्रांति : कृष्णा सिंह

तुम कुछ कहे जाओ क्या कहूँ मैं
बस दिल में जवाब रख रहा हूँ

दामन में किए हैं जमा गिर्दाब
जेबों में हबाब रख रहा हूँ

आएगा वो नख़वती सो मैं भी
कमरे को ख़राब रख रहा हूँ

तुम पर मैं सहीफ़ा-हा-ए-कोहना
इक ताज़ा किताब रख रहा हूँ

14 दिसंबर 1941 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में जन्मे जौन ने जिंदगी भले ही पाकिस्तान और दुबई में गुजारी हो, लेकिन अपनी जमीन से उनकी मोहब्बत कभी कम नहीं हुई। दुनिया भर के मंचों पर शेर पढ़ते समय जॉन का अमरोहा और पाकिस्तान की गलियों का जिक्र करना इसी की एक निशानी है।

यह भी पढें   भारत विकास परिषद के 64वें स्थापना दिवस पर गोष्ठी एवं वृहद वृक्षारोपण

उर्दू के बागबां में यूं तो कई फूल खिले, लेकिन वो फूल जो आज भी उर्दू की बगिया को महका रहा है उसका नाम है जौन एलिया। हिंदुस्तान और पाकिस्तान की जमीं पर जन्मे कई शायर हैं जिन्होंने दोनों मुल्कों से मोहब्बत पाई। जौन को उन शायरों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर रखा जाना गलत नहीं होगा। 14 साल की उम्र में हिंदुस्तान से पाकिस्तान गए जौन के दिल में विभाजन की टीस हमेशा रही…

वो शै जो सिर्फ हिंदुस्तान की थी
वो पाकिस्तान लाई जा रही है

अपने छोड़े हुए मुहल्लों पर
रहा दौरान-ए-जांकनी कब तक
नहीं मालूम मेरे आने पर
उसके कूचे में लू चली कब तक

यह भी पढें   बर्ड फ्लू –काठमांडू और काभ्रेपलाञ्चोक में अभी भी खतरा

 

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो

तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और इतने ही बेमुरव्वत हो

तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो

है मेरी आरज़ू के मेरे सिवा
तुम्हें सब शायरों से वहशत हो

किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो

किसलिए देखते हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो

दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *