Sun. Aug 16th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए : दुष्यंत कुमार

 

डा श्वेता दीप्ति

 

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा

मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां

मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं

ख़ुदा जाने वहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा

आज हिन्दी गजल के हस्ताक्षर दुष्यंत कुमार का जन्मदिन है । ऐसे ग़ज़लकार हैं जिनकी बातें मुर्दों में भी जान भर दे । हिंदी साहित्य के आकाश में सूर्य की तरह चमकते हैं दुष्यंत । उन्हें हिंदी गज़ल के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल है वह कई दशकों में विरले कविय़ों को नसीब होती है । दुष्यंत कुमार का जन्म 01 सितंबर, 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनोर जिले में हुआ। उन्होंने हिंदी कविता जगत को ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसंत’ नामक कविता संग्रहों और ‘साए में धूप’ नामक ग़ज़ल संग्रह से एक अलग मुकाम पर पहुंचाया । दुष्यन्त एक महान ग़ज़लकार और कालजयी कवि हैं । उनकी ग़ज़लों की धमक सड़क से संसद तक गूँजती है । दुष्यंत कुमार की गजलों में उनके समय की परिस्थितियों का वर्णन मिलता है। वे केवल प्रेम की बात नहीं करते, अपितु अपने आसपास के परिवेश को अपनी गजल का विषय बनाते है । दुष्यन्त कुमार की रचनाएँ आधुनिक   समय   की   धड़कनों   की   जीवन्त   दस्तावेज   है ।   अपने   बहुस्तरीय   व्यक्तित्व   के   कारण   दुष्यन्त   कुमार   ने   विश्व   और   भारतीय   समाज   को   सम्पूर्णता   में   देखा   है ।   उन्होंने   आम   आदमी   की   पीड़ा   उत्तेजना,  दबाव,  अभाव   और   उनके   सम्बन्धों   की   उलझन   को   अपने   काव्य   में   व्यक्त   किया   है ।

यह भी पढें   भारतीय प्रधानसेनापति जनरल धीरज सेठ आज काठमांडू आएंगे

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

-दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की कविताएं आज भी युवाओं के लिए उन्हे विरोध को बाहर निकालने का जरिया बनतीं हैं। दुष्यंत कुमार ने कविता के साथ ही गीत, गजल, नाटक और कथा जैसी विधाओं में भी उल्लेखनीय कार्य किया है, हालांकि दुष्यंत कुमार को उनकी बेहद सरल उर्दू में लिखी हुईं गज़लों के लिए खासा पसंद किया गया। दुष्यंत कुमार की लिखी पंक्तियाँ कई बार संसद में सुनाई देती रहती हैं। दुष्यंत कुमार ने आपातकाल के दौर में भी बेखौफ होकर अपनी कलम को सत्ता के विरोध में चलाया था। दुष्यंत का गजल संग्रह ‘साए में धूप’ आज भी गजल प्रेमियों के दिल में खास जगह बनाकर रखता है।

यह भी पढें   इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं - व्यवहार और संस्कार ही मनुष्य की असली पहचान : बिमल सरार्फ

“कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो”

बीसवीं सदी का वो दौर जब गजानन माधव मुक्तिबोध, अज्ञेय, कैफ भोपाली जैसे कवियों की साहित्यिक भाषा लोगों के दिलों पर हावी थी, उस समय दुष्यंत कुमार अपनी सरल हिंदी और आसानी से समझ आने वाली उर्दू में कविताएं लिख लोगों पर छा गए। ”हर सड़क, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेनी आग जलनी चाहिए।।” ये पंक्तियां लिखी थीं उस कवि ने जिसकी कविताओं पर आज भी हिंदुस्तान फिदा है, जिनकी कविताओं में अगर देश के लिए प्यार है तो उसे आईना दिखाती तस्वीर भी। इनकी नज़्मों में अगर माशूका के लिए प्यार है तो देश के लिए छुपा दर्द भी। अपनी प्रेमिका के लिए कविता लिखते वक्त ये कभी अपने देश के हालात नहीं भूले और समाज की व्यथा लिखते वक्त कभी अपने अंदर का वो इश्क़ भी नहीं ख़त्म होने दिया।

समय सदैव उन्हें ही याद रखता है, जो उसके साथ चलते हुए सजगता, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ न सिर्फ काम करते है, बल्कि आने वाली पीढ़ी की राह भी प्रशस्त करते है। और फिर समय गवाह है कि साहित्य उन्हें ही अपने हृदय में रखता है, जो निर्भीकता से अपनी काव्यधर्मिता का निर्वाह करते है। हिंदी साहित्य में दुष्यंत कुमार (1933-1975) और उनकी गजलों को जो लोकप्रियता मिली है, वह आज तक किसी अन्य कवि को नहीं मिली। उनका पहला कविता संग्रह ‘सूर्य का स्वागत 1957 में आया था, जिसमें अधिकांश छंदमुक्त कविताएं थीं, जिसमें विसंगतियों को नए मुहावरों के साथ उकेरा गया था। यहां तक कि काव्य नाटक ‘एक कंठ विषपायी में भी वह सती-शिव की कथा के जरिये अपने समय की कथा कहते है। वहीं ‘आवाजों के घेरे में विद्रोही कवि के रूप में उभरते है। अपने उपन्यास ‘आंगन में एक वृक्ष में भी उन्होंने सामंतवाद और मजदूरों के शोषण को विषय बनाया।

यह भी पढें   आज का पंचांग: आज दिनांक 14 अगस्त 2026 शुक्रवार शुभसंवत् 2083

दुष्यंत कुमार का गजल संग्रह ‘साये में धूप जिस वर्ष में प्रकाशित हुआ, उसी वर्ष 30 दिसंबर 1975 को वे मात्र 42 वर्ष की अल्पवय में इस दुनिया को अलविदा कह गए और हिंदी कविता में गजल की स्थापना कर गए।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com