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यदि पशुबल का ही नाम बल है, तो निश्चय ही नारी में पुरुष की अपेक्षा कम पशुत्व है- गाँधी : श्वेता दीप्ति

 

यदि पशुबल का ही नाम बल है, तो निश्चय ही नारी में पुरुष की अपेक्षा कम पशुत्व है । लेकिन अगर बल का अर्थ नैतिक बल है तो इस बल में वह पुरुष की अपेक्षा इतनी अधिक महान है कि जिसका कोई नाप नहीं हो सकता । अगर अहिंसा मानव जाति का धर्म है, तो अब मानव जाति के भविष्य की निर्मात्री नारी बनने वाली है ।

डॉ श्वेता दीप्ति,  गाँधी दर्शन आज भी सान्दर्भिक है । वर्ष गुजर गए,किन्तु गाँधीवाद और गाँधी विचार धारा कल के परिप्रेक्ष्य में जितने सांदर्भिक थे उससे कहीं आज के संदर्भ में हैं । क्या था उस मानव में जो पूरी दुनिया उसकी दीवानी हो गई । एक निहत्था व्यक्ति अहिंसा का पाठ पढ़ाकर और उसे अपना कर भारत को वह दे गया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी । चम्पारण सत्याग्रह इतिहास का पहला गाँधीवादी सत्याग्रह है और है गाँधी युग के आरम्भ की पहली अँगड़ाई भी । जिस बिहार की धरती पर गज की पुकार पर भगवान स्वयं आ गए थे,उसी बिहार की धरती पर अत्याचार से पीडि़त किसानों की पुकार गूँजी तो गाँधी आए और इसके पश्चात् उनके कदम पीछे नहीं हटे । जनता उनके पीछे हो ली और सदियों से जिस परतंत्रता की जंजीरों से भारत जकड़ा हुआ था उससे उन्हें मुक्ति मिली । किन्तु गाँधी की तीक्ष्ण नजर सिर्फ अँग्रेजों की गुलामी पर टिकी हुई नहीं थी उनकी निगाह सम्पूर्ण भारत पर थी जहाँ अशिक्षा, गरीबी, जातिगत भेदभाव, अछूत प्रथा और साथ ही नारी की जो सामाजिक स्थिति थी उस पर भी टिकी हुई थी । वो जानते थे कि शिक्षा से ही स्वाभिमान जगाया जा सकता है और शिक्षा से ही गरीबी दूर हो सकती है । समाज में हर ओर ऊँचनीच और परम्पराओं के बोझ के तले जिंदगियाँ साँस ले रही थीं । इन कुरीतियों को दूर करने का प्रयास भी वो लगातार कर रहे थे, अछूत कहे जानेवाले समुदाय को उन्होंने हरि जन कहा अर्थात् ईश्वर का अंश, ईश्वर का प्यारा । सर पर मैला ढोने की परम्परा को उन्होंने खत्म किया । जहाँ तक नारी सम्बन्धी मान्यता या सोच की बात है तो गाँधी यहाँ भी स्वस्थ मानसिकता के साथ थे ।

हमारा धर्म ग्रंथ कहता है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है वहीं ईश्वर का वास होता है । वैदिक काल में अरुंधती नारी गौरव का प्रतीक थी, उनको पाकर स्वयं वशिष्ठ अपने को पवित्र मानते थे । मैत्रयी की योग्यता की साक्षी वृहदारण्यक देता है । योग वशिष्ठ में वर्णित नारी चरित्र कितना उच्च, कितना उदात्त, कैसा पावन और कितना उद्धारक है । पौराणिक साहित्य ने सीता, सावित्री, दमयन्ती, शकुन्तला, द्रौपदी के पावित्र्य, चातुर्य, तेजस्विता और ज्ञान का गुणगान किया है और इतिहास ने मीरा, पद्मिनी, मुक्ता, अहिल्या के नामों को प्रातःस् मरणीय बना दिया है । आज भी नारी अपने गौरव को भूली नहीं है इसकी गवाही विश्व में हमारी उपस्थति दे रही है । किन्तु नारी जाति की उस समय की अवस्था गाँधी जी को विचलित करती थी, वो कहते थे ः “पुरुष जाति बहुत सी भूलों और बुराइयों के लिए जिम्मेदार हैं, परन्तु उसकी सबसे बड़ी भयकंर, दुखदायी तथा पाशविक भूल नारी के साथ किया गया अन्याय है । इस अन्याय ने नारी को बहुत गिराया है । किसने पहले पहल नारी को अबला कहा  कौन जाने । वह तो त्याग, नम्रता, श्रद्धा, विवेक और स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहन की प्रत्यक्ष मूर्ति है । हाँ, इसका वह ढिंढोरा नहीं पिटती । यदि पशुबल का ही नाम बल है, तो निश्चय ही नारी में पुरुष की अपेक्षा कम पशुत्व है । लेकिन अगर बल का अर्थ नैतिक बल है तो इस बल में वह पुरुष की अपेक्षा इतनी अधिक महान है कि जिसका कोई नाप नहीं हो सकता । अगर अहिंसा मानव जाति का धर्म है, तो अब मानव जाति के भविष्य की निर्मात्री नारी बनने वाली है । मानव के हृदय पर नारी से बढ़कर प्रभाव और किसका है  वह तो पुरुष ने नारी की आत्मा को कुचल रखा है । यदि उसने भी पुरुष की भोग लालसा के सामने अपने आपको समर्पित न कर दिया होता, तो सोयी हुई शक्ति के इस अथाह भण्डार के दर्शन का अवसर संसार को मिल जाता । अब भी उसके चमत्कार पूर्ण वैभव का दर्शन हो सकेगा, जब नारी को संसार में पुरुष के ही समान अवसर मिलने लगेगा और पुरुष तथा नारी, दोनों मिलकर परस्पर सहयोग करते हुए आगे बढ़ेंगे ।”

