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पशुओं में अभागन हम : सरस्वती शर्मा सुबेदी

 

कविता : सरस्वती शर्मा सुबेदी

पशुओं में अभागन हम

किसने समझा हमारा गम

तरह तरह के ठोकर खाए

दिन दहाडे सडको मे

गाडियों से कुचले जाएँ

दूध के लिए पाला

बुढी हुई तो रास्ते में फेक

दिया

द्धापर युग मे कृष्ण ने

गाय को अपना सखी बनाया

कलयुग में

हमको रास्ते मे छोड दिया

पशुओं में अभागन हम

किसने समझा हमारा गम

एक बूँद पानी नसीब नहीं

काले अलकतरे सडको पे

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आग लगाकर जीते है हम

प्यासे अपने दिलो पे

मतलबी हजारौ यहाँ

सिर्फ हमारे दूध के लिए

अशक्त हुई तो छोड दिया

सडको में भटकने के लिए

लोगों को बेटा चाहिए

गाय के बछडों को

रास्ते मे फेंक दिया

छोटे नन्हे बछडो को

काले अन्धेरे रातो मे

कुत्ते ने नोच लिया

पशुओं मे अभागन हम

किसने समझा हमारा गम

दया नही प्रेम नही

हमारा अपना कोई नही

लाठियों से मारा पीटा

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लोगों ने खुब दर्द दिया

बाघो ने हमे नोच लिया

अधमरा बनाकर

वन मे छोड दिया

खूब नसीब लिखाकर लाए

गाय होकर जनम लिए

तिहार मे पूजन हमारी

फिर क्यो सडको पे अश्रु

बहाएँ

लोगें के इस व्यवहार से

हम भटककर जीते हैं

अपने खुद के सीने में

आग जलाकर जिन्दा है

पशुओं मं अभागन हम

किसने समझा हमारा गम

हर पशु का जन्म हो

गाय का जन्म कभी न हो

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हिन्दू धर्म ग्रन्थो में

उँचा रखा गाय का नाम

लोगें के दिल के दरबाजे

हमारे लिए बन्द क्यो ?

लाचार हो गए हम

सडको मे फिरते फिरते

लोगों के साथ टूटे रिश्ते

छोटे नन्हे बछडे मर रहे

हम सब तडप तडप के

पशुओं मे अभागन हम

किसने समझा हमारा गम

सरस्वती शर्मा सुबेदी शीर्षक

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