आधुनिकता व नारी के बदलते तेवर : डॉ• मुक्ता,
मार्च के शुरुआत के साथ ही शुरु हाे जाता है विश्व नारी दिवस सप्ताह । इसी अवसर पर पढिए आधुनिकता व नारी के बदलते तेवर राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित वरिष्ठ लेखिका डॉ• मुक्ता, का एक सम सामयिक आलेख
इक्कीसवीं सदी का प्रभाव सर्वत्र दृष्टिगोचर है। सारा विश्वग्लोबल विलेज बन गया है। जीवन के हर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धात्मकता के कारण मानव कम से कम समय में अधिकाधिक धन कमाकर, सुखी व समृद्ध बन जाना चाहता है। इस कारण वह आत्म- केंद्रित होता जा रहा है, जिसके परिणाम-स्वरूप संवादहीनता की स्थिति पनप रही है, जो संवेदन- शून्यता की जनक है। इसका सबसे अधिक खामियाज़ा परिवार में बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवार-व्यवस्था काबिज़ है, जिसके कारण पति-पत्नी में अलगाव की स्थिति, अजनबीपन का अहसास, अस्वीकार्यता-बोध व अहंनिष्ठता का भाव तेज़ी से पांव पसार रहा है, जिसके कारण परिवार टूट रहे हैं। बच्चों में निहित असुरक्षा का भाव उन्हें निपट स्वार्थी बना रहा है। रिश्तों की अहमियत अब रही नहीं… सम्मान व समर्पण का अभाव जीवन में खलता है और एक छत के नीचे रहते हुए पति-पत्नी और बच्चों में कोई तादातम्य नहीं… उन्हें किसी से कोई सरोकार नहीं।
नारी परिवार की धुरी होती है। वह शक्ति-स्वरूपा है। वह एक ऐसा सूत्र है, जिसमें मनकों अर्थात् विभिन्न मनोवृत्ति वाले लोगों को बांध कर रखने की क्षमता होती है। वह दैवीय गुणों स्नेह, करुणा, प्रेम, सौहार्द, त्याग, सहानुभूति, ममता आदि का पुंज है।वह बच्चों में सत्संस्कारों का चिंतन कर, उन्हें पूर्ण मानव बना सकती है, क्योंकि घर बच्चों की प्रथम पाठशाला व मां उनकी प्रथम गुरू होती है।
परन्तु आधुनिक नारी अपने कार्यक्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ना चाहती है,जिसके लिए वह अपने पति-परिवार व बच्चों की खुशियों तक को होम करने में तनिक भी संकोच नहीं करती। आजकल तो परिवार की परिभाषा ही बदल गई है और वह पति-पत्नी व बच्चों तक सिमट कर रह गया है। समानता बोध के कारण उसके सम्मुख पति की भावनाओं व खुशियों का कोई मूल्य नहीं…वह बच्चों तक को भौतिक विकास में बाधक समझती है। सो! हम दो, हमारा एक का प्रचलन भी लुप्त होता जा रहा है। लिव-इन रिलेशन का बढ़ता प्रचलन, पारिवारिक सामंजस्य की जड़ों को खोखला कर रहा है। उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के कारण ‘खाओ-पीओ, मौज उड़ाओ’ ‘और ‘तू नहीं और सही’ का प्रचलन दिन-प्रतिदिन अब सुरसा के मुख की भांति बढ़ता जा रहा है तथा इसके परिणाम स्वरूप परिवार टूट रहे हैं। टी• वी• व मीडिया से जुड़ाव के कारण बच्चे अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। अक्सर समृद्ध परिवारों के बच्चे बलात्कार, हत्या, चोरी, डकैती, फ़िरौती, अपहरण आदि के जुर्म में पकड़े जा रहे हैं, जिसके कारण माता-पिता को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। ऐसी विषम परिस्थिति में पति-पत्नी के पास एक-दूसरे पर दोषा- रोपण कर, अपने दायित्व से पल्ला झाड़ लेने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं होता।