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स्त्री जाति की शक्ति और महत्ता के बारे में गाँधी जी के ये केवल विचार नहीं थे, उन्होंने इसके प्रत्यक्ष उदाहरण भी प्रस्तुत किए थे । आजादी की लड़ाई में उनके आह्वान पर पर्दों की दीवार को तोड़ नारी शक्ति ने उनका साथ दिया । वो निर्भीक थीं और अटल थीं । धारसणा और बडाला के नमक सत्याग्रह इसके साक्षी हैं, जहाँ नारियों ने पुरुषों से अधिक वीरता के साथ सत्याग्रह में भाग लिया था । स्वतःस्फूर्त रूप में औरतें घरों से निकलीं और स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और भारत का इतिहास हमेशा इस बात के लिए नारियों का ऋणी रहेगा । नारी में क्षमता हो, शक्ति हो, स्वयं को किसी भी कठिन परिस्थितियों से उबार सकें गाँधी जी की यह धारणा थी ।

इसी सन्दर्भ में एक घटना का जिक्र करना चाहूँगी ः ये घटना तब की है जब वो नोआखली में भटक रहे थे । उनकी आदत थी कि वो किसी भी जगह रुकने पर अपने पाँव को धोया करते थे और इसके लिए एक छोटे से पत्थर का प्रयोग किया करते थे । उस पत्थर को सम्भालने की जिम्मेदारी उनकी पौत्री मनु की थी । एकबार जब उन्होंने अपने पैर धोने चाहे तो, ज्ञात हुआ कि वह किसी अन्य जगह पर उस पत्थर को भूल आई है । इस पर गाँधी जी नाराज हुए और उनकी नाराजगी इस बात की थी कि मनु ने अपने काम या जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया । उस वक्त वो जिस जगह थे, उस जगह से कुछ दूरी पर वह गाँव था जिस जगह किसी बुनकर के घर में मनु वह पत्थर भूल आई थी । उन्होंने मनु से कहा कि तुम जाओ और पत्थर लेकर आओ । रास् ता सुनसान था और खतरे भी कुछ कम नहीं थे, फिर भी मनु गई और ढूँढकर उस पत्थर को लेकर आई, किन्तु उसकी आँखों में आँसू थे । गाँधी जी हँसे और बोले, मैं खतरे के बारे में तुमसे ज्यादा जानता हूँ । अगर कोई बदमाश तुम्हें उठा ले जाता और तुम साहस के साथ मरना कबूल करती तो मेरा दिल खुशी से नाच उठता । लेकिन अगर दब्बुपन या भय के मारे तुम वापस आ जाती या भाग खड़ी होती तो मैं खुद को अपमानित और दुखी महसूस करता । एक छोटी सी घटना यह बताती है कि गाँधी नारी को किस रूप में देखना चाहते थे । वह चाहते थे कि प्रत्येक नारी में साहस और सम्बल हो

