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आम आदमी की जुबां बोलती चुनिंदा लघुकथाएँ : डॉ. बीना

 

डा बिना, पुस्तक समीक्षा, हिमालिनी, अंक फरवरी ।साहित्य आम आदमी की जुबां बोलता है । संचार माध्यमों में नवाचार आया तो साहित्यिक विधाओं ने भी कुछ हद तक आम आदमी की सुविधा देखते हुए रूप में नवीनता धर ली । व्यस्तता के चलते लंबी कहानियाँ व उपन्यास मनोरंजन व समय बिताने के लिए अब लोग कम पढ़ने लगे किंतु लघुकथाओं को पसंद किया जाने लगा क्योंकि भारी भरकम भावों व शब्दों की जटिलता उसमें नहीं होती, एक बैठक में फट से पढ़ डाला और दूसरों की अनुभूति से संभव हुआ तो साधारणीकरण कर आनंद भी ले लिया । सुप्रसिद्ध साहित्यकार अशोक जैन लंबे अर्से से (१९७२ से) लेखनी चलाते रहे हैं और मुक्तक, लघुकथा, कुंडलिया तथा गीत आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया है । कथाकार, संपादक अशोक जैन के अभिव्यक्ति के दो सशक्त माध्यम मुक्तक और लघुकथा रूप में ये दो संग्रह’चमकती धूप के साये’ और’ जÞिंदा मैं’ अगस्त २०२१ में आए हैं ।

समाज में जो देखा, अनुभूत किया उसे यथार्थ व कल्पना से संजोते हुए ‘जिंदा मैं’ नाम से उनकी चुनिंदा लघुकथाओं का संकलन आया है तो ‘चमकती धूप के साये’ मुक्तक संग्रह । 

लघुकथा संग्रह की कुछ लघुकथाएँ प्रकाशित होकर पूर्व में चर्चित भी हो चुकी हैं । इस संग्रह में कुल मिलाकर ४१ लघुकथाएँ समेटी हैं । सुंदर आवरण पृष्ठ के साथ आकर्षक स्केच भी लघुकथाओं के संग दिए गये हैं । डॉ अशोक भाटिया की सटीक समीक्षात्मक टिप्पणी भी संलग्न है । संकलन की विस्तृत समीक्षा उभरते लघुकथाकार विरेंदर ‘वीर’ मेहता द्वारा भूमिकाबद्ध है । अधिकतर रचनाओं की पृष्ठभूमि मध्यमवर्गीय समाज की पारिवारिक कही जा सकती हैं । कथ्य को प्रभावपूर्ण ढंग से लघुकथा के ढाँचे में ढालने का प्रयास किया गया है, हालांकि उनके अंत में लेखकीय टिप्पणी के मोह से कहीं– कहीं वे बच नहीं पाए । पुस्तक की विषयवस्तु भावनात्मक, विचारात्मक और कहीं– कहीं वर्णात्मक पुट लिए है्र शैली में संवादों की उपयोगिता द्रष्टव्य है । 

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पुस्तक का शीर्षक ही उनके संवेदनशील होने की गवाही दे जाता है । ‘जिंदा मैं’ लघुकथा में उन्होंने मानवीय संवेदना को आधार बनाकर प्रतिरोधमूलक ताना– बाना बुना है, जिसमें बड़े भाई द्वारा की गई भर्त्सना का, छोटे भाई ने अपने आत्मसम्मान को बचाने के लिए कुशलतापूर्वक विरोध जताया कि मैं भी जिंदा हूँ, मेरे भी अहसास हैं और मुझे भी बुरा लगता है । 

पहली लघुकथा ‘डर’ में बखूबी विसंगति को उभारा है कि हताश आदमी मरने के बारे में सोचता है मगर हताशा में जुटाए साधन आशा बन जाते हैं । कई बार और व्यक्ति जहाँ मौत को गले लगाना चाहता है, अब वहीं सफल होने पर उससे ही डरने लगता है । 

‘मुक्तिमार्ग’ में पतंगा, दीपक की लौ और हवा के माध्यम से प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति दी है । ‘गिरगिट’ में नेता के माध्यम से सफेदपोश मनोवृत्ति को दहेजÞ समस्या के अंतर्गत दर्शाया गया है । ‘बुखार’ और ‘गुहार’ बेरोजगारी पर आधारित लघुकथाएँ हैं । बुखार में बेरोजगार युवा की मनोदशा वर्णित है तो ‘बँटवारे’ में घर के मुखिया की मृत्यु के बाद संकुचित सोच के रहते बड़े बेटे–बहू के द्वारा माँ और छोटे भाई की जिम्मेदारी से दूर भागने का सीधा– सीधा वर्णन है । ‘अपने–अपने स्वार्थ’ चुनावी राजनीति का मजÞदूर वर्ग पर पड़ते प्रभाव का उदाहरण है । चुनावी राजनीतिक पैतरों का असर आरपार, खुसर– पुसर, पैंतरे और मौकापरस्त जैसी लघुकथाओं पर भी है । ‘अकेलापन’ दो भाइयों पर कथ्प लिए है । स्त्री त्रासदी और उसके शारीरिक व मानसिक शोषण को ‘मजे, ‘खाली पेट’ व ‘बोध’ जैसी लघुकथाओं में देखा जा सकता है । ‘पोस्टर’ करारा व्यंग्य है बाजÞारवाद का, उत्कृष्ट लघुकथा कलेवर है । बड़े के साये में छोटे महफÞूजÞ रहते हैं । घर में बुजुर्गों का साया बाकी सदस्यों को सुरक्षा प्रदान तो करता ही है, साथ ही छोटे सदस्य उनके रहने तक कई जिम्मेदारियों से मुक्त भी रहते हैं, सब चिंता रूपी तूफÞान तो बड़े ओढ़ लेते हैं ऐसी ही लघुकथा है– ‘बूढ़ा बरगद’ यह प्रतीकात्मक अर्थ है मगर पर्यावरण का भी सटीक संदेश इसे कहा जा सकता है । 