आधुनिक नारी सभी पारिवारिक व सामाजिक बंधनों को तोड़, मर्यादा को दरक़िनार कर निकल पड़ी है, उन राहों पर,जो विनाश की ओर अग्रसर हैं। वह पति पति व उसके परिवारजनों को प्रताड़ित कर, उन्हें जेल की सीखचों के पार पहुंचाने का दम्भ भरती है और चंद महिलाओं ने तो इसे अपना पेशा बना लिया है। वे पैसे के लिए संबंध स्थापित करती हैं… यहां तक कि देह-प्रदर्शन में भी वे तनिक भी संकोच नहीं करतीं। वे निरंकुश होकर जीना चाहती हैं। क्लबों व पार्टियों में शराब के पैग लगाना, पर-पुरुष की बाहों में झूल जाना… उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया है। सिगरेट के क़श लगाना, जुआ खेलना आदि उन के सामान्य शौक हैं। वे स्वयं को पुरुष से किसी भी रूप में कम नहीं आंकतीं तथा भारतीय संस्कृति को तज निरंकुश जीवन जीना चाहती हैं…सदियों पुरानी गुलामी की बेड़ियों को तोड़, वे हर क्षण का उपभोग कर लेना चाहती हैं।
आजकल चोरी-डकैती, हत्या अपहरण फ़िरौती व दूसरों पर अकारण देह शोषण के आरोप लगा पैसा ऐंठना,उसके शौक बन गए हैं। शरीर पर घटते वस्त्र धारण कर वह सौंदर्य प्रदर्शित करने में भी वे लेश- मात्र संकोच नहीं करती, बल्कि गर्व का अनुभव करती हैं।
आजकल समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति सजग है। शायद वह भूल जाता है कि अधिकार व कर्त्तव्य अन्योन्याश्रित हैं। दूसरे पक्ष के कर्त्तव्य ही हमारे अधिकार का जनक हैं। सो! हमें अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। जिस दिन हममें यह दायित्व बोध जागृत हो जाएगा, समाज से वैषम्य व विसंगतियों का अंत हो जाएगा और समरसता का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। हमें सदैव इस तथ्य से अवगत रहना चाहिए कि जो भी अधिक सुख-सुविधाएं मिल रही हैं, वे दूसरों के अधिकार-हनन का प्रतिफल हैं। काश! नारी अपने कर्त्तव्य-दायित्व बोध के प्रति सजग रहती, तो समाज का उत्तरोत्तर पतन न होता और संबंधों की गरिमा स्थायी रहती…परिवार-व्यवस्था चरमराती नहीं और सब को यथोचित स्वीकार्यता व सम्मान प्राप्त होता। बच्चों का सर्वांगीण विकास होता और वे आधे-अधूरे इंसान न बनते…सुसंस्कारों से सिंचित कर्त्तव्यनिष्ठ, दूसरों की अहमियत को स्वीकारने वाले, सर्वगुण- सम्पन्न, सफल मानव के रूप में विकसित होते।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में… प्रसाद जी के उक्त कथन में जीवन का सार निहित है। नारी जहां नारायणी है, वहीं उसमें दुर्गा व काली की शक्तियां भी संचित है। वह विपत्ति के समय काली का रूप धारण कर, शत्रुओं का मर्दन कर सकती है। मां के रूप में वह आराध्या है, पत्नी के रूप में संगिनी है, पथ-प्रदर्शिनी है, बहन के रूप में मधुवर्षिणी है और बेटी के रूप में वह अनमोल रत्न है, जिसके आभामंडल से पूरा घर-परिवार सदैव आलोकित रहता है।नारी प्रकृति का वह सुंदर तोहफ़ा है, जो सबके जीवन में खुशियां संचरित करती है,आनंद की वर्षा करती है, दु:ख में धैर्य बंधाती है, कांटो भरी राह पर साथ चलने में गुरेज़ नहीं करती। भगवान के बाद यदि कोई सबका मंगल चाहता है,तो वह नारी है, जिसका अंतर्मन सदैव सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् के भावों से आप्लावित रहता है।
सो! नारी के बदलते तेवर पर दृष्टिपात करने के पश्चात् हमारे सम्मुख अमुक बिंदु उभर कर आते हैं… बरसों से आधी आबादी के अधिकारों का हनन, जिसके कारण वह शोषित रही, पुरुष के ज़ुल्म सहन करती रही और 21वीं सदी में समानता का अधिकार मिलने के पश्चात् वह उछृंखल हो गई, मर्यादा की सीमाओं को लांघ वह गलत राहों पर चल निकली, जिसके कारण उसे अप्रत्याशित बाधाओं-विपत्तियों का सामना करना पड़ा।
