माटी की महक के रचनाकार रेणु जो हमेशा सान्दर्भिक हैं और रहेंगे : डॉ श्वेता दीप्ति
जन्मदिन विशेष
डा श्वेता दीप्ति
शताब्दी के लेखक जो आज भी सान्दर्भिक हैं और कई शताब्दी तक सान्दर्भिक रहेंगे । ४ मार्च १९२१ को एक नक्षत्र ने कोशी की मटमैली धरती को अपना बनाया था । धूलधुसरित कोशी की अभिशप्त माटी ही इस अभूतपूर्व कथाकार को स्थापित कर गया । रिणुआ से रेणु बने इस महान रचनाकार ने अपने नाम में भी धूल के कण को आत्मसात् कर लिया किन्तु वह कण बन कर नहीं रहे साहित्याकाश के वो नक्षत्र बने जो सदैव दैदिव्यमान रहेंगे। जी हाँ एक छोटा कण जिसने साहित्यिक ब्रह्माण्ड में अपनी महत्ता सिद्ध की है । कालजयी रचनाकार फणीश्वरनाथ रेणु की जन्म शताब्दी मनायी जा रही है । वह कथाकार जिसने “इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी – मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।“ के साथ स्वयं को स्थापित किया ।
हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु का एक ऐसा नाम है जिन्होंने स्थानीयता और यथार्थवाद को स्थापित किया। काल, स्थान और परिस्थितियों के हिसाब से ऐसी रचनाएं रचीं कि ये साहित्य से अधिक समय से संवाद करते दस्तावेज बन गए।हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ‘रेणु’ की पहचान एक कालजयी रचनाकार के रूप में है।अपने पहले उपन्यास ‘मैला आँचल’ (1954) से ही इन्होंने हिंदी कथा साहित्य को एक नई दिशादी। इस उपन्यास के प्रकाशित होते ही हिंदी कथा साहित्य में आंचलिकता की नींव पड़ी।‘रेणु’ सम्पूर्ण जीवन राजनीति से साहित्य और साहित्य से राजनीति की ओर एक शोधक यात्री की तरह यात्रा करते रहे। इनकी इस यात्रा को अकारण या भटकावपूर्ण नहीं कही जा सकता बल्कि यह ‘रेणु’ के सामाजिक बदलाव के प्रति उत्कट अभिलाषा और तीव्र छटपटाहट को दिखता है। ‘रेणु’ का सम्पूर्ण साहित्य राजनीति की मजबूत बुनियाद पर स्थित है। ‘रेणु’ ने सामाजिक बदलाव में साहित्य की भूमिका को कभी राजनीति से कमतर नहीं माना।ऐसे बहुत कम लेखक होते हैं जो अपने जीते जी ही किंवदंतियों का हिस्सा हो जाते हैं. जो अपने समय के रचनाकारों के लिए प्रेरणा और जलन दोनों का कारण एक साथ ही बनते हैं. रेणु ऐसे ही थे. अज्ञेय तो खैर उनके घनिष्ठ मित्र ठहरे. उनके द्वारा उन्हें ‘धरती का धनी कथाकार’ कहा जाना उतनी बड़ी बात नहीं थी. लेकिन रेणु की साहित्यक धारा से बिल्कुल अलग लिखने वालों को भी उनकी कलम की ताकत से इनकार नहीं था.

