Wed. Oct 23rd, 2019

मैं उस वक्त जिस दुकान में जाकर १० हजार रुपयों की साडि़यां मांग करता था, उसी दुकान के मालिक मुझे १ लाख भारतीय रुपया बराबर की साडि़यां उधार में देते थे । मेरे प्रति उन का यह विश्वास मैंने कभी टूटने नहीं दिया, मेरी सफलता के पीछे यह भी एक राज है

हिमालिनी, अंक मार्च 2019 | एक सामान्य ग्रामीण परिवार में रहनेवाला एक युवा सरकारी स्कूल में अध्ययन करते वक्त डाक्टर बनने का सपना देखता है, लेकिन जब वही युवा कैंपस में जाता है तो पता चलता हैं कि उसकी आर्थिक हैसियत डाक्टरी पढ़ने की नहीं है । उसके बाद वह सोचता है कि मैं भी अब अपने पिता जी की तरह अपने ही गाँव में शिक्षक बन जाता हूं । पर्सा जिला स्थित तत्कालीन सुर्जहा गाविस–२ मनिकपुर से वीरगंज स्थित ठाकुरराम कैंपस में साइकिल से आनेवाला वही युवा कभी सोचता है– नहीं, मैं तो पॉलटिसियन बनूंगा । इसी सोच के साथ वह कैंपस जीवन में विद्यार्थी राजनीति भी ज्वाइन करता है । लेकिन पारिवारिक आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर होती है कि वह अपने मन के सारे सपने को भूलकर एक उद्योगपति के सलाह के अनुसार ५ हजार रुपया लेकर व्यवसायिक जीवन में प्रवेश करता है । उसी ५ हजार से शुरु उनका व्यवसाय आज करोड़ों का हो चुका है । आर्थिक अभाव के कारण डाक्टर पढ़ने में असमर्थ एक युवा आज सफल युवा व्यवसायी के रूप में जाना जाता है, हां, उनका नाम है– रूपेश पाण्डे । उनका जन्म वि.सं. २०३३ साल आश्विन १० गते साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ था । उनके पिता जी का नाम वृजमोहन पाण्डे और माता जी का नाम लीलावतीदेवी पाण्डे हैं । पिता सरकारी शिक्षक थे । इसीलिए जब डाक्टर बनने की सम्भावना नहीं रही, तब उन्होंने भी अपने पिता जी की तरह ही शिक्षक बनने की ठान ली थी ।

 

Rupesh pandey
रूपेश पाण्डे

रूपेश जी ने अपने ही गांव में रहे नेपाल राष्ट्रीय प्राथमिक विद्यालय मनिकपुर से औपचारिक अध्ययन शुरु किया । उसी स्कूल से उन्होंने कक्षा ५ उत्तीर्ण किया और माध्यमिक शिक्षा के लिए वह पकहा मैनपुर हाईस्कुल में भर्ती हो गए । जहां से उन्होंने एसएलसी पास किया । उसके बाद उन्हाेंंने ठान लिया था कि मुझे डाक्टर बनना है । इसीलिए वह वीरगंज स्थित ठाकुर राम कैंपस में भर्ती हो गए और आईएसी की । उसके बाद भी उनको लगा कि डाक्टर बनने के लिए तो ढेर सारे पैसों की जरूरत है ।
रूपेश को सुनने में आया कि एमबीबीएस अध्ययन के लिए भारतीय दूतावास से कुछ आर्थिक सहयोग तथा स्कॉलरशिप मिल सकती है । इसके बारे में राजदूतावास में कुछ बातचीत भी हो रही थी, लेकिन उनकी पारिवारिक आर्थिक हैसियत इतनी कमजोर थी कि रूपेश जी को लगा– कैंपस के लिए आवश्यक मासिक शुल्क निःशुल्क होने के बाद भी मैं डाक्टर नहीं पढ़ पाऊंगा । क्योंकि घर से भारत में जाकर एमबीबीएस भर्ती होने के लिए आवश्यक न्यूनतम खर्च भी उनके पास नहीं था । पिता जी पाँच भाई थे । सभी की हालात वैसी ही थी । इसीलिए उन्होंने आईएसी करने के बाद ठाकुरराम बहुमुखी कैंपस से ही बीएड (बैंचलर) किया । बाद में भारत से बीए किया अर्थात् दो विषयों में उन्होंने बैचलर किया और शिक्षक बनने के लिए तैयारी करने लगे ।