परन्तु सामाजिक विश्रंखलता के कारण उसे अपनी संस्कृति की ओर लौटना होगा, अपने भीतर दैवीय गुणों को पुन: रोपित करना होगा ताकि समाज व जीवन में समरसता लौट सके…स्वस्थ-सुंदर समाज का विकास हो सके और घर-परिवार रूपी संस्था पुन:जीवित हो सके। नारी ही इस दायित्व को बखूबी वहन कर सकती है।हमें जर्जर होती संस्कृति व जीवन-मूल्यों की अवधारणा का पुन: मूल्यांकन करना करना होगा क्योंकि यह हमारे जीवन-रक्षक हैं… संजीवनी हैं। इनके अस्तित्वहीन अथवा नदारद होने के कारण मानव मानसिक यंत्रणा झेल रहा है और जीवन में त्रिशंकु सम उथल-पुथल से नहीं बच पा रहा। हमें अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति की ओर लौटना होगा। टूटते-बिखरते मानव-मूल्यों को एक माला में पिरो कर,जीवन में धारण करना होगा ताकि हम सामान्य जीवन जी सकें, समाज में अपना रुतबा कायम कर सकें, जो अपरिहार्य परिस्थितियों में हमारे हाथों से छूट चुका है। हमें आधुनिकता का वरण करना है, परंतु अपने अतीत की अच्छी बातों के महत्व को स्वीकारते हुए उसे अपनाना है… प्राचीन समझ कर नकारना-त्यागना नहीं। हमें उदार हृदय से भूत व वर्तमान में सामंजस्य स्थापित करते हुए अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना है, सुख-दु:ख, खुशी-ग़म से ऊपर उठना है…यही सफल जीवन का मूल है। नारी ही जीवन में ज्ञान व कर्म का समन्वय कर समरसता स्थापित कर सकती है, आदर्शों को पुन: जीवित कर, धरा को स्वर्ग बनाने का सामर्थ्य रखती है।
अंततः यह बताते हुए मुझे गर्वानुभूति हो रही है कि बौद्ध व जैन धर्म में ‘अहिंसा परमोधर्म:’ के स्वीकार्य- बोध के कारण ऐसी दिल दहलाने वाली असामान्य घटनाएं नहीं हो रहीं। प्राणी-मात्र के प्रति संवेदन- शीलता, मानव-मात्र के प्रति करुणा व मैत्री भाव और मौन रहकर आत्मचिंतन की प्रवृत्ति उन्हें सामान्य मानव इतर संपूर्ण मानव की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है और वह स्व-पर व राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। पति-पत्नी अपनी दिनचर्या का पालन करते हुए बच्चों को सुसंस्कारों से पल्लवित करते हैं और सृष्टि के प्रत्येक मानव को स्नेह, प्रेम, करुणा, मैत्री सौहार्द, प्यार, सहानुभूति, सहनशीलता आदि दैवीय गुणों को अपनाने का संदेश देते हैं।
सीमित साधनों द्वारा असीमित इच्छाओं की पूर्ति करना असंभव है। सो! हम अपने मन पर अंकुश लगाकर स्वस्थ समाज के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं और महिलाओं में कर्तव्यनिष्ठता, परिवार व बुज़ुर्गों के प्रति स्नेह व सत्कार उन्हें पथ विचलित होने से बचा सकता है और गरिमा प्रदान कर सकता है। मुझे याद आ रही हैं… जयशंकर प्रसाद जी की पंक्तियां,’ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है इच्छा क्यों पूरी हो मन की। एक दूसरे से मिल ना सके,यह विडंबना है जीवन की। ‘यदि हमें उचित-अनुचित व अच्छे-बुरे का ज्ञान होगा तो हमारे कर्म श्रेष्ठ होंगे, हमारे मन की इच्छाएं पूर्ण होंगी, जीवन में सामंजस्य व समन्वय होगा, सृष्टि के कण-कण में समरसता व्याप्त होगी। आधी आबादी के मन में असंतोष व वितृष्णा का भाव पैदा नहीं होगा बल्कि संपूर्ण समर्पण का भाव होगा।फलत: जीवन में वैषम्य-विसंगतियां नहीं होंगी। आइए हम सब अपनी संस्कृति से अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाएं, अपने मन में असंतुष्टि का भाव न पनपने दें, क्योंकि मानव जीवन अनमोल है। ‘जीओ और जीने दो’ की लीक पर चलते हुए ‘जीते जी मुक्ति’ प्राप्त करने में प्रयासरत रहें तथा अलौकिक आनंद की मस्ती में अवगाहन करें ताकि नारी अपने दायित्वों का वहन करते हुए अपनी महत्ता को बनाए रखे।इन्ही मंगल कामनाओं व शुभाशीष के साथ…
डॉ• मुक्ता,
माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।