आंचलिकता के गहरे रंगों में रंगे “मैला आँचल” में समय का बोध और राष्ट्रीय जीवन से लोकजीवन का एकीकरण तथा वैश्विक वैज्ञानिक प्रगतियों के लोकसंस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों का पक्का सबूत भी है। जन-जीवन के सवाल पर अंचल में धड़कते जीवन के दबाव में मानव मुक्ति संग्राम की कथा है। अंचल और आन्दोलनों के इतिहास से हाशिये के समाज के बनते-बिगड़ते रिश्ते के बीच रेणु ने बुर्जुआ, पेटी बुर्जुआ, पूंजीवाद, पूंजीपति, जालिम जमींदार, मार्क्सवाद, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, कमाने वाला खायेगा, राम राज्य जैसे वैचारिक नारों को परिभाषित किया है। विश्व साहित्य के इतिहास से प्रेरित स्थानीयता और यथार्थवाद की कसौटी पर रेणु की आंचलिकता हिन्दी कथा साहित्य की टटका प्रवृत्ति है और “मैला आँचल” मानवीय संवेदना की धरातल पर खड़ा शब्द शिल्प हिन्दी का पहला आधुनिक औपन्यासिक शीशमहल, जिसकी दरो-दीवारों में नवसृजित लोकतंत्र में समाजवाद की परिकल्पनाओं की इबारत लिखी है। रेणु ने मैला आंचल में तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्यों और संभावनाओं पर विस्तार से अपने पात्रों के जरिए लिखा है। ऐसा करते समय वे न केवल उस समय जो कि 1950 का दशक है, की राजनीति को सामने लाते हैं बल्कि आने वाले युग की राजनीतिक भविष्यवाणी भी करते हैं। मसलन, 1990 में मंडल कमीशन के लागू होने के बाद देश में पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी की झलक भी उनकी रचनाओं में अनायास देखी जा सकती है। इसी प्रकार वे उस समय बीज से पौधा बने वामपंथ को बढ़ते हुए देखते हैं तो इसके अंतर्विरोधों को भी सामने लाते हैं। जैसे बालदेव, चुन्नी गोंसाई और बावनदास सुराजी आन्दोलन के दौर के कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं। बालदेव की संगत में कालीचरण और बासुदेव ने राजनीति शुरू की। कालीचरण और बासुदेव, पार्टी के कामरेड बन जाते हैं। हरगौरी सिंह जनसंघ का झंडा उठा लेता है। चरित्तर कर्मकार कम्युनिस्ट पार्टी का पताका लेकर मेरीगंज की राजनीति में सक्रिय हैं। कांग्रेस, सुशलिंग, कम्युनिस्ट और जनसंघ जैसे प्रमुख राष्ट्रीय दलों के कार्यकर्ताओं की सक्रियता मेरीगंज के समाज में व्याप्त सामाजिक द्वंद्व और अन्तर्विरोध का प्रमाण है।
भरत प्रसाद अपने आलेख में लिखते हैं,‘प्रेमचंद की कलम में भारतीय आत्मा का स्वरूप उद्भासित होता है, पर रेणु की कलम गंवई हृदय के रंग, राग, गंध और रसिकता का तान छेड़ती है। यह आंचलिकता आखिर है क्या? केवल खांटीपन, भदेस शैली, अनगढ़ता? क्या अटपटी बोलीबानी, लंठई, नंगई और गंवारूपन को आंचलिकता की पहचान कहा जाएगा? नहीं, निश्चय ही ना! आंचलिकता एक बेलीकी है – अनुभूतियों की, एक खिंचाव है, अपनत्व का, जिसको शब्द दे पाना असंभव है। एक जादुई ग्रामसत्ता की विलक्षण माया कहिए, जो व्यक्त हो कर भी अव्यक्त है। शब्दों में उत्त्त्तर भी अर्थातीत है, जिसे आकार देने के लिए पंचेन्द्रियां अपर्याप्त हैं, यहां तक छठी इन्द्री भी बौनी पड़ जाती है, इस रहस्यमय माया को सृजन में बांधने के लिए। आंचलिकता दरअसल कच्ची, अनगढ़, गैर पारंपरिक राह है, जिस पर चलने के लिए दो आंखें काम न देंगी। दो पैरों से कई कदमों का धैर्य पैदा करना होगा। एक मन में सैकड़ों मन जोड़ना पड़ेगा। कहीं अमराई की घनी छाया में सन्नाटा खिला हुआ है, कैसे शब्दों में साकार करेंगे? कहीं तलहटी की ठंडक में अदृश्य कीड़े मकोड़े आनंद का उत्सव गा रहे हैं, कैसे सुर-ताल वाले काबिल शब्दों में सजाएंगे? कहीं चौहद्दी के क्षितिज में पछुवा बयार के साथ पकने को तैयार फसलें निर्गुन गीत छेड़ रही हैं, कैसे तान में बांधेंगे?