एक सामान्य परिवार में पले–बढ़े और साधारण सरकारी स्कूल में पढ़नेवाले व्यक्ति को बिजनेश में जो सफलता आज मिली है, उससे बड़ी सफलता और क्या हो सकती है
उस समय रुपेश के पिता जी वृजमोहन पाण्डे रानीगंज निमावि में हेडमास्टर हो चुके थे । जिला शिक्षा कार्यालय पर्सा ने कुछ शिक्षकों के लिए भ्याकेन्सी निकाली थी । इसीलिए रुपेश ने ठान लिया कि पिता जी शिक्षक हैं तो मैं भी शिक्षक ही बन जाता हूं, स्कूल के अलावा ट्युसन भी पढ़ाऊंगा और सामान्य जीवन ही जी लूंगा । इसी सोच के साथ उन्होंने परीषा दी, पास किया । तत्कालीन पर्सा जिला शिक्षा अधिकारी ने रुपेश जी को एक सिफारिश पत्र लिखते हुए कहा कि जाइए आप पकहा मैनपुर हाइस्कुल में जाकर पढ़ाने का काम करें । रुपेश कहते हैं– ‘उसी स्कूल से मैंने एसएलसी किया था, यह तो मेरे लिए खुशी की बात थी ।’ लेकिन नियुक्ति नहीं हुई थी, सिर्फ सिफारिश मिली थी । यह वि.सं. २०५३ साल कार्तिक १० गते की बात है ।

शिक्षक की नौकरी छोड़कर व्यवसाय
जब शिक्षक की नौकरी तय हुई तो रुपेश के मन में एक तूफान आया और सोचने लगा कि क्या शिक्षक की नौकरी करने से मेरा जीवन सहज बन सकता है ? ऐसी ही अवस्था में उनकी मुलाकात वीरगंज निवासी और नेपाल के लिए ही एक प्रतिष्ठित उद्योगपति से हो गया, जो उनके पिता जी से भी करीब थे । पिता जी ने उनको पढ़ाया भी था, जो रुपेश को अपने पुत्र की तरह व्यवहार करते थे । उन्होंने ने ही रुपेश को कहा–‘तुम नौकरी नहीं, व्यवसाय शुरु करो ।’
लेकिन व्यापार–व्यवसाय के लिए भी पैसा ही आवश्यक था, जो उनके पास नहीं था । स्वतन्त्र व्यवसाय के बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था । क्योंकि पारिवारिक पृष्ठभूमि भी ऐसी नहीं थी । लेकिन पिता समान उल्लेखित उद्योगपति (जिसका नाम रुपेश जी लेना नहीं चाहते हैं) ने कहा कि मैं कुछ आइडिया देता हूं, उसके अनुसार काम करो, तुम अवश्य सफल हो जाओगे । उन्होंने भी रुपेश को कहा– ‘अगर तुम शिक्षक की नौकरी करते हो तो मासिक सिर्फ ४ हजार कमाओगे । उससे क्या होता है ? तुमारी पारिवारिक अवस्था उससे सुधरनेवाली नहीं है । इसीलिए तुम व्यापार करो ।’ रूपेश ने उनकी बात मान ली ।
उनके ही सुझाव के अनुसार ५ हजार रूपया साथ में लेकर रूपेश जी साइकिल के साथ रक्सौल (भारत) की ओर चल पड़े, जिससे उन्होंने साड़ी और कुर्ता खरीद लिया और नेपाल में लाकर बिक्री–वितरण शुरु किया । यह वि.सं. २०५४ साल की बात है । जो नियमित चलता रहा । जो रुपेश के लिए जीवन का एक अलग ही रास्ता बना रहा था ।
इसी व्यवसाय से रूपेश जी आज साल में ३५ से ४० करोड़ का टॉर्नओभर करते हैं । वह आगे कहते हैं– ‘सड़क से ऊपर उठकर यहां तक आने के लिए मैंने जो संघर्ष और दुःख किया, वह शब्द में व्यक्त नहीं हो सकता ।’ उनका मानना है कि सकारात्मक मानसिकता और दृष्टिकोण लेकर मौलिक योजना के साथ काम करते हैं तो सफलता अवश्य ही मिल सकती है । इसके लिए रुपेश आज खुद एक उदाहरणीय पात्र बन चुके हैं ।
इतना ही नहीं, लोगों को विश्वास दिलाना और दिल जीतना भी सफलता के लिए एक महत्वपूर्ण पक्ष मानते हैं रुपेश जी । वह आगे कहते हैं– ‘मैं उस वक्त जिस दुकान में जाकर १० हजार रुपयों की साडि़यां मांग करता था, उसी दुकान के मालिक मुझे १ लाख भारतीय रुपया बराबर की साडि़यां उधार में देते थे । मेरे प्रति उन का यह विश्वास मैंने कभी टूटने नहीं दिया, मेरी सफलता के पीछे यह भी एक राज है ।’
सारी–कुर्ता के अलावा आज उन्होंने फुड आइटम (खाद्यान्न) का व्यापार भी शुरु किया हैं । रुपेश जी कहते हैं कि आज उनके साथ २९ अन्तर्राष्ट्रीय ब्राण्ड का चावल, तेल, दाल आदि फूड आइटम (खाद्यान्न) का होलसेल दुकान है और साड़ी–कुर्ता का व्यापारी भी जारी ही है । इतनी बड़ी सफलता के पीछे राज क्या है । रुपेश जी सिर्फ एक ही सेन्टेन्स कहते हैं– ‘सकारात्मक सोच, योजना और परिश्रम । वह मानते हैं कि इसके अलावा काम करने की मौलिक तकनीकी भी होनी चाहिए । उन्होंने कहा– ‘जो भी काम और व्यवसाय करें, कभी भी किसी का नकल नहीं करना चाहिए । अपनी ही मौलिक सोच, प्लान और विजन के अनुसार परिश्रम करते हैं, तो सफलता दूर की बात नहीं है ।’ हां, वह आगे कहते हैं कि आप कौन–सी काम करने जा रहे हैं, उसके बारे में काम शुरु करने से पहले गहन अध्ययन जरुर करना चाहिए ।

