Thu. Oct 24th, 2019

हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए, कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए : शकील आजमी

आज आँखों में कोई रात गए आएगा

आज की रात ये दरवाज़ा खुला रहने दे

 

अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी खड़े रहना भी

कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़े रहना भी

 

बात से बात की गहराई चली जाती है

झूट जाए तो सच्चाई चली जाती है

 

बस इक पुकार पे दरवाज़ा खोल देते हैं

ज़रा सा सब्र भी इन आँसुओं से होता नहीं

 

भूक में इश्क़ की तहज़ीब भी मर जाती है

चाँद आकाश पे थाली की तरह लगता है

 

बिछड़ के भी वो मिरे साथ ही रहा हर दम

सफ़र के बा’द भी मैं रेल में सवार रहा

 

घर के दीवार-ओ-दर पे शाम ही से

नज़्म लिखता हुआ है सन्नाटा

 

हादसे शहर का दस्तूर बने जाते हैं

अब यहाँ साया-ए-दीवार ढूँढें कोई

 

इस बार उस की आँखों में इतने सवाल थे

मैं भी सवाल बन के सवालों में रह गया

 

हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए

कुछ हुनर चाहिए बाज़ार में रहने के लिए

 

जब तलक उस ने हम से बातें कीं

जैसे फूलों के दरमियान थे हम

 

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