यह असंभव तो नहीं, पर आसान भी नहीं। तब तक कि जब तक घंटों आंखों से नहीं, आशिक हृदय से जी भर कर निहार न लें, उसके थिरकते, नाचते, गाते वजूद को रेशा रेशा पी न जाएं, जब तक अपने आदमी होने के बौनेपन को अंचल के अनगढ़ विस्तार में विलीन न कर दें। जब तक ग्राम एक दृश्य है एक चित्र है, एक अस्तित्व है, तब तक कोई आंचलिक शिल्पकार कैसे हो सकता है? गांव अर्थात हमारी आत्मा की प्रयोगशाला, हमारे एहसासों की रंगभूमि, हमारे स्वभाव की निर्माण स्थली। इतना ही नहीं, जिसके भीतर रोम-रोम में एहसासों की अभूतपूर्व सजगता सक्रिय है, वही अव्वल दर्जे का आंचलिक सृष्टिकर्ता हो सकता है .’
मैला आंचल के बाद कुछ लोग कहने लगे थे कभी-कभार संयोग से ऐसी दुर्घटनाएं घट जाती हैं. अब रेणु शायद ही दूसरा कुछ ऐसा रच सकें. लेकिन अपना दूसरा उपन्यास ‘परती परिकथा’ लिखकर उन्होंने इन विरोधियों की तमाम आलोचनाओं को विराम दे दिया.
एक बार बीबीसी के एक पत्रकार ने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’से पूछा कि आखिर आप अपनी रचनाओं में इतनी जीवंतता कैसे लाते हैं। तब उन्होंने अपने मनमोहक मुस्कान से जवाब दिया था,‘‘अपनी कहानियों में मैं अपने आप को ही ढूढ़ता फिरता हूँ। अपने को अर्थात आदमी को!। दरअसल, अपनी रचनाओं में उन्होंने बिहार के छोटे भूखंड़ की हथेली पर समूचे उतरी भारत के किसान की नियति-रेखा को उजागर किया । रेणु जी की रचनाओं की सबसे खास बात थी कि वह कविता की तरह लयात्मक होते थे, जिसमें देहाती माटी की महक समाहित है। वह आम जनों की भाषा में लिखने वाले साहित्यकार थे । रेणु जी की रचनाओं में महिलाएं बहुत ताकतवर होती थी। उनकी रचनाओं में जितना सीधा-सपाट पुरूष होता है स्त्री वैसी नहीं होती। वह छली होती है, वह बहुत सी तिकड़म को जानती है । रेणु ने अपनी कहानियों, उपन्यासों में ऐसे पात्रों को गढ़ा जिनमें एक दुर्दम्य जिजीविषा देखने को मिलती है, जो गरीबी, अभाव, भूखमरी, प्राकृतिक आपदाओं से जुझते हुए मरते भी है पर हार नहीं मानते। रेणु उपर से जितना सरल थे अंदर से उतने ही जटिल भी। रेणु की कहानियां नादों और स्वरों के माध्यम से नीरस भावभूमि में भी संगीत से झंकृत होती लगती है। रेणु अपनी कथा रचनाओं में एक साधारण मनुष्य, जो पार्टी, धर्म, झंड़ा रहित हो, की तलाश करते नजर आते है । उनका जीवन और समाज के प्रति उनका सरोकार प्रेमचंद की तरह ही है। इस दृष्टिकोण से रेणु प्रेमचंद के संपूरक कथाकार है। इसी वजह से प्रेमचंद के बाद रेणु को ही एक बड़ा पाठक वर्ग मिला।



its an excellent skexh and commentary on Renu.