जब बेटी का आगमन हुआ..
आपके व्यवसाय में गुणात्मक सफलता कब से मिलने लगी ? इस प्रश्न के जबाव में रुपेश जी कहते हैं– ‘जब मेरे परिवार में बेटी का आगमन हुआ, उसी समय से ।’ हां, उन्होंने वि.सं. २०६० साल वैशाख में शादी की, ०६२ साल में बेटी का जन्म हुआ । उससे पहले ही रुपेश जी को एक ज्योतिष ने कहा था कि आपकी प्रथम सन्तान बेटी ही होगी, उसके बाद आप उस ऊँचाई पर पहुँच जाएंगे, जो आपने सोचा ही नहीं है । हां, लगभग ऐसा ही हुआ है । रुपेश जी को मानना है कि बेटी पैदा होने के बाद उनके व्यँपार–व्यवसाय में गुणात्मक वृद्धि हो गई, कहीं भी घाटे का कारोबार करना नहीं पड़ा । रुपेश जी कहते हैं– ‘एक सामान्य परिवार में पले–बढ़े और साधारण सरकारी स्कूल में पढ़नेवाले व्यक्ति को बिजनेश में जो सफलता आज मिली है, उससे बड़ी सफलता और क्या हो सकती है ?’

हर दिन पूजापाठ
उद्योग वाणिज्य संघ, चेम्बर आफ कमर्स, विभिन्न मठ–मन्दिर तथा सामाजिक संघ–संस्थाओं में आबद्ध होकर सामाजिक कामों में भी सक्रिय रुपेश जी व्यस्त जीवन जीते हैं । सुबह ७ः३० बजे ही वह अपने आफिस पहुँचते हैं । लेकिन हर दिन पूजापाठ करते हैं । रुपेश जी कहते हैं– ‘पूजापाठ किए बिना मैं पानी भी नहीं पीता हूँ ।’ उनके अनुसार हर मंगलबार उनका ‘फास्टिङ डे’ है, जो विगत १७ साल से जारी है । अगर वह काठमांडू में हैं तो हर दिन सुबह वो कमलादी में जाकर पूजा करते हैं । सामान्यतः सुबह ६ः३० बजे ही वह अपने आफिस (न्यूरोड) के लिए निकलते हैं और कमलादी में जाकर कम से कम २० मिनट पूजा करते हैं । सुबह ४ः३० बजे से रुपेश जी का नित्यकर्म शुरु होता है । वह आगे कहते हैं– ‘सुबह की पूजापाठ मैं करता हूं और शाम की पूजापाठ मेरी मां करती है ।’

राजनीतिक निकटता
रुपेश जी कहते हैं कि आज वह सभी पार्टी के प्रायः सभी नेताओं के साथ निकट सम्बन्ध रखते हैं । वैसे तो भविष्य में राजनीतिक करने की सोच भी उनके अन्दर है । लेकिन उससे पहले वह अपने व्यापार–व्यवसाय को एक अंजाम देना चाहते हैं । कब से राजनीति में आने के लिए सोच रहे हैं ? इस प्रश्न के जबाव में वह कहते हैं कि कम से कम ५ साल के बाद । उनका मानना है कि राजनीति पेट भरने का साधन नहीं होना चाहिए । इसके लिए वह खुद उदाहरण बनना भी चाहते हैं ।