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जो टूट जाता है, खंडित है, उसे दुनिया नहीं पूजती, दुखों से टूटे इंसान को कौन पूछता है? सब सुख के साथी हैं ‘टूटने के बाद’ कथ्य तथा शिल्प की दृष्टि से उत्तम लघुकथा है । इसमें यदि अंतिम पंक्ति यहीं तक रहती तब भी पूर्ण स्पष्ट भाव हो जाता है– “सही तो है, जो टूटा वही फेंका गया, मूर्ति हो या मानव’ और ‘उसने कहा’ आदमी की भूख की विवशता प्रकट करती है । धन की चाह लोलुपता में कैसे बदल जाती है, यह मध्यमवर्गीय परिवार की आम जिंदगी की कहानी है । इसी तरह की है– ‘क्वार्टर और हवेली के बीच ‘अपराध बोध’ में बिटिया की बीमारी के कारण रामू वोट डालने न जा सका, इस कारण उसके चहेते नेता के एक वोट से हार जाने का मलाल उसे साधना है । ‘फिर भी’ घर छोड़कर यार– दोस्तों के संग जिंदगी गुजारते युवाओं के लिए तीखा संदेश छोड़ती है । अहम् को स्वाभिमान का नाम देकर बाद में अकेले पड़ जाने व्यथा खूब उतारा है । ‘झुग्गियों की आग’ ‘भ्रष्ट तंत्र की वापसी,’ ‘जेबकतरा’, ‘गुहार’ बेरोजगारी की वापसी हैं । 

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इस संकलन का आकर्षण पारिवारिक लघुकथाएँ हैं । अकेलापन, प्रायवेसी, लौटते हुए, फैसला, सुनहरी चेन वाली घड़ी, संकल्प ( आशे पात्र अनेक लघुकथाओं में छाया रहा), माहौल, सन्नाटे और मुस्कान के बीच, मुआवजÞा, चेतना, हार का बोध, अपने– अपने दुख, समाधान, आत्मनिर्भर आदि ऐसी ही लघुकथाएँ हैं जिनमें परिवार के सुख– दुख व मानव जीवन के दर्शन का बढि़या प्रदर्शन किया है । 

‘दाना– पानी’ बुजुर्गों की बदहाली और स्वाभिमान पर ठेस लगते ही घर छोड़ देने की बढि़या लघुकथा है । सद्भावना की मिसाल ‘मिसाल’ लघुकथा है जिसमें हिंदू नेता के विधायक बनने पर अब्दुल पहले सहम जाता है किंतु विधायक के उसे गले लगाने पर सहज व प्रसन्न होने पर सौहार्द जन्म लेता है । 

कुल मिलाकर कुछेक को छोड़ कर सभी लघुकथाएँ पाठक के मनोमस्तिष्क पर प्रभाव छोड़ती हैं । स्मृतियों में स्थान बना लेनी वाली रचनाएँ ‘सुनहरी चेन वाली घड़ी’, दाना– पानी, टूटने के बाद, पैंतरे, डर, पोस्टर, मिसाल, आर– आर आदि हैं्र इनमें आर्थिक शोषण, राजनीतिक क्षेत्र में समकालीन यथार्थ की राजनीति, सांप्रदायिक सद्भाव आदि भाव संवेदनात्मक विस्तार तो देते ही हैं, साथ ही इन लघुकथाओं में सटीक संकेतों और प्रतीकों का सहज प्रयोग हुआ है । उदाहरण के तौर पर हम ‘आर–पार’ में लालटेन का तेल खत्म होने का प्रतीक और ‘सुनहरी चेन वाली घड़ी’ की घड़ी को देखें, खूबसूरत प्रतीक हैं । हमारे जैसे पठन जिज्ञासुओं के लिए संकलन में बहुत कुछ है । भाषायी सजगता और कसावट के साथ संवादों में शब्दों की मितव्ययिता उनके सौंदर्य को बढ़ाती है । अशोक जैन का यह लघुकथा संग्रह अपने कलेवर और अंदाजÞ के कारण पहचान बनाएगा, इसी आशा और शुभकामनाओं सहित ।

 

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