मेरी आवाज़ ; समानता की पुकार : मुकेश भटनागर
अंतरराष्ट्रीय कन्या दिवस के उपलक्ष् में
– मुकेश भटनागर, दिल्ली । विजय एक सरकारी उपक्रम में अच्छे पद पर कार्यरत था । 33 वर्ष का सेवाकाल आनन फानन बीत चुका था। सेवानिवृत्ति के दो ही वर्ष शेष रह गये थे। पर न जाने क्यों उन्हें यह शेष दो वर्ष भारी पड़ने लगे। उनकी हमउम्र के सभी सहयोगी, सहकर्मि अथवा हमजोली अधिकारी धीरे धीरे उनसे अलग होते गये या उनका तबादला होता गया या सेवानिवृत्त हो गये और कुछ तो परमधाम पहुँच गये। ऐसा प्रतीत होता, वह बदलते हुए आधुनिक प्राद्योगिकरण के वातावरण में, अपने को सही से ढाल नहीं पा रहे थे। एक एक दिन उन्हें भारी लगता । लम्बी छुट्टी पर चले जायें या नियत सेवानिवृत्ति से पहले सेवानिवृत्त हो जाए या पूर्ण कार्यकाल पूरा करें। वे इसी दुविधा में पड़े रहते। तभी उनकी शाखा में नये भर्ती हुए कर्मचारियों को भेजा गया। उनमें से एक नवोदित महिला को उनके विभाग में भेजा गया, जिसके वह इन्चार्ज थे। विजय साहब को कोमल नाम की इस महिला का आचरण, स्वभाव औरों से कुछ हटके लगा। शायद यह उसकी पहली नौकरी थी या पहला पहला कार्य करने का अवसर था। जो भी कार्य कोमल को बताया जाता वह उसे बड़ी जिम्मेवारी व दक्षता से करती। वह जल्द ही बताये गये कार्यों में पारंगत हो गई। वह समय सीमा से पहले ही कार्य पूरा कर, बड़े भोले अंदाज में पूछती, कुछ और सर, अब और क्या करना है। विजय साहब का तो अब नजरिया ही बदल गया। कहां वह विभाग को अपने ऊपर ओढ़े हुए थे और कहां अब उन्हें सहयोगी के रूप में कोमल मिल गई, सहयोगी क्या वह कोमल को बेटी के रूप में देखते और कोमल भी विजय साहब को पिता तुल्य समझती। उनमें अधिकारी मातहत् का लेश मात्र भी अनुभूति नहीं झलकती।
उन दोनों का ताल मेल दूसरे विभाग और अनुभवी कर्मचारियों के लिए उत्कृष्ट मिसाल बन गया। संस्था के ग्राहक भी इस विशिष्ट अधिकारी-कर्मचारी के सामंजस्य व कार्य निष्पादन क्षमता से अचम्भित रहते। शायद यह नियति रही जो कोमल का उन्हें सहयोग मिला, क्योंकि कोमल के पिता का उसके स्कूल के दिनों में ही देहांत हो गया था और विजय साहब के भी कोई बेटी नहीं थी। यहां तक की कई सम्मानित ग्राहक उनके इस समझ बूझ और तालमेल को देखते हुए अपने घर या व्यवसाय केंद्र पर चाय के लिए आमंत्रित करते। लेकिन जैसा कहा जाता है न, बहता पानी ही साफ होता है और की लोगों के काम आता है। नियति को कौन जानता है, एक ही वर्ष में कोमल को अन्यत्र दूसरी संस्था में उच्ची पदवी की नौकरी मिल गई और वह विजय साहब और संस्था से विदा ले गई। पर जाते जाते कोमल कार्य निष्पादन का उच्च बैन्च मार्क छोड़ गई। युवा पीढ़ी और अनुभव में तालमेल का, सौहार्द का, आदर व सम्मान का, अपने पन का, कार्य को अपना कार्य समझ कर करने का।
कोमल की कमी खलती, परन्तु के रूप में किरण ने उसका स्थान ले लिया। विजय साहब को भी एहसास हो गया चिंता और विचलित होने के बजाय धैर्य और अपने पे विश्वास होना जरूरी है।
आज की युवा पीढ़ी अपने आप में जागरूक है, सक्रिय एवं स्वावलम्बी है। उनकी सोच और विचारधारा में परिपक्वता है। अन्त में मैं यही कहना चाहूंगा जिस प्रकार कोमल और किरण एक मिसाल बनी उसी प्रकार सभी लड़कियां हैं। आज महिलाएं एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच गई है, अंतरिक्ष में भ्रमण कर रही है, सात समुंदर की सैर कर आई, युद्धिपोत की बागडोर संभाल रही है, रैफैल वायु यान उड़ा रही है, हमारे देश की शिक्षा मंत्री महिला है, वर्तमान में वित्तमंत्री महिला है । महिलाएं समाज का सम्मान है संस्कारों की प्रतिनिधि है देश की शान है आने वाली पीढ़ी की अमानत है। महिला का सम्मान मानव जाति का सम्मान है। यह तभी सम्भव हो पायेगा जब हम हर दृष्टिकोण से महिलाओं को समान दृष्टि से देखेंगे, समझेंगे और मां की तरह आदर देंगे। हिन्दू समाज में तो रिश्तों की अपनी गरिमा है। रक्षाबंधन, भाई दूज, विवाह उत्सव, अहोई पर्व, करवा चौथ आदी आदी यही दर्शाते हैं कि हमारा समाज स्त्री प्रधान है यहां तक कि विवाह के समय अग्नि को साक्षी को मान कर वर और वधु उसके चारों ओर चार अथवा सात फेरे लेते हैं। शास्त्रोनुसार चार फैरो का प्रावधान है और पहले तीन फेरो में वधु (कन्या) आगे रहती है और वर उसका अनुसरण करता है और चौथे फेरे में वर (पुरुष) आगे रखा जाता है जिसके पीछे भी आध्यात्मिक कारण है। अतः महिला का सम्मान अपरिहार्य है। वह कोई भोग विलास या मनोरंजन का साधन नहीं, वह तो साधना की प्रतिमूर्ति है। प्रेम, आदर की परिकाष्ठा है। प्रेम का सम्मान करें, महिलाओं को समानता का दर्जा दें