रुपेश जी के योजना अनुसार राजनीति शुरु करने से पहले वह अपने ही गांव, क्षेत्र और जिला में कुछ करना चाहते हैं । विशेषतः शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कुछ सकारात्मक परिवर्तन उनकी चाहत है । रुपेश जी का मानना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चेतना के अभाव के कारण ही गांव अविकसित हैं । वह आगे कहते हैं– ‘आज भी मैं गांव जाता हूं तो देखता हूं कि कई बच्चे स्कूल जाने के बदले सड़क के किनारे खेल रहे होते हैं । ऐसे बच्चों के अभिभावक से मिलकर उनको स्कूल भेजने के लिए कहता हूं । अगर किसी के पास पैसा नहीं है तो ५–१० रुपया देकर भी स्कूल भेजने के लिए आग्रह करता हूं ।’

मधेश में राजनीतिक खेती
रुपेश जी का मानना है कि गजेन्द्र नारायण सिंह के बाद तराई–मधेश में कोई भी ऐसा नेता और पार्टी नहीं है, जो सच में ही मधेश की भूमि और जनता के लिए चिन्तित है । उन्होंने कहा कि यहां तो मधेश के नाम में कुर्सी की चिन्ता करनेवाले हैं । उन्हाेंने दावा किया कि मधेशवादी पार्टी द्वारा उठाए गए मुद्दों में से सिर्फ २० प्रतिशत ही आम जनता और मधेश भूमि से सरोकार रखता है, बांकी ८० प्रतिशत मुद्दा नेताओं की ‘राजनीतिक खेती’ के लिए है । रुपेश जी आगे कहते हैं– ‘गांव के बच्चे स्कूल जाते हैं कि नहीं ? बेटी क्यों स्कूल नहीं जा रही है ? युवाओं के लिए रोजगारी है कि नहीं ? जनता के घर में खाने के लिए कुछ है कि नहीं ? गांव–समाज में दहेज प्रथा क्यों व्याप्त है ? डायन के आरोप में महिला क्यों प्रताडि़त हो रही है ? इसके बारे में मधेशी नेताओं को मतलब नहीं है । लेकिन किस तरह का भाषण करने से ज्यादा वोट बटोर सकते है, कुर्सी मिल सकती है, उन लोगों की प्राथमिकता इसी में होती है ।’ उन्होंने कहा कि मेची से महाकाली तक तराई भू–भाग में जन्म लेकर रहनेवाले हर कोई मधेशी हैं । उन्होंने कहा– ‘चाहे वह पोखरेल हो कि जोशी, श्रेष्ठ हो या खरेल, अथवा यादव, झा,ठाकुर हो या चौधरी, सभी मधेशी हैं । लेकिन हमारे नेता लोग इन लोगों को विभाजित कर राजनीति करते हैं, ताकि उन लोगों को कुर्सी मिल सके ।’ उन्होंने कहा कि आज वैदेशिक रोजगारी (खाडी मुल्कों) में जानेवाले अधिकांश युवा तराई–मधेश से हैं, मधेश में ही कृषियोग्य जमीन खाली पड़ रही है । शिक्षा, रोजगारी और औद्योगिक वातावरण नहीं है । रुपेश जी ने आगे कहा– ‘अब उसके लिए राजनीति होनी चाहिए । कुर्सी और नेताओं की पेट भरने के लिए नहीं ।’