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गाँधी जी जीवन के सर्वतोमुखी सुधारक थे । समाज की हर कमी पर उन्होंने प्रहार किया और नई रीति नीतियाँ चलाईं । विवाह पद्धति भी उनकी निगाहों से बची नहीं रह पाई थी । उन्होंने साबरमती में कई शादियाँ करवाईं । ये शादियाँ समाज के बनाए नियमों और परम्पराओं से अलग होते थे । वर वधु को आशीर्वाद देते समय हमेशा वर को वो कहते थे कि, “अपनी पत्नी का आदर करना । तू उसका मालिक नहीं, सच्चा मित्र है । मैं आशा करता हूँ, मुझे विश्वास है कि, उसके शरीर और आत्मा को पवित्र मानेगा । निश्चय ही वह तेरे  शरीर और आत्मा को ऐसा ही मानेगी । इसके लिए तुझे अपने जीवन को सादा, संयमी और परिश्रमी बनाना होगा । तुम एक दूसरे को विषय का साधन नहीं मानोगे ।” अर्थात् उनका मानना था कि गार्हस् थ जीवन में स्त्री और पुरुष समान हैं और उनके अधिकार भी समान हैं ।गाँधी जी के विचार ही थे कि अन्य देशों में जहाँ पुरुषों के समान मताधिकार प्राप्त करने के लिए स्त्रियों को जाने कितने वर्ष राह देखनी पड़ी,लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं । परन्तु भारत में स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही एकदम सहज और स्वाभाविक रूप में स्त्रियों को समान मताधिकार प्राप्त हो गए । एक बहुत बड़े देश की प्रधानमंत्री बनने का गौरव भी सबसे पहले भारतीय नारी को ही प्राप्त हुआ ।

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गाँधी युग ने नारी जगत में एक नयी चेतना उत्पन्न कर दी । उनका ही प्रभाव था कि रामेश्वरी नेहरु, सरोजिनी देवी, विजयालक्ष्मी पण्डित, राजकुमारी अमृत कौर, सुचेता कृपलानी कुछ ऐसे नाम थे उस समय के, जिनका प्रभाव भारत में ही नहीं बाहर भी देखने को मिला ।  राजकुमारी अमृतकौर तो भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं । मिस मैडेलाइन स्लेड, प्रेमा, सुशीला, सुशीला नायर, अमृता, मनुडी, अम्तुस्सलाम ये वो नाम थे जो नारी शक्ति की परिचायक बनकर उभरीं ।

आज गाँधी नहीं हैं किन्तु, उनके विचार क्या आज भी सान्दर्भिक नहीं हैं ? आधा आकाश हमारा है, जी हाँ ऐसा कहा जाता है, किन्तु क्या सचमुच आधा आकाश हमारा  है ? और सच पूछिए तो हमारी शुरुआत हमारे  घर से होती है, अगर घर का एक कोना हमारा हो जाय, जहाँ हम हमारी मर्जी से रहें तो परिवार, समाज, देश और फिर विश्व में हमारी अस्मिता, हमारी पहचान और हमारा अधिकार स्वयं सुनिश्चित हो जाएगा । और इसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी । समय बदला, समाज की परि भाषाएँ बदलीं और कई मायनों में नारी सशक्त भी हुईं । किन्तु यह परिवर्तन इतना अधिक नहीं हुआ है कि अब इसपर किसी बहस की गुंजाइश ना हो । कहीं ना कहीं हम आज भी वहीं खड़े हैं जहाँ पहले थे । अधिकार और स्वतंत्रता के नाम पर हम अंधी आधुनिकता के पीछे भाग रहे हैं । हमें स्वतंत्र होना है हमारी उस मानसिकता से जिसने हमें साधन और शोषण का सामान बना दिया है । और यह हमें स्वयं करना है क्योंकि परवरिश और संस्कार की जिम्मेदारी हमारी होती है । और हमें इसे बंधन नहीं बल्कि ताकत के तौर पर लेना होगा । बेटा भी हम पैदा करते हैं और बेटी भी और दुखद तो यह है कि इनमें भेद भी हम ही करते हैं और यही भेद एक पक्ष को सबल बना देता है और दूसरे को कमजोर । बेटियाँ कहती हैं, हमें संपत्ति नहीं शिक्षा चाहिए । जी हाँ यही वह हथियार है जो हमें सशक्त करता है और स्वाभिमान के साथ जीना सिखाता है । क्या कसूर है उसका कि उसे कोख में ही मार दिया जाता है ? दोष उसका नही है, समाज का है समाज के बनाए नियमों का है, जहाँ शादी के नाम पर व्यापार होते हैं और यही डर एक नन्ही जान को पनपने नहीं देता । आज गाँधी सशरीर नहीं हैं पर उनकी विचार धारा हमारे साथ है ।

संपादक

Shweta Deepti
श्वेता दीप्ति

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