नेपाल में कम्युनिष्ट नहीं है
कई लोगों को मानना है कि नेपाल में कम्युनिष्ट शासन है, इसीलिए यहां निजी व्यापार–व्यवसाय को बढ़ोत्तरी नहीं दी जाएगी । लेकिन रुपेश जी का कहना है कि यह गलत हैं । वह आगे कहते हैं– ‘नेपाल में कम्युनिष्ट नाम के पार्टी तो है, लेकिन उनका चरित्र परम्परागत कम्युनिष्ट की तरह नहीं है, जिसको हम लोग कम्युनिष्ट नेता के रूप में जानते हैं, वे सब प्रजातान्त्रिक अभ्यास से ही सत्ता में स्थापित हुए हैं ।’ उनका मानना है कि नेपाल में व्यवसाय करने के लिए कोई भी परेशानी नहीं है । विश्व के ४३ देशों का भ्रमण करनेवाले रुपेशी जी का मानना है कि नेपाल विश्व जगत में ही अति सुन्दर देश है और व्यवसाय के लिए खुला वातावरण भी है । वह आगे कहते हैं– ‘कुछ लोगों का मानना है कि कम्युनिष्ट लोग उद्योगपति के विरोधी होते हैं, ऐसी गलत मानसिकता को अब तत्काल निकाल कर फेंक देना चाहिए । नेपाल में सत्ताधारी जो भी कम्युनिष्ट नाम की पार्टियां हैं, वह प्रजातान्त्रिक हैं ।’ उन्होंने कहा कि नेपाल में कम्युनिष्ट पार्टी की ओर से ४ अर्थ मन्त्री हो चुके हैं और उनके द्वारा प्रस्तुत बजट ही सबसे उत्कृष्ट साबित होता आ रहा है ।

समृद्ध नेपाल निर्माण के लिए…
व्यवसायी रुपेश का मानना है तीव्रतर आर्थिक विकास हासिल करने के लिए नेपाल में वैदेशिक निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए, उसके लिए नीतिगत और राजनीतिक वातावरण निर्माण होना आवश्यक है । उन्हाेंने कहा कि वैदेशिक निवेश के बिना नेपाल समृद्ध राष्ट्र नहीं बन सकता । वह कहते हैं कि समृद्धि के लिए सड़क तथा सहज यातायात सुविधा लगायत का पूर्वाधार निर्माण होना चाहिए । लेकिन नेपाल में जो बैंकिङ लोन है, उसमें रुपेश जी असन्तुष्ट हैं । उनका कहना है कि व्यवसाय करने के लिए नेपाल का बैंक सहज नहीं है, ब्याजदर में होनेवाला अनपेक्षित वृद्धि के कारण व्यवसायी लोग मार में पड़ रहे हैं । उनका मानना है कि विश्व में कई भी जाए, बैंक के चेयरमैन के लिए एक निश्चित योग्यता निर्धारित होती है, लेकिन नेपाल में नहीं है । उन्होंने आगे कहा– ‘अगर सरकार और राष्ट्र बैंक की ओर से बैंक सञ्चालक एवं चेयरमैन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मापदण्ड के अनुसार योग्यता निर्धारण किया जाता है तो सब आप से आप ठिकाने में आ जाएंगे ।’ उनका यह भी कहना है कि नेपाल में अधिक में ५ से १० बैंकों का होना ही काफी हैं ।
– हिमालिनी से हुई बातचीत के आधार पर

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